न्याय के हित में दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 85 वर्षीय गवाह से जिरह का आखिरी मौका, याचिकाकर्ता पर 15,000 रुपये का जुर्माना

दिल्ली हाईकोर्ट ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में निचली अदालत के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें एक याचिकाकर्ता द्वारा वरिष्ठ नागरिक गवाह से जिरह (Cross-examination) करने का अधिकार समाप्त कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने “न्याय के हित” को सर्वोपरि बताते हुए याचिकाकर्ता को जिरह के लिए एक अंतिम अवसर प्रदान किया है, हालांकि इसके लिए विपक्षी पक्ष को हर्जाना देने की शर्त रखी गई है।

यह मामला भारतीय संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत दायर एक याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट के समक्ष आया था। याचिकाकर्ता ‘लक्ष्मण’ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 22 दिसंबर, 2025 को पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें गवाह RW-2/1 (एक 85 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक) से जिरह करने का अवसर बंद कर दिया गया था।

न्यायमूर्ति रजनीश कुमार गुप्ता ने मामले की सुनवाई करते हुए याचिका का निपटारा किया। उन्होंने टिप्पणी की कि मामले में हुई पिछली देरी के बावजूद जिरह की अनुमति देना न्यायसंगत होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद साल 2016 से लंबित एक प्रोबेट मामले (PC-02/2016) से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, प्रतिवादी पक्ष के साक्ष्य (Defense Evidence) को शुरू में 9 जुलाई, 2025 को बंद कर दिया गया था। इसके बाद, याचिकाकर्ता के आवेदन पर ट्रायल कोर्ट ने लागत के भुगतान और गवाह की उपलब्धता की शर्त पर RW-2/1 से जिरह का एक अतिरिक्त मौका दिया था।

22 दिसंबर, 2025 को जब यह मामला जिरह के लिए सूचीबद्ध हुआ, तो ट्रायल कोर्ट ने गवाह की उम्र (85 वर्ष) को देखते हुए याचिकाकर्ता के वकील को उसी दिन कार्यवाही पूरी करने का निर्देश दिया था। हालांकि, लंच ब्रेक से पहले के सत्र के बाद, वकील ने अदालत को सूचित किया कि वह दूसरे मामले में व्यस्त होने के कारण लंच के बाद उपस्थित नहीं हो सकते। इस पर ट्रायल कोर्ट ने जिरह का अवसर बंद कर दिया और मामले को अंतिम बहस के लिए तय कर दिया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि यदि उन्हें RW-2/1 से जिरह करने का मौका नहीं दिया गया, तो इससे याचिकाकर्ता के मामले को “गंभीर नुकसान” (Prejudice) होगा। उन्होंने गवाह के परीक्षण के लिए एक अंतिम अवसर की मांग की।

दूसरी ओर, प्रतिवादी संख्या 1 और 2 (जो व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए) ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट पहले ही याचिकाकर्ता को “पर्याप्त अवसर” दे चुका है। उन्होंने आरोप लगाया कि वर्तमान याचिका केवल “मामले में देरी करने की रणनीति” के तहत दायर की गई है और इसे खारिज किया जाना चाहिए।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश की समीक्षा की, जिसमें कहा गया था:

“मैं याचिकाकर्ता को इस गवाह से जिरह करने का एक और अवसर देना उचित नहीं समझता। तदनुसार, RW2/1 से जिरह का अवसर बंद किया जाता है।”

न्यायमूर्ति गुप्ता ने मामले के इतिहास और परिस्थितियों पर गौर करते हुए कहा कि भले ही याचिकाकर्ता को पहले मौके मिले थे, लेकिन वर्तमान स्थिति हस्तक्षेप की मांग करती है। हाईकोर्ट ने कहा:

“मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, इस न्यायालय की राय है कि उक्त गवाह से जिरह करने के लिए याचिकाकर्ता को एक और अवसर देना न्याय के हित में होगा।”

न्यायालय का निर्णय

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की पाबंदी को हटाते हुए निम्नलिखित निर्देश दिए:

  1. याचिकाकर्ता को RW-2/1 से जिरह करने का एक और (अंतिम) अवसर दिया जाता है।
  2. यह अवसर विपक्षी पक्ष को 15,000 रुपये के भुगतान की शर्त पर दिया गया है।
  3. ट्रायल कोर्ट जिरह के लिए पहले से तय तारीख या अपनी सुविधानुसार कोई अन्य तारीख निर्धारित कर सकता है।
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इसी के साथ याचिका [CM(M) 430/2026] और लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया गया।

  • केस शीर्षक: लक्ष्मण बनाम डी वी सिंह एवं अन्य
  • केस संख्या: CM(M) 430/2026

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