नाबालिग पीड़िता की विश्वसनीय गवाही सजा के लिए पर्याप्त; ओरल पेनेट्रेशन भी बलात्कार की श्रेणी में आएगा: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि नाबालिग पीड़िता की गवाही स्वाभाविक और विश्वसनीय है, तो केवल उसी के आधार पर आरोपी को सजा दी जा सकती है और किसी अन्य सबूत से पुष्टि (Corroboration) की आवश्यकता नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने माना कि ‘ओरल पेनेट्रेशन’ (मुंह में गुप्तांग डालना) भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के तहत बलात्कार की परिभाषा में आता है।

मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा की डिवीजन बेंच ने 9 साल की बच्ची के साथ अप्राकृतिक कृत्य और बलात्कार के मामले में 20 वर्षीय दोषी की आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना 30 दिसंबर 2018 की है, जो बिलासपुर जिले के सीपत थाना क्षेत्र के मटियारी गांव में हुई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता की 9 वर्षीय बेटी (पीड़िता नंबर 1) और उसकी 7 वर्षीय भतीजी (पीड़िता नंबर 2) गाय खोजने के लिए घर से निकली थीं। रास्ते में आरोपी प्रीतम गिर उर्फ घिसलु ने उन्हें 5 रुपये का गुटखा और खाई लाने के लिए भेजा और फिर बछड़ा दिखाने के बहाने तालाब के पास ले गया।

आरोपी ने वहां 9 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म किया। घर लौटने पर पीड़िता ने अपने पिता को बताया कि आरोपी ने उसके साथ गलत काम किया है, जिससे उसे अत्यधिक दर्द और रक्तस्राव हो रहा था। पुलिस ने जांच के बाद आरोपी के खिलाफ आईपीसी की धारा 376AB और पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) की धारा 4 और 6 के तहत चार्जशीट दाखिल की।

बिलासपुर की विशेष अदालत (फास्ट ट्रैक) ने 12 अगस्त 2022 को आरोपी को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी, जिसे आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (दोषी) के वकील श्री कमरुल अजीज ने तर्क दिया कि निचली अदालत ने सबूतों का सही मूल्यांकन नहीं किया। उन्होंने कहा कि पीड़ितों के बयान अनुमानों पर आधारित हैं और विश्वसनीय नहीं हैं। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि पीड़िता की उम्र साबित करने के लिए कोई ऑसिफिकेशन टेस्ट (Ossification Test) नहीं कराया गया, इसलिए दोषसिद्धि को रद्द किया जाना चाहिए।

राज्य की ओर से सरकारी अधिवक्ता श्री प्रियंक राठी ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी ने एक नाबालिग के साथ जघन्य अपराध किया है। अभियोजन पक्ष ने बहला-फुसलाकर ले जाने (Allurement) और बलात्कार के आरोपों को संदेह से परे साबित किया है।

कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और सबूतों का बारीकी से परीक्षण किया और निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया।

उम्र का निर्धारण कोर्ट ने सबसे पहले पीड़िता की उम्र के मुद्दे पर विचार किया। सुप्रीम कोर्ट के जरनैल सिंह बनाम हरियाणा राज्य (2013) के फैसले और जुवेनाइल जस्टिस रूल्स, 2007 के नियम 12 का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि स्कूल का एडमिशन रजिस्टर उम्र का पुख्ता सबूत है। मटियारी के सरकारी प्राथमिक स्कूल के हेडमास्टर द्वारा प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार पीड़िता की जन्मतिथि 16 मार्च 2009 थी, जिससे घटना के समय उसकी उम्र 9 वर्ष सिद्ध होती है।

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बलात्कार और ओरल पेनेट्रेशन कोर्ट ने दोनों पीड़ित बच्चियों के बयानों को देखा, जिन्होंने स्पष्ट रूप से बताया कि आरोपी ने उन्हें निर्वस्त्र किया और अपना गुप्तांग (Urinal) उनके मुंह में डाला। पीड़िता नंबर 1 ने बताया कि इससे उसे खून भी आया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आईपीसी की धारा 375 के तहत यदि कोई पुरुष अपना पेनिस किसी महिला के मुंह, मूत्रमार्ग या गुदा में डालता है, तो यह बलात्कार की श्रेणी में आता है।

मेडिकल रिपोर्ट और एफएसएल (FSL) रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की, जिसमें पीड़िता के कपड़ों और आरोपी के कपड़ों पर वीर्य (Semen) और मानव शुक्राणु (Human Sperm) पाए गए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस प्रकार, पीड़िता के कपड़ों पर मानव शुक्राणु की उपस्थिति यह पुष्टि करती है कि आरोपी ने पीड़िता के साथ बलात्कार किया… आरोपी द्वारा किया गया ओरल पेनेट्रेशन कानून के तहत सीधे तौर पर बलात्कार और पेनेट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट की परिभाषा में आता है।”

बाल गवाह की विश्वसनीयता बचाव पक्ष के इस तर्क को खारिज करते हुए कि बच्चे विश्वसनीय गवाह नहीं होते, कोर्ट ने गणेशन बनाम राज्य और राज्य (एनसीटी दिल्ली) बनाम पंकज चौधरी के मामलों का हवाला दिया। बेंच ने कहा कि यदि किसी बाल पीड़िता (Prosecutrix) का बयान भरोसेमंद है, तो उसे किसी अन्य सबूत से पुष्ट करने की जरूरत नहीं है।

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“हमें पीड़ितों की विश्वसनीयता पर संदेह करने का कोई कारण नजर नहीं आता। वे विश्वसनीय पाई गई हैं। इसलिए, बिना किसी अन्य पुष्टि के, केवल पीड़ितों की गवाही के आधार पर आरोपी की सजा को बरकरार रखा जा सकता है।”

फैसला

हाईकोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है। बेंच ने अपील को योग्यताहीन बताते हुए खारिज कर दिया और आरोपी की आजीवन कारावास की सजा को यथावत रखा। कोर्ट ने निर्देश दिया कि जेल में बंद आरोपी अपनी शेष सजा भुगतेगा।

केस डीटेल्स:

केस टाइटल: प्रीतम गिर उर्फ घिसलु बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

केस नंबर: CRA No. 1540 of 2022

कोरम: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति अरविंद कुमार वर्मा

अपीलकर्ता के वकील: श्री कमरुल अजीज, अधिवक्ता

राज्य के वकील: श्री प्रियंक राठी, सरकारी अधिवक्ता

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