दिल्ली हाईकोर्ट ने शुक्रवार को रोहिणी स्थित एक निजी अस्पताल को निर्देश दिया कि वह एक 12 वर्षीय गंभीर रूप से घायल बच्चे का इलाज आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) श्रेणी में करे और उसके माता-पिता से कोई शुल्क न ले।
जस्टिस प्रतिभा एम. सिंह और जस्टिस मनीत पी.एस. अरोड़ा की खंडपीठ ने एक समाचार रिपोर्ट पर सुओ मोटू संज्ञान लिया, जिसमें बताया गया था कि ऋषभ सिंह परिहार, जो 19 अगस्त को बिल्डिंग से गिरकर गंभीर रूप से घायल हो गया था, को वेंटिलेटर की तत्काल जरूरत थी। सरकारी अस्पतालों में वेंटिलेटर बेड उपलब्ध न होने के कारण उसके पिता, जो दिहाड़ी मजदूर हैं, मजबूरी में उसे श्री अग्रसेन इंटरनेशनल हॉस्पिटल ले गए।
खंडपीठ ने बच्चे के चाचा से फोन पर बातचीत भी की। प्रारंभ में अदालत उसे सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करने पर विचार कर रही थी, लेकिन बच्चे की हालत में सुधार देखते हुए उसे वर्तमान अस्पताल से न हटाने का निर्णय लिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि अगले आदेश तक बच्चे का इलाज ईडब्ल्यूएस श्रेणी में किया जाएगा और अस्पताल अभिभावकों से कोई शुल्क नहीं मांगेगा। अदालत ने कहा—
“बच्चे को ईडब्ल्यूएस श्रेणी में माना जाएगा और अगली सुनवाई तक अस्पताल माता-पिता से कोई भुगतान नहीं मांगेगा। इस संबंध में नोटिस जारी किया जाए।”
मामले की अगली सुनवाई 2 सितंबर को होगी। आदेश अस्पताल प्रशासन को भी भेजा गया है।
समाचार रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी अस्पताल में शुरुआती इलाज के कुछ दिनों बाद बच्चे को तेज सिरदर्द, नकसीर और उल्टी की शिकायत हुई, जिसके बाद उसे निजी अस्पताल ले जाना पड़ा। परिवार ने अंबेडकर अस्पताल में भर्ती की कोशिश की लेकिन दो बार मना कर दिया गया और उन्हें जी.बी. पंत या सफदरजंग अस्पताल जाने की सलाह दी गई।
बच्चे के पिता, जो महीने में कुछ हज़ार रुपये ही कमाते हैं, अब तक इलाज पर करीब ₹2 लाख खर्च कर चुके हैं और इसके लिए उधार लेना पड़ा है।
अदालत में पेश दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य सचिव ने बताया कि जैसे ही हॉस्पिटल मैनेजमेंट इंफॉर्मेशन सिस्टम (HMIS) पूरी तरह लागू होगा, सरकारी अस्पतालों में आईसीयू बेड की उपलब्धता वास्तविक समय (real-time) में लोगों को दिखाई देने लगेगी, जिससे ऐसी समस्याओं से बचा जा सकेगा।