दिल्ली हाईकोर्ट ने एक व्यक्ति पर ₹10,000 का जुर्माना लगाया, जिसने नाबालिग से दुष्कर्म के मामले को सामाजिक कलंक से बचाने के नाम पर रद्द करने की मांग की थी। अदालत ने उसकी दलील को ठुकराते हुए कहा कि समाज में कलंक पीड़िता पर नहीं, बल्कि अपराधी पर होना चाहिए।
न्यायमूर्ति गिरीश Kathpalia ने शुक्रवार को दिए फैसले में कहा, “यह कहना कम से कम आपत्तिजनक है कि मुकदमा चलने से पीड़िता पर कलंक लगेगा। कलंक तो अपराधी पर होना चाहिए, न कि उस लड़की पर जिसने दुष्कर्म जैसा भयावह कष्ट सहा। समाज की मानसिकता में बदलाव आना चाहिए और कलंक को आरोपी से जोड़ना चाहिए, न कि पीड़िता से।”
यह प्राथमिकी (FIR) पिछले वर्ष दर्ज की गई थी, जिसमें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की बलात्कार, अपहरण संबंधी धाराओं के साथ-साथ पॉक्सो (POCSO) अधिनियम की धारा 6 भी शामिल थी। नाबालिग पीड़िता ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने उसका वीडियो बनाकर उसे ब्लैकमेल किया और शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर किया।

आरोपी, जिसे फरार घोषित किया जा चुका था, ने हाईकोर्ट में दलील दी कि पीड़िता के माता-पिता उसके साथ समझौता कर चुके हैं और मुकदमे की कार्यवाही जारी रहने से लड़की पर सामाजिक कलंक लगेगा।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया और कहा कि यह निराधार है। न्यायमूर्ति ने स्पष्ट किया कि केवल पीड़िता ही, और वह भी विशेष कानूनी परिस्थितियों में, अपराधी को माफ कर सकती है—उसके माता-पिता नहीं। आदेश में कहा गया, “क्योंकि गलत आरोपी के हिस्से से पीड़िता को ही सहना पड़ा, इसलिए केवल वही क्षमा करने का अधिकार रखती है, न कि उसके माता-पिता।”
दिल्ली पुलिस ने भी याचिका का विरोध करते हुए बताया कि आरोपी लंबे समय से फरार था और आज की तारीख तक पीड़िता नाबालिग है।
अदालत ने न केवल याचिका को खारिज किया बल्कि आरोपी पर ₹10,000 का जुर्माना भी लगाया। यह निर्णय इस बात का कड़ा संदेश है कि नाबालिगों से यौन अपराध जैसे गंभीर मामलों को सामाजिक कलंक या समझौते के बहाने दबाने की कोई गुंजाइश नहीं है।