छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Evidence Act), 1872 की धारा 90 के तहत 30 साल पुराने दस्तावेजों को सही मान लेने (Presumption of validity) का नियम वसीयत (Will) पर लागू नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि वसीयत चाहे कितनी भी पुरानी हो, उसे भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (Indian Succession Act), 1925 की धारा 63(c) और साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के तहत शक्ति से साबित करना अनिवार्य है।
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु की पीठ ने वादी पक्ष (Appellants) द्वारा दायर की गई दूसरी अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के उस फैसले को सही ठहराया, जिसमें केवल पुराने होने के आधार पर 1958 की एक पंजीकृत वसीयत को स्वीकार करने से इनकार कर दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला एक पारिवारिक संपत्ति विवाद से जुड़ा है। अपीलकर्ता (वादी) रामप्यारे और शिवशंकर ने विवादित जमीन पर मालिकाना हक, कब्जा और स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए एक दीवानी मुकदमा दायर किया था।
उनका दावा था कि उनके दादा महादेव ने 12 अगस्त, 1958 को एक पंजीकृत वसीयत निष्पादित की थी, जिसके जरिए उन्होंने अपनी कृषि भूमि वादी के पिता रामावतार (महादेव के भतीजे) के नाम कर दी थी। वादी का कहना था कि 1988 में महादेव और 1998 में रामावतार की मृत्यु के बाद वे जमीन के मालिक बन गए। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रतिवादी रामकिशुन (रामावतार के भाई और वादी के चाचा) ने 2007-08 में जबरन जमीन पर कब्जा कर लिया।
दूसरी ओर, प्रतिवादी रामकिशुन ने वसीयत की वैधता को चुनौती दी। उनका तर्क था कि पिता जगदेव और चाचा महादेव की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति का रामावतार और उनके बीच आपसी बंटवारा हो चुका था। उन्होंने दावा किया कि महादेव का रामावतार के प्रति कोई विशेष स्नेह नहीं था और प्रस्तुत की गई वसीयत फर्जी है।
ट्रायल कोर्ट ने वसीयत (प्रदर्श P-2) को कानूनी आवश्यकताओं के अनुसार साबित न होने के कारण खारिज कर दिया था। प्रथम अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को बरकरार रखा, जिसके बाद मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
वकीलों की दलीलें
अपीलकर्ताओं के वकील श्री हेमंत कुमार अग्रवाल ने तर्क दिया कि विवादित जमीन 40 वर्षों से उनके कब्जे में थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि वसीयत 28 नवंबर, 1958 को पंजीकृत की गई थी, इसलिए यह 30 साल से अधिक पुराना दस्तावेज है।
वकील की दलील थी कि चूंकि वसीयत के सभी अनुप्रमाणक साक्षी (Attesting Witnesses) की मृत्यु हो चुकी है, इसलिए भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 90 के तहत वसीयत के सही निष्पादन की उपधारणा (Presumption) की जानी चाहिए। इसके लिए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया।
कोर्ट का विश्लेषण और फैसला
जस्टिस बिभु दत्ता गुरु ने अपीलकर्ताओं की इस दलील को खारिज कर दिया कि दस्तावेज के पुराने होने से उसे साबित करने की औपचारिक आवश्यकता खत्म हो जाती है। कोर्ट ने पाया कि भले ही वसीयत लिखने वाले (Scribe) और गवाहों की मृत्यु हो चुकी है, लेकिन वादी ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 69 के तहत निर्धारित तरीके से वसीयत को साबित करने का प्रयास नहीं किया।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने स्थिति स्पष्ट की:
- एम.बी. रमेश (मृत) बनाम के.एम. वीरजे उर्स (2013): कोर्ट ने कहा, “30 साल पुराने दस्तावेजों के संबंध में उपधारणा वसीयत पर लागू नहीं होती। वसीयत को उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 63(c) और साक्ष्य अधिनियम की धारा 68 के तहत ही साबित किया जाना चाहिए।”
- आशुतोष सामंत बनाम रंजन बाला दासी (2023): सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भी यही सिद्धांत दोहराया था कि वसीयत को केवल उसकी उम्र के आधार पर साबित नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि वसीयत वसीयतकर्ता की मृत्यु के बाद ही प्रभावी होती है और उनके जीवनकाल में कभी भी रद्द की जा सकती है, इसलिए “केवल प्राचीन होने के आधार पर इसकी वास्तविकता की उपधारणा नहीं की जा सकती।”
कोर्ट ने पाया कि वादी के गवाहों ने केवल वसीयत के निष्पादन की बात कही, लेकिन किसी ने भी इसे कानूनी रूप से साबित नहीं किया।
निष्कर्ष
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल वसीयत का पंजीकृत (Registered) होना गवाहों द्वारा उसे साबित करने की अनिवार्यता को खत्म नहीं करता। कोर्ट ने माना कि निचली अदालतों के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है और न ही यह कोई ‘कानून का सारवान प्रश्न’ (Substantial Question of Law) है। तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई।
केस विवरण
- केस टाइटल: रामप्यारे और अन्य बनाम रामकिशुन और अन्य
- केस नंबर: SA No. 183 of 2021
- कोरम: जस्टिस बिभु दत्ता गुरु
- अपीलकर्ताओं के वकील: श्री हेमंत कुमार अग्रवाल
- राज्य के वकील: श्री संतोष सिंह, जी.ए.

