दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार में सहायता करने वाली महिला को सुनाई 10 साल की सजा; कहा- ‘अपराधिक व्यवहार का निरंतर पैटर्न’

दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2013 में अपने नाबालिग भाई द्वारा किए गए बलात्कार के अपराध में सहायता और उकसावे (Abetment) के लिए एक महिला को 10 साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। जस्टिस चंद्रशेखरन सुधा ने सजा का आदेश सुनाते हुए टिप्पणी की कि दोषी ने इस अपराध में “सक्रिय और जानबूझकर” भूमिका निभाई थी। अदालत ने यह भी नोट किया कि दोषी का पिछला आपराधिक रिकॉर्ड, जिसमें एक हत्या का मामला भी शामिल है, सुधार की गुंजाइश न होने और “अपराधिक व्यवहार के निरंतर पैटर्न” को दर्शाता है।

यह मामला 2013 का है, जो दिल्ली के नजफगढ़ इलाके में घटित हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, दोषी महिला ने कानून के उल्लंघन में शामिल अपने नाबालिग भाई के साथ मिलकर साजिश रची और उत्तरजीवी को नौकरी दिलाने का झांसा देकर एक सुनसान जगह पर बुलाया। वहां पहुंचने पर उसके भाई ने बलात्कार के अपराध को अंजाम दिया।

निचली अदालत ने 2015 में “संदेह का लाभ” देते हुए महिला को बरी कर दिया था। हालांकि, राज्य सरकार ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी। 23 फरवरी को हाईकोर्ट ने महिला को बरी करने के आदेश को रद्द करते हुए उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया, जिसके बाद 25 मार्च को सजा की अवधि निर्धारित की गई।

हालांकि शारीरिक रूप से बलात्कार का कृत्य उसके भाई ने किया था, लेकिन हाईकोर्ट ने अपराध को सुविधाजनक बनाने में महिला की भूमिका को गंभीर माना। जस्टिस सुधा ने कहा कि साक्ष्यों से यह स्पष्ट होता है कि दोषी ने “जानबूझकर अपराध को अंजाम देने में सहायता की थी।”

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अदालत ने अपने अवलोकन में कहा:

“दोषी ने उत्तरजीवी को धोखे से नौकरी का लालच दिया, उसे सुनसान जगह पर ले गई, हमले के दौरान वहां मौजूद रही, उत्तरजीवी को विरोध करने से रोका और उस क्षेत्र की निगरानी की। ये कृत्य स्पष्ट रूप से उकसावे (Abetment) की श्रेणी में आते हैं, क्योंकि ये पूर्व ज्ञान और इस मंशा के साथ किए गए थे कि उत्तरजीवी का यौन शोषण किया जा सके।”

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अदालत ने आगे कहा कि दोषी ने उस पर किए गए भरोसे को तोड़ा और रक्षक बनने के बजाय अपराध की संरक्षक के रूप में कार्य किया। वारदात के बाद महिला ने उत्तरजीवी को पुलिस को बताने पर जान से मारने और उसके परिवार को नुकसान पहुंचाने की धमकी भी दी थी।

सजा की अवधि तय करते समय अदालत ने दोषी के आपराधिक इतिहास पर कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस सुधा ने कहा कि यह मामला किसी एक घटना का परिणाम नहीं बल्कि निरंतर आपराधिक गतिविधियों का हिस्सा है।

अदालत ने स्पष्ट किया:

“ऐसे मामले में जहां दोषी लगातार गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल है, वहां उदार दृष्टिकोण अपनाना पूरी तरह से गलत होगा और यह सजा के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत होगा।”

अदालत ने दोषी को निम्नलिखित सजाएं सुनाईं:

  • धारा 109 (उकसावा) के साथ धारा 376 (बलात्कार) के तहत 10 साल का सश्रम कारावास और 50,000 रुपये का जुर्माना।
  • धारा 366 (अपहरण या महिला को मजबूर करना) के तहत 5 साल का सश्रम कारावास और 20,000 रुपये का जुर्माना।
  • धारा 506 भाग II (आपराधिक धमकी) और धारा 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) के तहत क्रमशः एक वर्ष और तीन महीने की सजा।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि ये सभी सजाएं एक साथ (Concurrently) चलेंगी।

न्याय के लिए एक दशक से अधिक समय तक कानूनी लड़ाई लड़ने वाली उत्तरजीवी के “गंभीर भावनात्मक, मानसिक और शारीरिक आघात” को स्वीकार करते हुए, हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जुर्माने की 50,000 रुपये की राशि उसे मुआवजे के रूप में दी जाए। साथ ही, दिल्ली राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण को उत्तरजीवी को और अधिक उचित मुआवजा प्रदान करने का निर्देश दिया गया है।

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