टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित; नियोक्ता के व्यावसायिक विवेक पर अपीलीय प्राधिकारी नहीं बन सकती अदालत: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि टेंडर और अनुबंध मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा अत्यंत सीमित है। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने कहा कि अदालत टेंडर की शर्तों या नियोक्ता (Employer) के व्यावसायिक विवेक (Commercial Wisdom) पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में नहीं बैठ सकती, बल्कि वह केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया (Decision-making process) की जांच कर सकती है।

हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी उस याचिका को खारिज करते हुए की, जिसमें एक स्टार्ट-अप (Start-up) ने टेंडर की शर्तों में अनुभव और टर्नओवर की छूट न मिलने को चुनौती दी थी। कोर्ट ने कहा कि जब तक निर्णय लेने की प्रक्रिया में कोई दुर्भावना, मनमानापन या पूर्वाग्रह साबित न हो, तब तक टेंडर की शर्तों और नीतिगत निर्णयों में न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, सिंघानिया फर्नीचर मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस प्रा. लि., जो कि एक मान्यता प्राप्त स्टार्ट-अप है, ने स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा फर्नीचर आपूर्ति के लिए जारी किए गए एक टेंडर नोटिस को चुनौती दी थी। इस टेंडर में पात्रता के लिए न्यूनतम औसत वार्षिक टर्नओवर ₹780 लाख और कुल बोली मात्रा का 80% पिछला प्रदर्शन (Past Performance) होना अनिवार्य किया गया था।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि ये शर्तें ‘स्टार्ट-अप इंडिया’ पहल और छत्तीसगढ़ स्टोर परचेज रूल्स, 2002 का उल्लंघन करती हैं, जिनमें स्टार्ट-अप्स के लिए अनुभव और टर्नओवर में छूट का प्रावधान है। टेंडर दस्तावेज में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था: “अनुभव और टर्नओवर के लिए स्टार्ट-अप छूट: नहीं।”

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री बी.पी. शर्मा ने तर्क दिया कि वैधानिक छूट से इनकार करना मनमाना और भेदभावपूर्ण है। उन्होंने कहा कि 80% पिछले प्रदर्शन की शर्त अनुचित है क्योंकि आपूर्ति को पांच बोलीदाताओं के बीच वितरित किया जाना है। उनका आरोप था कि ये शर्तें विशेष बोलीदाताओं को लाभ पहुंचाने के लिए “टेलर-मेड” (Tailor-made) हैं और यह समान अवसर के सिद्धांत का हनन करती हैं।

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प्रतिवादियों (राज्य) का पक्ष: राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री शशांक ठाकुर ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि उक्त टेंडर गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) पोर्टल के माध्यम से विशिष्ट नियमों के तहत जारी किया गया है। उन्होंने दलील दी कि ₹780 लाख के बड़े टेंडर मूल्य को देखते हुए, उच्च टर्नओवर और अनुभव की शर्त एक नीतिगत निर्णय है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि केवल सक्षम और कार्यशील उद्योग ही इसमें भाग लें और आपूर्ति निर्बाध रूप से हो सके।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने सरकारी अनुबंधों में न्यायिक हस्तक्षेप के सिद्धांतों का विश्लेषण किया। खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा:

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“संविदात्मक और टेंडर मामलों में न्यायिक समीक्षा का दायरा बेहद सीमित है। न्यायालय टेंडर की शर्तों या नियोक्ता के व्यावसायिक विवेक पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में नहीं बैठता है, बल्कि खुद को केवल निर्णय लेने की प्रक्रिया की जांच तक ही सीमित रखता है।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ स्टोर परचेज रूल्स, 2002 के तहत स्टार्ट-अप्स के लिए प्रोत्साहन का प्रावधान उन्हें पात्रता मानदंडों में छूट का कोई “निहित या कानूनी अधिकार” (Indefeasible Right) नहीं देता है, विशेष रूप से तब जब खरीद GeM पोर्टल के जरिए हो रही हो।

कोर्ट ने कहा कि नियोक्ता के पास आवश्यक शर्तों से विचलन करने या बेंचमार्क निर्धारित करने का अंतर्निहित अधिकार है, बशर्ते वह सभी बोलीदाताओं पर समान रूप से लागू हो। इस मामले में, 80% प्रदर्शन की शर्त सभी के लिए समान थी।

“हस्तक्षेप केवल तभी वारंट किया जाता है जब दुर्भावना, मनमानापन, पूर्वाग्रह या विकृति (Perversity) की दलील दी गई हो और उसे स्थापित किया गया हो। निर्णय लेने की प्रक्रिया में किसी भी कमी के अभाव में, टेंडर की शर्तें और खरीद प्राधिकरण के नीतिगत निर्णय न्यायिक हस्तक्षेप के अधीन नहीं हैं।”

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निर्णय

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता निर्णय लेने की प्रक्रिया में किसी भी तरह की दुर्भावना या मनमानापन साबित करने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा कि वह अधिकारियों के व्यावसायिक विवेक में हस्तक्षेप नहीं करेगा।

तदनुसार, कोर्ट ने कहा कि याचिका योग्यता से रहित है और भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत किसी भी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। परिणामस्वरूप, याचिका खारिज कर दी गई।

केस डिटेल्स

  • केस टाइटल: सिंघानिया फर्नीचर मैन्युफैक्चरिंग बिजनेस प्रा. लि. और अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यूपीसी (WPC) नंबर 382 ऑफ 2026
  • कोरम: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल
  • याचिकाकर्ता के वकील: श्री बी.पी. शर्मा
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री शशांक ठाकुर, अतिरिक्त महाधिवक्ता

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