भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 439 के तहत ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते समय कोई भी हाईकोर्ट ऐसा शर्त नहीं लगा सकता जिससे कब्जा बहाल करने या संपत्ति विवाद का समाधान करने की स्थिति उत्पन्न हो। यह फैसला नजमा एवं अन्य बनाम इंस्पेक्टर ऑफ पुलिस एवं अन्य (क्रिमिनल अपील नं. ___ ऑफ 2025, SLP (Crl.) No. 7020/2019) मामले में आया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता नजमा और अन्य ने मद्रास हाईकोर्ट के 25 जुलाई 2019 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने CrPC की धारा 439 के तहत ज़मानत तो दी, लेकिन एक शर्त के साथ — कि वे विवादित संपत्ति का भूतल, 400 वर्ग फुट का निर्मित क्षेत्र और दूसरा पूरा मंज़िल दो सप्ताह के भीतर शिकायतकर्ता को सौंप दें।
अपीलकर्ताओं का तर्क था कि यह शर्त मूल रूप से एक दीवानी राहत प्रदान करने के समान है, और यह आपराधिक न्यायालय की सीमाओं से बाहर है।

कानूनी मुद्दा
क्या हाईकोर्ट, CrPC की धारा 439 के तहत ज़मानत देते समय, आरोपी से अचल संपत्ति का कब्जा शिकायतकर्ता को सौंपने की शर्त रख सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति मनमोहन की खंडपीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित किया।
“हाईकोर्ट, धारा 439 CrPC के अंतर्गत ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते समय कब्जे की बहाली का डिक्री पारित नहीं कर सकता,” कोर्ट ने कहा। कोर्ट ने इसे “निर्विवाद रूप से” आपराधिक ज़मानत क्षेत्राधिकार से बाहर बताया।
सर्वोच्च न्यायालय ने रमेश कुमार बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) [(2023) 7 SCC 461], सेंट जॉर्ज डिसूज़ा बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली) [(2023) SCC OnLine SC 1940], और दिलीप सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य [(2021) 2 SCC 779] जैसे पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक अदालतें ज़मानत के दौरान दीवानी संपत्ति अधिकारों पर निर्णय नहीं ले सकतीं।
कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा पारित शर्त संख्या 9[b] को विशेष रूप से रद्द कर दिया, जिसमें संपत्ति सौंपने की बात कही गई थी।
“ज़मानत की आपत्तिजनक शर्त, अर्थात् शर्त संख्या 9[b], को रद्द किया जाता है,” सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा।
साथ ही, पूर्व में अपीलकर्ताओं को दी गई अंतरिम सुरक्षा को स्थायी बना दिया गया और अपील को स्वीकार कर लिया गया।
दीवानी राहत या मध्यस्थता का विकल्प खुला
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह आदेश निजी पक्षों को हाईकोर्ट से संबद्ध मध्यस्थता केंद्र से संपर्क करने से नहीं रोकता।
“यह आदेश निजी पक्षों को हाईकोर्ट के मध्यस्थता केंद्र से संपर्क करने से नहीं रोकेगा… यदि मध्यस्थता से समाधान नहीं निकलता, तो शिकायतकर्ता दीवानी मुकदमे का सहारा ले सकते हैं जिसमें कब्जे की बहाली जैसी राहत मांगी जा सकती है।”
दोनों पक्षों की मध्यस्थता की इच्छा को दर्ज करते हुए कोर्ट ने उन्हें 30 अप्रैल 2025 को मद्रास हाईकोर्ट के मध्यस्थता केंद्र में पेश होने का निर्देश दिया।
पक्षकारों की ओर से पेश अधिवक्ता
अपीलकर्ताओं की ओर से (नजमा एवं अन्य):
- श्री एम. ए. चिनासामी (AOR)
- श्री सी. राघवेंद्रन, अधिवक्ता
- श्रीमती सी. रुबवती, अधिवक्ता
प्रत्युत्तर पक्ष की ओर से:
- श्री सबरीश सुब्रमणियन (AOR)
- श्री वैशाल त्यागी, श्री विष्णु उन्नीकृष्णन, सुश्री जान्हवी तनेजा, श्री दानिश सैफी
- श्री रत्नाकर डैश (वरिष्ठ अधिवक्ता)
- श्री शिल्प विनोद (AOR), श्री नवाज़ शेरिफ, श्री अरुण प्रकाश