छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल “मौखिक बंटवारे” (Oral Partition) की दलील देकर किसी बेटी को पैतृक संपत्ति में उसके सहदायिक (Coparcener) अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6(1) के तहत केवल वही बंटवारा मान्य होगा जो 20 दिसंबर 2004 से पहले किसी “पंजीकृत दस्तावेज” (Registered Instrument) या सक्षम न्यायालय की डिक्री द्वारा किया गया हो।
न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु की पीठ ने निचली अदालतों के फैसलों को पलटते हुए यह निर्णय सुनाया और कहा कि कानून का उद्देश्य लैंगिक भेदभाव को मिटाना है, न कि बेटियों को उनके अधिकार से वंचित करना।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला अमरीका बाई (अपीलकर्ता) की लंबी कानूनी लड़ाई से जुड़ा है। अमरीका बाई ने पैतृक कृषि भूमि के बंटवारे के लिए सिविल सूट दायर किया था। उनका कहना था कि उनके पिता, धनुक लोधी, को पुश्तैनी रूप से 6.30 एकड़ जमीन मिली थी।
अमरीका बाई का आरोप था कि उनके पिता ने अपनी दूसरी पत्नी भगवती बाई के प्रभाव में आकर पुश्तैनी जमीन का बड़ा हिस्सा (लगभग 5.50 एकड़) दूसरी पत्नी से जन्मे बेटों के नाम कर दिया और अपने पास केवल थोड़ा सा हिस्सा रखा। अमरीका बाई, जो धनुक की पहली पत्नी हेमकंवर बाई की बेटी हैं, ने दावा किया कि पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया था और गुजारे के लिए केवल 1.25 एकड़ जमीन दी थी, जिसमें से भी कुछ हिस्सा उन्होंने बाद में अवैध रूप से बेच दिया।
निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत ने अमरीका बाई की याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 6 के प्रावधानों के तहत 20 दिसंबर 2004 से पहले हुआ संपत्ति का निपटारा मान्य है और इसमें हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता। इसके खिलाफ अमरीका बाई ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
दलीलें और कानूनी पेंच
अपीलकर्ता के वकील, पराग कोटेचा ने तर्क दिया कि निचली अदालतों ने एक “अप्रमाणित मौखिक बंटवारे” पर भरोसा करके गलती की है। उन्होंने कहा कि वादी (अमरीका बाई) जन्म से ही सहदायिक (Coparcener) है और बेटों के नाम जमीन ट्रांसफर करना उसके विरासत के अधिकारों को खत्म करने की साजिश थी।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों के वकील संजय पटेल ने दलील दी कि अमरीका बाई को उनके पिता के जीवनकाल में ही 1.00 एकड़ जमीन और घर का हिस्सा दे दिया गया था। ग्रामीणों के बीच हुए इस बंटवारे को आधार बनाते हुए उन्होंने कहा कि यह मामला कानून के “सेविंग क्लॉज” के अंतर्गत आता है, इसलिए बेटी का अब कोई दावा नहीं बनता।
हाईकोर्ट का निर्णय: मौखिक बंटवारा मान्य नहीं
न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु ने मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि धारा 6 में संशोधन का मुख्य उद्देश्य बेटियों के खिलाफ भेदभाव को खत्म करना था।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“धारा 6(1) का परंतु (Proviso) केवल उसी बंटवारे या निपटान को सुरक्षित रखता है जो 20 दिसंबर 2004 से पहले हुआ हो। हालांकि, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने विनीता शर्मा मामले में स्पष्ट किया है, यह सुरक्षा केवल तभी मिलेगी जब बंटवारा किसी ‘पंजीकृत दस्तावेज’ या ‘न्यायालय की डिक्री’ द्वारा किया गया हो। मौखिक बंटवारा या अपंजीकृत पारिवारिक समझौता, भले ही उसकी दलील दी गई हो, कानून की नजर में मान्य बंटवारा नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने यह भी माना कि पिता द्वारा बेटी को जीवनकाल में दी गई जमीन और घर का हिस्सा केवल उसके “गुजारे और निवास” की व्यवस्था थी। इसे किसी भी तर्क से पैतृक संपत्ति का “पूर्ण और अंतिम विभाजन” नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, प्रतिवादी यह साबित करने में भी विफल रहे कि पहली पत्नी से तलाक के लिए उनकी जाति में कोई विशेष प्रथा (Custom) मौजूद थी।
फैसला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले को निरस्त कर दिया। कोर्ट ने अमरीका बाई की अपील को स्वीकार करते हुए घोषित किया कि वह पैतृक संपत्ति में अपने वैध हिस्से की हकदार हैं। कोर्ट ने माना कि कानूनी रूप से मान्य बंटवारे के अभाव में, बेटी पुश्तैनी संपत्ति में सहदायिक बनी रहेगी।
केस डिटेल्स
- केस टाइटल: अमरीका बाई बनाम भगवती बाई व अन्य
- केस नंबर: SA No. 26 of 2012
- कोरम: न्यायमूर्ति विभू दत्त गुरु

