दिल्ली हाईकोर्ट ने कथित TRF आतंकी को जमानत देने से किया इनकार, ‘प्रभाव’ व साक्ष्‍य से छेड़छाड़ की आशंका बताई

दिल्ली हाईकोर्ट ने “द रेजिस्टेंस फ्रंट” (TRF) के कथित सदस्य अर्सलान फिरोज अहेंगर की जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से उसकी आतंकियों से नज़दीकी और साक्ष्‍य से छेड़छाड़ की आशंका प्रबल प्रतीत होती है।

जस्टिस सुब्रहमण्यम प्रसाद और जस्टिस हरीश वैद्यनाथन शंकर की खंडपीठ ने 7 जुलाई को पारित आदेश में सितंबर 2024 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें अहेंगर की जमानत अर्जी नामंज़ूर की गई थी। अहेंगर की गिरफ्तारी 30 दिसंबर 2021 को हुई थी।

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राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के अनुसार, जम्मू‑कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद लश्कर‑ए‑तैयबा और TRF जैसे आतंकी संगठनों ने अल्पसंख्यकों, सुरक्षा बलों, राजनीतिक नेताओं व अन्य महत्वपूर्ण व्यक्तियों पर लक्षित हमले करने की साज़िश रची। इन साज़िशों के तहत अस्थिरता और भय पैदा करने के लिए कुछ हमले अंजाम भी दिए गए।

NIA ने आरोप लगाया कि अहेंगर की नज़दीकी slain आतंकी मेहरान यासीन शल्ला से थी, जिसे 24 नवंबर 2021 को मुठभेड़ में मार गिराया गया था। शल्ला के प्रभाव में आकर अहेंगर ने Ansar Gazwat‑ul‑Hind और Shaikoo Naikoo जैसे सोशल‑मीडिया समूह बनाए। वह फेसबुक, व्हाट्सऐप, टेलीग्राम, इंस्टाग्राम और ट्विटर पर उकसाऊ कंटेंट साझा कर युवाओं को TRF में शामिल होने के लिए प्रेरित करता था।

अदालत ने कहा, “रिकॉर्ड में उपलब्ध साक्ष्य दर्शाते हैं कि अपीलकर्ता ने आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले संदेश, चित्र व वीडियो साझा कर युवाओं को उकसाया है। वह TRF की कट्टर विचारधारा का प्रचार कर देश में अशांति फैलाने का प्रयास कर रहा था।”

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अदालत ने धारा 18 UAPA (आतंकवादी कृत्य के लिए उकसाना/दुष्प्रेरित करना) के तहत प्रथमदृष्टया मामला बनता मानते हुए कहा कि गंभीर राष्ट्रीय‑सुरक्षा निहितार्थों को देखते हुए जमानत नहीं दी जा सकती। लिहाज़ा अपील खारिज कर दी गई और अहेंगर न्यायिक हिरासत में ही रहेगा।

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