छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने पदोन्नति नियमों को लेकर एक महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने निर्धारित किया है कि ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ (Seniority-cum-Fitness) के आधार पर होने वाली पदोन्नति के लिए भी विभागीय पदोन्नति समिति (DPC) वार्षिक गोपनीय चरित्रावली (ACR) ग्रेडिंग के आधार पर न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित करने के लिए सशक्त है।
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू की खंडपीठ ने यह निर्णय एक रिफरेंस (Reference) पर सुनवाई करते हुए दिया। यह रिफरेंस एक विद्वान एकल न्यायाधीश द्वारा भेजा गया था, क्योंकि इस मुद्दे पर हाईकोर्ट की दो अलग-अलग एकल पीठों के निर्णयों में विरोधाभास था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रह्लाद सिंह गुणवान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य के मामले में दिया गया निर्णय सही है, जिसके तहत डीपीसी को योग्यता का आकलन करने का अधिकार है।
क्या था मामला?
यह मामला वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी (Senior Horticulture Development Officer) रूकम सिंह तोमर द्वारा दायर एक रिट याचिका से उत्पन्न हुआ था। याचिकाकर्ता ने सहायक संचालक (उद्यान) के पद पर अपने जूनियर, राघव स्वरूप वर्मा की पदोन्नति को चुनौती दी थी। 1 अप्रैल 2019 की वरिष्ठता सूची में याचिकाकर्ता का नाम 19वें स्थान पर था, जबकि प्रतिवादी (जूनियर) का नाम 20वें स्थान पर था। इसके बावजूद, 24 जून 2020 को हुई डीपीसी की बैठक में वरिष्ठ होने के बाद भी याचिकाकर्ता को दरकिनार कर उनके जूनियर को पदोन्नत कर दिया गया।
दो फैसलों में था विरोधाभास
सुनवाई के दौरान यह सामने आया कि इस कानूनी बिंदु पर पूर्व में दो अलग-अलग विचार व्यक्त किए गए थे:
- हरिकृष्ण पटेल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2025): इसमें कहा गया था कि ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ के मामले में डीपीसी कोई न्यूनतम बेंचमार्क तय नहीं कर सकती। पदोन्नति केवल वरिष्ठता के आधार पर होनी चाहिए, बशर्ते कर्मचारी के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी न हो।
- प्रह्लाद सिंह गुणवान बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2019): इसमें यह माना गया था कि डीपीसी को एसीआर ग्रेडिंग के आधार पर न्यूनतम बेंचमार्क निर्धारित करने का अधिकार है।
डिवीजन बेंच को यह तय करना था कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2003 के नियम 4(1) और नियम 6(5) के तहत कौन सा दृष्टिकोण सही है।
पक्षकारों की दलीलें
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि पदोन्नति का मापदंड पिछले पांच वर्षों की एसीआर के मूल्यांकन पर आधारित था। डीपीसी ने एक बेंचमार्क तय किया था जिसके अनुसार पिछले पांच वर्षों में न्यूनतम ग्रेडिंग ‘गुड’ (Good) होनी चाहिए, किसी भी वर्ष में ‘डी’ (D) ग्रेड नहीं होना चाहिए और कोई प्रतिकूल टिप्पणी नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ता को ‘सी’ (C) ग्रेड मिला था, इसलिए उन्हें पदोन्नति के लिए अयोग्य माना गया।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ता का कहना था कि चूंकि मापदंड ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ है और उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी या विभागीय जांच लंबित नहीं है, इसलिए उन्हें केवल कम ग्रेडिंग के आधार पर नहीं रोका जा सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू ने बेंच की ओर से फैसला लिखते हुए छत्तीसगढ़ लोक सेवा (पदोन्नति) नियम, 2003 का विश्लेषण किया।
- नियम 4: क्लास II से क्लास I पद पर पदोन्नति ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ (Seniority subject to fitness) के आधार पर होगी।
- नियम 6(5): यह नियम अनिवार्य करता है कि डीपीसी लोक सेवकों की ‘उपयुक्तता’ (Suitability) का आकलन उनके सेवा रिकॉर्ड और विशेष रूप से पिछले 5 वर्षों की एसीआर के आधार पर करेगी।
कोर्ट ने कहा कि हरिकृष्ण पटेल मामले में जिस राजेंद्र तिवारी केस का सहारा लिया गया था, वह 2003 के नियम लागू होने से पहले की पदोन्नति कार्यवाही से संबंधित था। इसके विपरीत, प्रह्लाद सिंह गुणवान का मामला 2003 के नियमों के तहत था।
बेंच ने अपने फैसले में स्पष्ट किया:
“यदि 2003 के नियमों के नियम 4 को नियम 6 के उप-नियम (5) के साथ पढ़ा जाए, तो यह स्पष्ट है कि भले ही कोई कर्मचारी पदोन्नति का आधार यानी ‘वरिष्ठता-सह-योग्यता’ को पूरा करता हो, फिर भी विभागीय पदोन्नति समिति के पास पदोन्नति के लिए लोक सेवक की उपयुक्तता का आकलन करने का अधिकार क्षेत्र है और नियम 6(5) में ‘करेगी’ (Shall) शब्द का उपयोग किया गया है।”
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ‘उपयुक्तता’ का आकलन करने के लिए डीपीसी द्वारा तय किया गया बेंचमार्क (न्यूनतम ‘गुड’ ग्रेडिंग और कोई ‘डी’ ग्रेड नहीं) वैधानिक नियमों के अनुरूप है।
अंततः, खंडपीठ ने रिफरेंस का उत्तर देते हुए घोषित किया कि प्रह्लाद सिंह गुणवान मामले में लिया गया दृष्टिकोण सही है। अब इस याचिका पर गुण-दोष के आधार पर फैसला लेने के लिए इसे रोस्टर के अनुसार सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया है।

