पटना हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर रेप करने के आरोपी एक व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वयस्कों के बीच सहमति से बने संबंधों को केवल इसलिए आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता क्योंकि वह संबंध शादी में तब्दील नहीं हो सका।
जस्टिस सोनी श्रीवास्तव की बेंच ने मो. सैफ अली अंसारी द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, भागलपुर के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें याचिकाकर्ता की डिस्चार्ज याचिका (आरोप मुक्त करने की अर्जी) को खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन “तुच्छ और परेशान करने वाला” (frivolous and vexatious) था और भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 376 के तहत अपराध के आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से नहीं बनते हैं।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 26 अप्रैल 2019 को दर्ज की गई एक एफ.आई.आर. (जगदीशपुर थाना कांड संख्या 121/2019) से उत्पन्न हुआ था। इसमें आईपीसी की धारा 341, 376 और 379/34 के तहत आरोप लगाए गए थे। 25 वर्षीय सूचिका (पीड़िता) ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने शादी का प्रलोभन देकर एक साल तक उसका यौन शोषण किया।
एफ.आई.आर. के अनुसार, 22 अप्रैल 2019 को याचिकाकर्ता ने पीड़िता को शादी के लिए साथ चलने को कहा। वह घर से नकदी और जेवर लेकर उसके साथ उसके मामा के घर गई। आरोप था कि वहां याचिकाकर्ता के पिता आए और शादी का भरोसा दिलाया, जिसके बाद वे गांव लौट आए। बाद में, याचिकाकर्ता की मां ने भी शादी का आश्वासन दिया, लेकिन शादी कभी नहीं हुई। एफ.आई.आर. में कहा गया कि परिवार के अन्य सदस्य शादी में बाधा डाल रहे थे।
जांच के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामले का संज्ञान लिया गया। मामला सत्र न्यायालय (Sessions Court) में भेजा गया, जहां याचिकाकर्ता ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 227 के तहत डिस्चार्ज याचिका दायर की। 17 नवंबर 2021 को निचली अदालत ने इसे खारिज कर दिया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सैयद मस्लेह उद्दीन अशरफ ने तर्क दिया कि आईपीसी की धारा 376 का कोई अपराध नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि एफ.आई.आर. को देखने से ही पता चलता है कि याचिकाकर्ता और 25 वर्षीय पीड़िता एक साल से रिलेशनशिप में थे। उन्होंने दलील दी कि पीड़िता ने “खुली आंखों से” और बिना किसी डर या दबाव के शारीरिक संबंध बनाए थे।
वरिष्ठ वकील ने यह भी बताया कि धारा 164 Cr.P.C. के तहत दर्ज बयान में पीड़िता ने यौन हमले का जिक्र नहीं किया, बल्कि याचिकाकर्ता के माता-पिता द्वारा दिए गए आश्वासनों की बात कही। यह दर्शाता है कि शुरुआत में शादी का इरादा वास्तविक (bona fide) था, जो ‘तथ्य की गलतफहमी’ (misconception of fact) के दावे को खारिज करता है। इसके अलावा, मेडिकल रिपोर्ट में भी आरोपों की पुष्टि नहीं हुई।
इस दौरान जसपाल सिंह कौशल बनाम राज्य (2025) और प्रशांत बनाम राज्य (2025) जैसे सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों का हवाला दिया गया।
राज्य का पक्ष: राज्य की ओर से एपीपी भानु प्रताप सिंह ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि एफ.आई.आर. और जांच में मिले सबूत धारा 376 के तहत अपराध का गठन करते हैं। उनका कहना था कि पीड़िता का यौन शोषण “शादी के झूठे वादे” पर किया गया, जिसका अर्थ है कि उसने “तथ्य की गलतफहमी” के तहत सहमति दी थी, जो कानूनन सहमति नहीं मानी जाएगी।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने पाया कि पीड़िता 25 वर्ष की एक वयस्क महिला है और वह पिछले एक साल से याचिकाकर्ता के साथ रिश्ते में थी, जिससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह दो वयस्कों के बीच सहमति से बना संबंध था। कोर्ट ने “शादी का झूठा वादा” और “वादे का उल्लंघन” (breach of promise) के बीच अंतर करने की आवश्यकता पर जोर दिया।
