बेनामी एक्ट | ‘फिड्यूशरी रिलेशनशिप’ के अपवाद का दावा करने वाले मुकदमे को बिना ट्रायल खारिज नहीं किया जा सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट की एक खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसके तहत एक संपत्ति विवाद को बेनामी लेनदेन (निषेध) अधिनियम, 1988 के तहत प्रतिबंधित मानते हुए सरसरी तौर पर खारिज कर दिया गया था। खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि क्या कोई लेनदेन अधिनियम की धारा 4(3)(b) के तहत ‘फिड्यूशरी रिलेशनशिप’ (विश्वासश्रित संबंध) के अपवाद में आता है या नहीं, यह “कानून और तथ्य का मिश्रित प्रश्न” (mixed question of law and fact) है, जिसका निर्णय केवल दलीलों पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह अपील अमर एन. गुगनानी बनाम नरेश कुमार गुगनानी (मृतक, कानूनी वारिसों के माध्यम से), सुनीता गुगनानी व अन्य के मामले में दायर की गई थी। अपीलकर्ता ने एकल न्यायाधीश द्वारा पारित 30 जुलाई, 2015 के फैसले को चुनौती दी थी।

मामले के अनुसार, अपीलकर्ता अमेरिका (USA) का निवासी है। उसने वर्ष 2004 में नई दिल्ली के 33, उदय पार्क स्थित एक संपत्ति के संबंध में घोषणा, बेदखली और अन्य राहतों की मांग करते हुए एक दीवानी मुकदमा (CS (OS) No. 478/2004) दायर किया था। अपीलकर्ता का कहना था कि उसने अपने पिता, स्वर्गीय श्री जय गोपाल गुगनानी को प्लॉट खरीदने और घर बनाने के लिए पर्याप्त धनराशि भेजी थी। संपत्ति का पट्टा (perpetual lease deed) 1973 में पिता के नाम पर निष्पादित किया गया था।

अपीलकर्ता ने अपनी याचिका में दलील दी कि उसके पिता ने यह संपत्ति अपीलकर्ता के लाभ के लिए एक ‘फिड्यूशरी क्षमता’ (विश्वास के आधार पर) में अपने पास रखी थी। 1992 में पिता की मृत्यु के बाद, अपीलकर्ता ने संपत्ति की देखभाल के लिए अपने छोटे भाई (प्रतिवादी) के पक्ष में एक पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित की। बाद में दोनों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया, जिसके परिणामस्वरूप यह मुकदमा दायर किया गया।

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प्रतिवादी ने प्रारंभिक आपत्ति जताई कि यह मुकदमा बेनामी अधिनियम के प्रावधानों के तहत वर्जित है। वर्ष 2008 में इस मामले में इश्यूज (विवाद्यक) तय किए गए थे और इस रोक को साबित करने की जिम्मेदारी प्रतिवादी पर डाली गई थी। हालांकि, 2015 में एकल न्यायाधीश ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के समान अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए मुकदमे को खारिज कर दिया। एकल न्यायाधीश ने कहा कि यह लेनदेन बेनामी लेनदेन था और धारा 4(3)(b) के अपवाद में नहीं आता।

दलीलें

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि एकल न्यायाधीश ने गलती की है क्योंकि इश्यूज तय होने और ट्रायल शुरू होने के बाद मुकदमे को केवल पोषणीयता (maintainability) के आधार पर खारिज कर दिया गया। अपीलकर्ता के वकील ने मार्सेल मार्टिंस बनाम एम. प्रिंटर, (2012) 5 SCC 342 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि क्या लेनदेन वर्जित है या ‘फिड्यूशरी अपवाद’ में आता है, यह कानून और तथ्य का मिश्रित प्रश्न है।

यह भी तर्क दिया गया कि चूंकि वादपत्र में ‘फिड्यूशरी रिलेशनशिप’ के बारे में विशिष्ट दलीलें दी गई थीं, इसलिए कोर्ट को साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति देनी चाहिए थी। अपीलकर्ता ने कहा कि एकल न्यायाधीश की व्याख्या ने धारा 4(3)(b) को प्रभावी रूप से निष्प्रभावी बना दिया है।

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कोर्ट की टिप्पणियाँ और विश्लेषण

जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर की खंडपीठ ने पाया कि एकल न्यायाधीश ने पोषणीयता के मुद्दे को “कानून का विशुद्ध प्रश्न” माना था, क्योंकि अपीलकर्ता ने स्वीकार किया था कि संपत्ति पिता के नाम पर खरीदी गई थी।

हालांकि, खंडपीठ ने गौर किया कि वादपत्र में ‘फिड्यूशरी रिलेशनशिप’ के अस्तित्व के बारे में विशिष्ट दलीलें मौजूद थीं। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“वादपत्र में केवल ‘बेनामी’ शब्द का प्रयोग अपने आप में धारा 4(3)(b) के तहत वैधानिक अपवाद को समाप्त नहीं कर सकता, विशेष रूप से तब जब फिड्यूशरी रिलेशनशिप का गठन करने वाले मूलभूत तथ्यों को विशेष रूप से अभिवचन (pleading) में कहा गया हो।”

मार्सेल मार्टिंस के फैसले का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि फिड्यूशरी क्षमता का निर्धारण करने के लिए तथ्यात्मक संदर्भ पर विचार करना आवश्यक है। बेंच ने कहा:

“अपीलकर्ता के इस दावे की सत्यता कि उसके पिता ने वाद संपत्ति को फिड्यूशरी क्षमता में रखा था… का निर्णय केवल अभिवचनों और साक्ष्यों के पूर्ण मूल्यांकन पर ही किया जा सकता है।”

कोर्ट ने वर्तमान मामले को जे.एम. कोहली बनाम मदन मोहन साहनी के मामले से अलग बताया, जिस पर एकल न्यायाधीश ने भरोसा किया था। बेंच ने नोट किया कि जे.एम. कोहली में अस्पष्ट दलीलों के आधार पर मुकदमे को शुरुआत में ही खारिज कर दिया गया था, जबकि वर्तमान मामले में मुकदमा ट्रायल के चरण तक पहुंच गया था और इश्यूज तय हो चुके थे।

फैसला

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हाईकोर्ट ने माना कि एकल न्यायाधीश ने न्यायनिर्णयन प्रक्रिया (adjudicatory process) को छोटा करके गलती की है। बेंच ने फैसला सुनाया कि धारा 4(3)(b) के तहत अपवाद की प्रयोज्यता कानून और तथ्य का एक मिश्रित प्रश्न है।

“इसलिए, आक्षेपित बर्खास्तगी, समय से पहले तथ्य के एक विवादित मुद्दे का फैसला करने के समान है और इसके परिणामस्वरूप अपीलकर्ता को साक्ष्य प्रस्तुत करके अपने द्वारा बताए गए फिड्यूशरी रिलेशनशिप को स्थापित करने के उचित अवसर से वंचित किया गया है।”

नतीजतन, अपील को स्वीकार कर लिया गया और 30 जुलाई, 2015 के आक्षेपित आदेश को रद्द कर दिया गया। मामले को वापस एकल न्यायाधीश के पास भेज दिया गया है और पक्षों को 25 फरवरी, 2026 को पेश होने का निर्देश दिया गया है।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: अमर एन. गुगनानी बनाम नरेश कुमार गुगनानी (मृतक, कानूनी वारिसों के माध्यम से), सुनीता गुगनानी व अन्य
  • केस नंबर: RFA(OS) 89/2015
  • कोरम: जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस रेणु भटनागर

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