कंपनी में किसी पद के बिना केवल ‘दैनिक कार्यों में शामिल’ होने का आरोप धारा 141 एनआई एक्ट के तहत जवाबदेही तय करने के लिए पर्याप्त नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने चेक बाउंस के एक मामले में आरोपी व्यक्ति के खिलाफ जारी समन आदेश और आपराधिक शिकायत को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल यह सामान्य आरोप लगाना कि वह कंपनी की “दिन-प्रतिदिन की व्यावसायिक गतिविधियों” में शामिल था, उसे कानूनी रूप से जिम्मेदार (Vicarious Liability) ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है, खासकर तब जब वह कंपनी में किसी औपचारिक पद पर न हो।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने फैसला सुनाते हुए कहा कि नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (NI) एक्ट की धारा 138 के तहत कंपनी द्वारा किए गए अपराध के लिए किसी व्यक्ति को धारा 141 के तहत तब तक दोषी नहीं माना जा सकता, जब तक कि शिकायत में स्पष्ट रूप से यह न दिखाया गया हो कि वह व्यक्ति अपराध के समय कंपनी के व्यवसाय के संचालन के लिए “प्रभारी” (In charge) और “जिम्मेदार” (Responsible) था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला शिकायतकर्ता शशि देवी द्वारा ‘मैसर्स फ़ोर्सिया कमोडिटी सॉल्यूशंस ओपीसी प्राइवेट लिमिटेड’ (एक व्यक्ति वाली कंपनी), उसकी एकमात्र निदेशक रत्ना शर्मा और याचिकाकर्ता राम कुमार पाठक के खिलाफ दायर शिकायत से शुरू हुआ था।

शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ता और निदेशक ने उन्हें 2015 में ₹6,000,000 निवेश करने के लिए प्रेरित किया था। आंशिक भुगतान के बाद, बकाया ₹400,000 के लिए एक चेक जारी किया गया, जिस पर निदेशक (आरोपी संख्या 2) के हस्ताक्षर थे। बैंक में प्रस्तुत करने पर चेक “रेफर टू ड्रॉअर” की टिप्पणी के साथ बाउंस हो गया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता कंपनी के दैनिक कार्यों में शामिल था और निदेशक के निर्देशों पर काम कर रहा था।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट ने 26 मई, 2018 को याचिकाकर्ता को समन जारी किया था। इसके खिलाफ दायर पुनरीक्षण याचिका को सत्र न्यायालय ने 28 जनवरी, 2019 को खारिज कर दिया, जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि पाठक न तो चेक जारी करने वाले थे और न ही उस पर उनके हस्ताक्षर थे। कॉर्पोरेट मामलों के मंत्रालय (MCA) के रिकॉर्ड के अनुसार, वह कंपनी के निदेशक, अधिकारी या कर्मचारी भी नहीं थे। यह तर्क दिया गया कि जब शिकायत में खुद स्वीकार किया गया है कि सह-आरोपी कंपनी की “एकमात्र निदेशक” है, तो पाठक की भूमिका को लेकर कोई पुख्ता सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि निवेश के लिए प्रेरित करने और चेक सौंपने में याचिकाकर्ता की सक्रिय भूमिका थी। यह तर्क दिया गया कि धारा 141 के तहत जिम्मेदारी केवल पद पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस पर निर्भर करती है कि क्या वह व्यक्ति व्यावहारिक रूप से कंपनी के मामलों का प्रबंधन कर रहा था।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने एनआई एक्ट की धारा 141 की वैधानिक योजना का विश्लेषण किया, जो कंपनियों द्वारा किए गए अपराधों से संबंधित है। कोर्ट ने कहा कि धारा 141 आपराधिक कानून में ‘विकैरियस लायबिलिटी’ के सामान्य नियम का एक अपवाद है, इसलिए इसकी व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के एस.एम.एस. फार्मास्यूटिकल्स लिमिटेड बनाम नीता भल्ला (2005) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि शिकायत में विशिष्ट आरोप होना अनिवार्य है। जस्टिस शर्मा ने अशोक शेवकरामनी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2023) मामले का भी उल्लेख किया और नोट किया:

“धारा 141 दंड प्रावधानों के मामले में सामान्य नियम का एक अपवाद है। केवल इसलिए कि कोई कंपनी के मामलों का प्रबंधन कर रहा है, वह स्वतः ही कंपनी के व्यवसाय के संचालन का प्रभारी या जिम्मेदार व्यक्ति नहीं बन जाता।”

हाईकोर्ट ने पाया कि शिकायत में ही याचिकाकर्ता को एकमात्र निदेशक के “निर्देशों के तहत कार्य करने वाला” बताया गया था। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“शिकायतकर्ता द्वारा रिकॉर्ड पर ऐसी कोई सामग्री नहीं रखी गई है जो यह संकेत दे कि याचिकाकर्ता कंपनी में किसी भी पद पर था, यहाँ तक कि एक कर्मचारी के रूप में भी नहीं। इसलिए, याचिकाकर्ता की आरोपी कंपनी में कोई भूमिका या स्थिति नहीं है।”

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि याचिकाकर्ता ने निदेशक के साथ जाकर शिकायतकर्ता को निवेश के लिए प्रेरित किया या चेक सौंपा, तो भी ये कार्य (चाहे एक मित्र, सहयोगी या एजेंट के रूप में हों) धारा 141 के तहत आपराधिक उत्तरदायित्व तय करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के खिलाफ ‘विकैरियस लायबिलिटी’ आकर्षित करने के लिए आवश्यक आरोपों का “पूरी तरह अभाव” था।

“इस न्यायालय की राय है कि शिकायत के आरोप धारा 141 एनआई एक्ट के तहत तय वैधानिक सीमा को पूरा नहीं करते हैं।”

इसी के साथ, हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए राम कुमार पाठक के खिलाफ जारी समन आदेश और शिकायत (CC No. 749/2018) को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अन्य आरोपियों के खिलाफ मामले की कार्यवाही जारी रहेगी।

केस का विवरण:

केस का शीर्षक: राम कुमार पाठक बनाम शशि देवी और अन्य

केस संख्या: CRL.M.C. 1143/2019

पीठ: जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा

दिनांक: 27 फरवरी, 2026

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