[डीवी एक्ट] अगर पत्नी स्वेच्छा से वैकल्पिक आवास में शिफ्ट हो गई है, तो वह पुराने वैवाहिक घर में जबरन प्रवेश का दावा नहीं कर सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (डीवी एक्ट) के तहत पत्नी किसी विशिष्ट संपत्ति के लिए निवास आदेश (residence order) की जिद नहीं कर सकती, यदि वह अपनी मर्जी से पति द्वारा उपलब्ध कराए गए वैकल्पिक आवास में शिफ्ट हो गई है और वह “बेघर” (roofless) नहीं है।

जस्टिस रविंदर डुडेजा की पीठ ने 81 वर्षीय बुजुर्ग महिला द्वारा दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने ग्रीन पार्क स्थित वैवाहिक घर में पुनः प्रवेश की मांग की थी। कोर्ट ने पाया कि यह मामला घरेलू हिंसा की शिकायत की आड़ में संपत्ति विवाद जैसा प्रतीत होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता रीना ग्रोवर का विवाह प्रतिवादी नंबर 1, रमेश ग्रोवर के साथ 1964 में हुआ था और वे दक्षिण दिल्ली के सी-7, ग्रीन पार्क स्थित वैवाहिक घर में रह रही थीं। 13 अप्रैल 2023 को, याचिकाकर्ता अपनी बेटी के घर बी-5/204, सफदरजंग एन्क्लेव में शिफ्ट हो गईं। बताया गया कि यह कदम उन्होंने अपनी सर्जरी के बाद देखभाल के लिए उठाया था।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि जब उन्होंने 8 जुलाई 2023 को ग्रीन पार्क वाले घर में वापस प्रवेश करने की कोशिश की, तो उन्हें जबरन रोक दिया गया। इसके बाद, उन्होंने डीवी एक्ट की धारा 19 और 23 के तहत आवेदन दायर किया।

मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट (एमएम) ने 29 फरवरी 2024 को उनका आवेदन खारिज कर दिया था। मजिस्ट्रेट ने नोट किया कि सफदरजंग एन्क्लेव की संपत्ति, जहां वह रह रही थीं, वह भी उनके पति की ही है। कोर्ट का मानना था कि पति का उस संपत्ति पर “रचनात्मक कब्जा” (constructive possession) था और उन्होंने इसे निवास के रूप में उपलब्ध कराया था। इसके बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश (ASJ) ने भी 7 सितंबर 2024 को इस आदेश के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया था।

पक्षकारों की दलीलें

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याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि वह 60 वर्षों से ग्रीन पार्क हाउस में निर्बाध रूप से रह रही थीं और केवल चिकित्सा उपचार के लिए अस्थायी रूप से बाहर गई थीं। यह दलील दी गई कि प्रतिवादी ने सफदरजंग एन्क्लेव संपत्ति के संबंध में अपनी बेटी के खिलाफ बेदखली का मुकदमा दायर किया है, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उन्होंने अपनी पत्नी को आश्रय प्रदान करने का दायित्व पूरा किया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि वह वर्तमान में गुरुग्राम में अपने पोते के साथ रह रही हैं और प्रभावी रूप से बेघर हैं।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि यह मुकदमा अनिवार्य रूप से एक संपत्ति विवाद है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता ने स्वेच्छा से ग्रीन पार्क हाउस छोड़ा था और अपनी बेटी के साथ सफदरजंग संपत्ति में शिफ्ट हो गई थीं। प्रतिवादियों ने जोर देकर कहा कि पति को याचिकाकर्ता के सफदरजंग एन्क्लेव संपत्ति में रहने पर कोई आपत्ति नहीं है, जो उनके स्वामित्व में है। उन्होंने यह भी बताया कि याचिकाकर्ता ने सफदरजंग वाले घर पर अपनी नेमप्लेट भी लगा ली थी, जो उनके शिफ्ट होने के सचेत निर्णय को दर्शाता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

जस्टिस डुडेजा ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री का अवलोकन करते हुए कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता आश्रयहीन नहीं हैं। कोर्ट ने नोट किया कि अपनी प्रारंभिक शिकायत और पुलिस रिपोर्टों में, याचिकाकर्ता ने सफदरजंग एन्क्लेव के पते को ही अपने निवास स्थान के रूप में सूचीबद्ध किया था।

कोर्ट ने डीवी एक्ट की धारा 19 के तहत निवास आदेशों के संबंध में निम्नलिखित प्रमुख कानूनी सिद्धांत निर्धारित किए:

1. अधिनियम का उद्देश्य: कोर्ट ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य सुरक्षात्मक और उपचारात्मक है। इसका उद्देश्य “पीड़ित व्यक्ति को किसी विशिष्ट संपत्ति में निवास करने का असीमित अधिकार प्रदान करना नहीं है, जब उसी स्तर का उपयुक्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध हो और की पेशकश की गई हो।”

2. साझा गृहस्थी (Shared Household): सुप्रीम कोर्ट के सतीश चंदर आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2021) के फैसले पर भरोसा जताते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि “साझा गृहस्थी” की व्यापक व्याख्या की आवश्यकता है, लेकिन यह तथ्यों पर आधारित निर्धारण है। जस्टिस डुडेजा ने टिप्पणी की:

“साझा गृहस्थी वर्तमान (in praesenti) में अस्तित्व में होनी चाहिए, न कि केवल ऐतिहासिक स्मृति में जीवित रहने वाली।”

3. स्वैच्छिक स्थानांतरण: कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता का कदम स्वैच्छिक था। कोर्ट ने कहा:

“डीवी एक्ट बेदखली के खिलाफ सुरक्षा सुनिश्चित करता है, यह पसंद से छोड़े गए निवास में बहाली के लिए बाध्य नहीं करता है।”

4. घरेलू हिंसा और आर्थिक शोषण: कोर्ट ने कहा कि चूंकि याचिकाकर्ता स्वेच्छा से अपने पति के स्वामित्व वाले वैकल्पिक निवास में शिफ्ट हो गई थीं, इसलिए पिछले घर में पुनः प्रवेश से इनकार करना आर्थिक शोषण नहीं माना जाएगा।

“नतीजतन, ग्रीन पार्क परिसर में पुनः प्रवेश से इनकार करना, इस मामले के तथ्यों में, आर्थिक शोषण की प्रकृति में घरेलू हिंसा का गठन नहीं करता है, क्योंकि वहां कोई जबरन बेदखली, जबरदस्ती या याचिकाकर्ता को बेघर करना शामिल नहीं था।”

निर्णय

हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि बहाली (restoration) के लिए मजबूर करने से ग्रीन पार्क संपत्ति में वर्तमान निवासियों का कब्जा बाधित होगा। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मांगी गई राहत “प्रभावी रूप से संपत्ति विवाद को घरेलू हिंसा की कार्यवाही में बदल देगी, जिसकी अनुमति नहीं है।”

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तदनुसार, याचिका खारिज कर दी गई।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: रीना ग्रोवर बनाम श्री रमेश ग्रोवर और अन्य
  • केस नंबर: CRL.M.C. 8722/2024
  • कोरम: जस्टिस रविंदर डुडेजा

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