दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि पति अपनी आय का सही ब्यौरा नहीं देता है, तो गुजारा भत्ता (Maintenance) तय करते समय उस राज्य के न्यूनतम वेतन (Minimum Wages) को आधार माना जाएगा जहां पति रहता और काम करता है, न कि उस राज्य के जहां कोर्ट स्थित है।
5 जनवरी 2026 को सुनाए गए इस फैसले में, जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने पारिवारिक न्यायालय (Family Court) के उस आदेश को पलट दिया जिसमें दिल्ली के मानकों को नजरअंदाज करते हुए पति की आय का सही आकलन नहीं किया गया था। कोर्ट ने पत्नी के अंतरिम भत्ते को ₹2,500 से बढ़ाकर ₹3,500 प्रति माह कर दिया।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। याचिकाकर्ता पत्नी और प्रतिवादी पति का विवाह जून 2021 में मुस्लिम रीति-रिवाजों से हुआ था। पत्नी का आरोप था कि दहेज की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया गया और जून 2022 में उसे ससुराल से निकाल दिया गया। इसके बाद उसने Cr.P.C. की धारा 125 के तहत भत्ते की मांग की।
पत्नी का दावा था कि उसका पति एक निजी स्कूल में शिक्षक है, ट्यूशन पढ़ाता है और किराना की दुकान भी चलाता है, जिससे उसकी कुल आय लगभग ₹70,000 प्रति माह है। दूसरी ओर, पति ने दावा किया कि वह उत्तर प्रदेश के साहिबाबाद में एक एनजीओ में काम करता है और महज ₹10,000 कमाता है। उसने यह भी कहा कि उसे अपने माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्यों का भरण-पोषण करना होता है।
पारिवारिक न्यायालय ने पति के दावे पर भरोसा करते हुए ₹2,500 का मामूली भत्ता तय किया था, जिसे पत्नी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?
हाईकोर्ट में पत्नी के वकील ने तर्क दिया कि पति ग्रेजुएट है और यह विश्वास करना मुश्किल है कि वह केवल ₹10,000 कमा रहा है। उन्होंने कोर्ट का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि पति ने अपने बैंक खाते की पूरी जानकारी नहीं दी और केवल 6 महीने का स्टेटमेंट पेश किया।
वहीं, पति के वकील ने दलील दी कि पत्नी खुद एक नर्सरी टीचर है और ₹10,000 कमाती है, इसलिए उसे भत्ते की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि पति इसके समर्थन में कोई सबूत पेश नहीं कर सका।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और फैसला
जस्टिस शर्मा ने अपने फैसले में कहा कि बिना सबूत के केवल यह कह देना कि पत्नी कमा रही है, पति को उसकी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं कर सकता।
पति की आय के आकलन पर कोर्ट ने तस्मीर कुरैशी बनाम असफिया मुजफ्फर (2025) के फैसले का हवाला देते हुए एक नया मानक स्थापित किया। कोर्ट ने कहा कि न्यूनतम वेतन के आधार पर आय तय करते समय तीन बातों का ध्यान रखना जरूरी है:
- सही राज्य की पहचान: पति किस राज्य में काम कर रहा है।
- कौशल श्रेणी (Skill Category): पति की शिक्षा और अनुभव क्या है।
- समय: जिस अवधि के लिए भत्ता मांगा गया है, उस समय वहां का न्यूनतम वेतन क्या था।
कोर्ट ने पाया कि पति उत्तर प्रदेश में रहता है और वहां काम करता है। इसलिए, दिल्ली के न्यूनतम वेतन का फॉर्मूला यहां लागू करना गलत होगा। चूंकि पति ग्रेजुएट है, उसे ‘कुशल श्रेणी’ (Skilled Category) में माना गया। उत्तर प्रदेश में उस समय एक कुशल कर्मचारी का न्यूनतम वेतन लगभग ₹13,200 था।
अंतिम निर्णय
कोर्ट ने पति की आय को ₹13,200 प्रति माह आंका और तदनुसार पत्नी का अंतरिम गुजारा भत्ता ₹2,500 से बढ़ाकर ₹3,500 प्रति माह कर दिया। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि पति को याचिका दायर करने की तारीख से बकाया राशि (Arrears) का भुगतान तीन महीने के भीतर करना होगा।

