2008 के नियमों के तहत राजनीतिक/सामाजिक कारणों से निरुद्ध होने की शर्त पूरी न होने पर सम्मान निधि का दावा अस्वीकार्य: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रायपुर के एक 74 वर्षीय निवासी द्वारा दायर उस रिट अपील को खारिज कर दिया है, जिसमें लोक नायक जय प्रकाश नारायण (मीसा/डी.आई.आर. राजनीतिक या सामाजिक कारणों से निरुद्ध व्यक्ति) सम्मान निधि नियम, 2008 के तहत “सम्मान निधि” जारी करने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि सम्मान पाने के लिए दावेदार को यह साबित करना अनिवार्य है कि उसे केवल राजनीतिक या सामाजिक कारणों से ही जेल में रखा गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता, रामगुलाम सिंह ठाकुर ने दावा किया कि वे 1970 के दशक के दौरान एक सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और छात्र नेता थे। उन्होंने कहा कि उन्होंने राज्य सरकार की लेवी नीति के खिलाफ “किसान आंदोलन” में भाग लिया था और 25 जून 1975 को आपातकाल की घोषणा के बाद उन्हें आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (मीसा) के तहत हिरासत में ले लिया गया था। ठाकुर के अनुसार, वे 31 अगस्त 1975 से 10 जनवरी 1977 तक केंद्रीय जेल, रायपुर में बंद रहे।

साल 2009 में, उन्होंने सम्मान निधि के लिए आवेदन किया, जो आपातकाल के दौरान राजनीतिक या सामाजिक कारणों से जेल में रहे लोगों के लिए एक वित्तीय सम्मान योजना है। हालांकि, रायपुर के कलेक्टर ने पुलिस रिपोर्ट के आधार पर 2010 में उनका आवेदन खारिज कर दिया, जिसमें उल्लेख था कि उनके खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज थे। 30 अगस्त 2024 को एकल पीठ द्वारा उनकी रिट याचिका (WPC No.1046/2015) खारिज किए जाने के बाद, अपीलकर्ता ने डिवीजन बेंच का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील, श्री मनोज कुमार दुबे ने तर्क दिया कि मीसा के तहत निरोध मूल रूप से धारा 3(1)(a)(ii) के तहत राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित कारणों के लिए दिया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि 2008 के नियमों में “राजनीतिक या सामाजिक कारणों से निरुद्ध व्यक्ति” शब्दावली को शामिल करना मूल कानून के साथ असंगत था और इसे ‘अल्ट्रा वायर्स’ (शक्ति से बाहर) घोषित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि पुलिस द्वारा बताए गए मामले 1977 के बाद के हैं और अपीलकर्ता को कभी दोषी नहीं ठहराया गया।

वहीं, राज्य का प्रतिनिधित्व करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता श्री शशांक ठाकुर ने तर्क दिया कि 2008 के नियमों का नियम 6 विशेष रूप से उन लोगों तक लाभ को सीमित करता है जिन्हें “विशुद्ध रूप से राजनीतिक या सामाजिक कारणों से” हिरासत में लिया गया था और जिनका “कोई आपराधिक इतिहास या असामाजिक गतिविधियों में संलिप्तता” नहीं है। राज्य ने एक शपथ पत्र प्रस्तुत किया जिसमें दिखाया गया कि 1974 से 1986 के बीच अपीलकर्ता के खिलाफ 32 आपराधिक और असामाजिक मामले दर्ज किए गए थे, और उनका नाम वर्तमान निगरानी सूची (surveillance list) में भी शामिल है।

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कोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने नियम 6 के तहत पात्रता मानदंडों की जांच की। अदालत ने पाया कि राज्य ने विभिन्न पुलिस अधीक्षकों की रिपोर्ट पेश की है जिसमें कहा गया है कि अपीलकर्ता के खिलाफ दर्ज अपराध “आपराधिक प्रकृति के थे न कि राजनीतिक और सामाजिक प्रकृति के।”

डिवीजन बेंच ने यह भी देखा कि अपीलकर्ता ने 2008 के नियमों के तहत गठित उस समिति के निर्णय को स्वतंत्र रूप से चुनौती नहीं दी थी, जिसने उनके आवेदन को औपचारिक रूप से खारिज किया था। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

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“समिति के निर्णय को चुनौती न दिए जाने की स्थिति में, यह अदालत वैधानिक प्राधिकरण के निर्णय की जगह अपनी राय नहीं रख सकती।”

नियमों की शब्दावली को चुनौती देने के संबंध में हाईकोर्ट ने कहा:

“अपीलकर्ता का ‘अल्ट्रा वायर्स’ के संबंध में दिया गया तर्क, वर्तमान संदर्भ में, विद्वान एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने के लिए पर्याप्त आधार प्रदान नहीं करता है।”

हाईकोर्ट को राज्य या समिति की ओर से किसी भी तरह के भेदभावपूर्ण आचरण का कोई सबूत नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि सम्मान निधि प्रदान करना “नियम 6 के अनुसार प्रयोग किया जाने वाला वैधानिक विवेक” है।

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निर्णय

डिवीजन बेंच ने निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता अपने दावे को खारिज किए जाने के प्रशासनिक निर्णय में किसी भी स्पष्ट अवैधता या कानून की त्रुटि को साबित करने में विफल रहा। हाईकोर्ट ने एकल पीठ के आदेश की पुष्टि करते हुए रिट अपील को खारिज कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपने हेड नोट में दर्ज किया:

“विशुद्ध रूप से राजनीतिक या सामाजिक कारणों से निरुद्ध होने की आवश्यकता को पूरा करने में विफलता, लोक नायक जय प्रकाश नारायण (मीसा/डी.आई.आर. राजनीतिक या सामाजिक कारणों से निरुद्ध व्यक्ति) सम्मान निधि नियम, 2008 के तहत सम्मान निधि के दावे के लिए घातक है।”

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: रामगुलाम सिंह ठाकुर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
  • केस नंबर: WA No. 752 of 2024
  • बेंच: मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल
  • तारीख: 16 मार्च, 2026

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