दिल्ली हाईकोर्ट ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) को उसके पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी (सीवीओ) संजीव चतुर्वेदी द्वारा दायर झूठी गवाही याचिका के संबंध में नोटिस जारी किया है। याचिका में संस्थान पर चल रहे कानूनी विवाद में शपथ लेकर गलत बयान देने का आरोप लगाया गया है।
न्यायमूर्ति सी हरि शंकर और न्यायमूर्ति अजय दिगपॉल ने एम्स को चतुर्वेदी द्वारा लगाए गए आरोपों पर चार सप्ताह के भीतर जवाब देने का निर्देश दिया। पीठ ने कहा, “नोटिस जारी करें.. यदि कोई जवाब है, तो उसे चार सप्ताह के भीतर दाखिल किया जाए, जिसकी अग्रिम प्रति याचिकाकर्ता के विद्वान वकील को दी जाए, जो चार सप्ताह के भीतर उस पर प्रत्युत्तर दाखिल कर सकते हैं।”
2015 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने 2012 से 2014 तक एम्स में सीवीओ के रूप में कार्य किया। उनका कार्यकाल प्रमुख चिकित्सा संस्थान के भीतर भ्रष्टाचार विरोधी पहलों के लिए जाना जाता है। याचिका में वित्तीय वर्ष 2014-15 के लिए उनकी वार्षिक प्रदर्शन मूल्यांकन रिपोर्ट के लिए इस्तेमाल की गई प्रक्रिया के संबंध में 17 अगस्त, 2016 को दिए गए जवाबी हलफनामे में एम्स द्वारा कथित गलत बयानों पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
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चतुर्वेदी की याचिका में तर्क दिया गया है कि एम्स ने अदालती कार्यवाही के दौरान जानबूझकर गलत बयान दिए। दस्तावेज़ में कहा गया है, “इस माननीय न्यायालय के समक्ष शपथ पर जानबूझकर और जानबूझकर गलत बयान देने के लिए प्रतिवादी (एम्स) के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 340 और आईपीसी की धारा 193 के तहत उचित आपराधिक कार्यवाही शुरू करने की विनम्रतापूर्वक प्रार्थना की जाती है।”
इसके अतिरिक्त, याचिका में इन कथित झूठे बयानों के लिए एम्स पर “अनुकरणीय जुर्माना” लगाने की मांग की गई है, जो आरोपों की गंभीरता को रेखांकित करने के लिए दंडात्मक उपाय का सुझाव देता है।