दिल्ली हाईकोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार: हिमायनी पुरी मानहानि मामले में पोस्ट हटाने का आदेश बरकरार

दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार को उस अंतरिम आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें एक कार्यकर्ता को केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की बेटी हिमायनी पुरी के खिलाफ सोशल मीडिया पोस्ट हटाने का निर्देश दिया गया था। इन पोस्ट में हिमायनी पुरी का संबंध कुख्यात अमेरिकी यौन अपराधी जेफरी एपस्टीन से जोड़ने की कोशिश की गई थी।

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेनू भटनागर की खंडपीठ ने कार्यकर्ता कुणाल शुक्ला की अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने शुक्ला को निर्देश दिया कि वे अपनी आपत्तियां उसी सिंगल जज के समक्ष रखें, जिन्होंने मूल रूप से यह निषेधाज्ञा (Injunction) जारी की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सिंगल जज बिना किसी पूर्व टिप्पणियों से प्रभावित हुए इस मामले पर जल्द से जल्द फैसला लें कि अंतरिम रोक को बरकरार रखा जाए या हटा दिया जाए।

यह कानूनी विवाद हिमायनी पुरी द्वारा दायर 10 करोड़ रुपये के मानहानि के मुकदमे से जुड़ा है। पेशे से इन्वेस्टमेंट प्रोफेशनल हिमायनी का आरोप है कि उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर एक “सुनियोजित और दुर्भावनापूर्ण अभियान” चलाया जा रहा है। इस अभियान के तहत उन्हें जेफरी एपस्टीन और उसके अपराधों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

याचिका के अनुसार, 22 फरवरी 2026 के आसपास एक्स (पूर्व में ट्विटर), यूट्यूब और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर यह भ्रामक सामग्री प्रसारित की गई। पुरी का कहना है कि उन्हें केवल इसलिए निशाना बनाया जा रहा है क्योंकि वह केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री की बेटी हैं।

सुनवाई के दौरान कुणाल शुक्ला की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विकास सिंह ने 17 मार्च को सिंगल जज द्वारा पारित “गैग ऑर्डर” (चुप रहने का आदेश) को चुनौती दी। सिंह ने तर्क दिया कि यह आदेश अपीलकर्ता को अपना पक्ष रखने या जवाब देने का पर्याप्त अवसर दिए बिना ही पारित कर दिया गया।

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सिंह ने सवाल उठाया, “फरवरी में प्रकाशित सामग्री पर मुझे दो दिन का समय न देने की क्या जल्दी थी?” उन्होंने आरोप लगाया कि सिंगल जज ने पुरी के बयानों को “अंतिम सत्य” मान लिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि शुक्ला द्वारा पोस्ट की गई सामग्री केवल “सवालिया” थी और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों व आधिकारिक दस्तावेजों पर आधारित थी।

वहीं, हिमायनी पुरी की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट महेश जेठमलानी ने अपील का विरोध किया और मानहानि वाली सामग्री के प्रसार को रोकने के लिए अदालत के आदेश को जरूरी बताया।

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कोर्ट का निर्णय और समयसीमा

खंडपीठ ने पोस्ट हटाने के आदेश पर रोक लगाने से तो मना कर दिया, लेकिन प्रक्रिया में तेजी लाने का निर्देश दिया। कोर्ट ने शुक्ला को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक हफ्ते का समय दिया है।

बेंच ने निर्देश दिया, “इस मामले को 23 अप्रैल को विद्वान सिंगल जज के समक्ष रखा जाए।” हालांकि, अदालत ने पूरी सुनवाई (Trial) में तेजी लाने की मांग को यह कहते हुए अस्वीकार कर दिया कि वे इस स्तर पर कोई टिप्पणी नहीं करेंगे और पक्षकारों को अपनी बात सिंगल जज के सामने ही रखनी चाहिए।

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यह विवाद “एपस्टीन फाइल्स” से जुड़ा है, जो जेफरी एपस्टीन और उसकी सहयोगी घिसलेन मैक्सवेल द्वारा किए गए यौन तस्करी के अपराधों से संबंधित हजारों पन्नों के दस्तावेज हैं। 2019 में एपस्टीन की हिरासत में मौत के बाद से ये दस्तावेज सार्वजनिक चर्चा का विषय रहे हैं। हिमायनी पुरी ने अपने मुकदमे में इन नेटवर्कों के साथ किसी भी संबंध से पूरी तरह इनकार किया है।

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