झूठा वादा बनाम वादे का उल्लंघन: सुप्रीम कोर्ट के नईम अहमद बनाम राज्य (2023) के फैसले का हवाला देते हुए, बेंच ने कहा:
“झूठे वादे के मामले में, आरोपी का शुरू से ही शादी करने का कोई इरादा नहीं होता… जबकि वादे के उल्लंघन के मामले में, यह संभावना हो सकती है कि आरोपी ने पूरी गंभीरता के साथ वादा किया हो, लेकिन बाद में कुछ ऐसी परिस्थितियां आ गई हों जो उसके नियंत्रण से बाहर थीं… शादी के वादे के हर उल्लंघन को झूठा वादा मानना और धारा 376 के तहत मुकदमा चलाना गलत होगा।”
कोर्ट ने नोट किया कि पीड़िता ने खुद कहा है कि परिवार के सदस्यों के हस्तक्षेप के कारण शादी में बाधाएं आईं। कोर्ट ने कहा:
“मौजूदा मामले के तथ्यों और सामग्री से कहीं भी यह संकेत नहीं मिलता कि याचिकाकर्ता का इरादा शादी किए बिना उसका यौन शोषण करने का था।”
सहमति और तथ्य की गलतफहमी: प्रमोद सूर्यभान पवार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2019) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि सहमति को दूषित मानने के लिए यह साबित करना होगा कि शादी का वादा झूठा था, गलत नीयत से दिया गया था और वादा करते समय उसे पूरा करने का कोई इरादा नहीं था। कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि रिकॉर्ड पर ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे यह पता चले कि पीड़िता ने केवल झूठे वादे के कारण संबंध बनाए थे।
विफल रिश्तों पर न्यायिक मिसालें: कोर्ट ने प्रशांत बनाम राज्य (2025) के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था:
“सहमति देने वाले जोड़े के बीच रिश्ते का टूट जाना आपराधिक कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं हो सकता। जो रिश्ता शुरुआती दौर में सहमति से था, उसे केवल इसलिए आपराधिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह शादी में तब्दील नहीं हो पाया।”
इसके अलावा, समाधान बनाम महाराष्ट्र राज्य (2025) का भी उल्लेख किया गया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि स्वैच्छिक रिश्ते के मामलों में अभियोजन जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
फैसला
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि पीड़िता ने अपनी उम्र और परिपक्वता के आधार पर शारीरिक संबंध बनाने का एक सचेत और सूचित निर्णय लिया था।
जस्टिस सोनी श्रीवास्तव ने अपने आदेश में कहा:
“आईपीसी की धारा 376 के तहत आपराधिक मुकदमा केवल इस कारण से शुरू करने या जारी रखने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि एक सहमति देने वाले जोड़े के बीच का सौहार्दपूर्ण और सहमतिपूर्ण संबंध शादी के रिश्ते में नहीं बदल सका।”
कोर्ट ने माना कि अभियोजन को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसके साथ ही, हाईकोर्ट ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-प्रथम, भागलपुर द्वारा 17 नवंबर 2021 को पारित आदेश को रद्द कर दिया और याचिका स्वीकार कर ली।
केस डीटेल्स:
- केस टाइटल: मो. सैफ अली अंसारी बनाम बिहार राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 3303 of 2022
- कोरम: जस्टिस सोनी श्रीवास्तव
- याचिकाकर्ता के वकील: श्री सैयद मस्लेह उद्दीन अशरफ (वरिष्ठ अधिवक्ता), श्री सेहान अशरफ (अधिवक्ता)
- राज्य के वकील: श्री भानु प्रताप सिंह (एपीपी)

