दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल दावे करने से पारंपरिक तलाक (Customary Divorce) को वैध नहीं माना जा सकता। इसे साबित करने के लिए ठोस सबूतों और कानून की नजर में इसकी मान्यता को स्थापित करना अनिवार्य है।
न्यायमूर्ति अनिल क्षेत्रपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 11 के तहत एक विवाह को शून्य (Null and Void) घोषित किया गया था। अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता (पत्नी) यह साबित करने में विफल रही कि उसने दूसरी शादी करने से पहले अपनी पिछली शादी को वैध पारंपरिक तरीके से समाप्त कर लिया था।
मामले का कानूनी पहलू और परिणाम
अदालत के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या ‘जाट’ समुदाय में प्रचलित ‘रिवाज’ के आधार पर अपीलकर्ता ने अपने पहले पति से वैध पंचायती तलाक लिया था या नहीं। इसके आधार पर यह तय होना था कि क्या प्रतिवादी (पति) के साथ उसका दूसरा विवाह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) का उल्लंघन है। धारा 5(i) के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति का पति या पत्नी जीवित है, तो वह दूसरा विवाह नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा और माना कि विवाह शुरू से ही शून्य था।
केस की पृष्ठभूमि
यह अपील (MAT.APP. (F.C.) 281/2024) फैमिली कोर्ट द्वारा 7 जून, 2024 को दिए गए फैसले के खिलाफ दायर की गई थी।
मामले के अनुसार, अपीलकर्ता की पहले किसी अन्य व्यक्ति से शादी हुई थी। उसका दावा था कि 23 मई, 2009 को पारंपरिक तरीके से उसका तलाक हो गया था। वहीं, प्रतिवादी (पति) भी पहले से शादीशुदा था, लेकिन उसका तलाक सक्षम न्यायालय द्वारा 25 मई, 2009 को हो चुका था।
दोनों ने 16 मई, 2010 को विवाह किया और मार्च 2011 में उनका एक बेटा हुआ। बाद में दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया। प्रतिवादी ने कोर्ट में अर्जी दी कि यह शादी अवैध है क्योंकि शादी के वक्त अपीलकर्ता का पहला विवाह कायम था। प्रतिवादी ने कहा कि उसे इस तथ्य की जानकारी 25 सितंबर, 2013 को मिली, जिसके बाद उसने अक्टूबर 2013 में याचिका दायर की।
दूसरी ओर, अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि प्रतिवादी और उसके परिवार को उसकी पिछली शादी और तलाक के बारे में पहले से पता था। उसने दावा किया कि समुदाय के रीति-रिवाजों के अनुसार उसका तलाक पहले ही हो चुका था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता का तर्क: अपीलकर्ता ने कहा कि चूंकि दोनों पक्ष साथ रहे हैं और उनका एक बेटा भी है, इसलिए शादी को रद्द नहीं किया जाना चाहिए। उसने अपनी पहली शादी के खत्म होने के सबूत के तौर पर ‘जाट’ समुदाय के रीति-रिवाजों का हवाला दिया।
प्रतिवादी का तर्क: प्रतिवादी का कहना था कि हिंदू विवाह अधिनियम की शर्तों का उल्लंघन हुआ है, क्योंकि शादी के समय अपीलकर्ता का जीवनसाथी जीवित था, इसलिए यह शादी शुरू से ही अवैध है।
कोर्ट का विश्लेषण
खंडपीठ ने मुख्य रूप से दो सवालों पर विचार किया:
- क्या अपीलकर्ता यह साबित कर पाई कि ‘जाट’ समुदाय में पंचायती तलाक लेने का रिवाज कानूनन मान्य है?
- यदि हां, तो क्या वास्तव में अपीलकर्ता और उसके पूर्व पति के बीच वैध पंचायती तलाक हुआ था?
सबूतों का अभाव
अदालत ने पाया कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए सबूतों में भारी खामियां थीं:
- गवाहों के बयान: अपीलकर्ता ने अपने पिता (RW-2) और चाचा (RW-3) की गवाही दिलवाई, जो कि हितबद्ध गवाह (Interested Witnesses) थे। अन्य स्वतंत्र गवाहों (RW-4 और RW-5) ने स्वीकार किया कि वे उस कथित पंचायत बैठक में शामिल ही नहीं हुए थे जहां तलाक होने की बात कही गई थी।
- दस्तावेजी सबूत: अपीलकर्ता ने ‘तलाकनामा’ की एक फोटोकॉपी पेश की, जो 25 सितंबर, 2013 को तैयार की गई थी। गौर करने वाली बात यह है कि दूसरी शादी 2010 में ही हो चुकी थी। कोर्ट ने कहा:
“इस दस्तावेज को ध्यान से पढ़ने पर यह स्पष्ट होता है कि यह केवल अपीलकर्ता और उसके पूर्व पति के बीच एक समझौता है… इसमें किसी पंचायत या सम्मानित व्यक्तियों की बैठक का कोई जिक्र नहीं है।” - पंचायत का रिकॉर्ड नहीं: कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि जिस दस्तावेज पर भरोसा जताया गया, उसके लेखक (Scribe) या गवाहों में से किसी से पूछताछ नहीं की गई। कथित 2009 की पंचायत का कोई वैध ‘पंचायतानामा’ पेश नहीं किया गया।
कानूनी सिद्धांत
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (भीमाश्या बनाम जनाबी और यमानाजी एच. जाधव बनाम निर्मला) का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने दोहराया कि किसी भी रिवाज को मान्य होने के लिए ‘प्राचीन’, ‘निरंतर’ और ‘निश्चित’ होना चाहिए। चूंकि पारंपरिक तलाक सामान्य कानून का अपवाद है, इसलिए इसे साबित करने का पूरा भार उस पक्ष पर होता है जो इसका दावा कर रहा है।
फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता यह साबित करने में पूरी तरह विफल रही कि उसका तलाक समुदाय के रिवाज के अनुसार हुआ था। इसलिए, उसका दूसरा विवाह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5(i) का उल्लंघन है।
विवाह से जन्मे बच्चे के तर्क पर कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“धारा 11 के तहत ऐसे विवाह शून्य (Void) होते हैं। यह स्पष्ट है कि यदि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 5 की शर्तों का उल्लंघन करके कोई विवाह किया जाता है, तो वह अमान्य ही माना जाएगा।”
अंततः, हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और शादी को शून्य घोषित करने वाले फैमिली कोर्ट के फैसले पर मुहर लगा दी।

