छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) अस्पष्ट है और उसमें घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 9 के तहत आवश्यक महत्वपूर्ण विवरणों की कमी है, तो ऐसी कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवादों में केवल दबाव बनाने या बदला लेने की नीयत (Mala Fide) से शुरू की गई कार्यवाही स्वीकार्य नहीं है।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच, जिसमें चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल शामिल थे, ने पति और उसके परिवार द्वारा दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), सूरजपुर के समक्ष लंबित घरेलू हिंसा की कार्यवाही को रद्द कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता नंबर 1 (पति) और प्रतिवादी नंबर 2 (पत्नी) के बीच वैवाहिक विवाद से जुड़ा है। दोनों का विवाह 27 जून 2018 को उत्तर प्रदेश के बलिया में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था और उनके दो बेटे (उम्र 6 और 4 वर्ष) हैं।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, पहले बच्चे के जन्म के कुछ समय बाद ही वैवाहिक जीवन में कलह शुरू हो गई। आरोप है कि पत्नी ने अपने बड़े बेटे को अपनी बहन (जो अपने पति से अलग रह रही थी और निसंतान थी) को गोद देने की जिद की। जब पति ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया, तो पत्नी का व्यवहार कथित तौर पर अपमानजनक हो गया। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि पत्नी अगस्त 2021 में ससुराल छोड़कर चली गई और बाद में वापस आने पर भी गोद देने की मांग और आत्महत्या की धमकी देती रही।
विवाद बढ़ने पर पत्नी ने बच्चों की कस्टडी और अन्य मांगों को लेकर अलग-अलग जगहों पर कई मुकदमे दायर किए। इसी क्रम में उसने छत्तीसगढ़ के सूरजपुर में घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत एक आवेदन दायर किया। पति ने इस कार्यवाही को “कांसंटर-ब्लास्ट” (जवाबी हमला) बताते हुए इसे रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं का तर्क: याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता श्री हिमांशु पांडेय ने कोर्ट में दलील दी कि दोनों पक्षों के बीच असली विवाद दीवानी (Civil) प्रकृति का है, जो मुख्य रूप से नाबालिग बच्चों की कस्टडी से संबंधित है। उन्होंने तर्क दिया कि घरेलू हिंसा की कार्यवाही केवल पति को परेशान करने, डराने और पैतृक अधिकारों को छोड़ने के लिए मजबूर करने के उद्देश्य से शुरू की गई है।
वकील ने कोर्ट का ध्यान 19 अक्टूबर 2022 की ‘घरेलू घटना रिपोर्ट’ (DIR) की ओर आकर्षित किया और इसे “पूरी तरह से अस्पष्ट और आधारहीन” बताया। उन्होंने कहा कि रिपोर्ट में किसी भी विशिष्ट घटना, तारीख, समय या स्थान का उल्लेख नहीं है और न ही यह स्पष्ट किया गया है कि किस याचिकाकर्ता ने कौन सा कृत्य किया है।
प्रतिवादी का तर्क: इसके विपरीत, प्रतिवादी पत्नी के वकील श्री अनुराग सिंह ने दलील दी कि शादी के तुरंत बाद से ही पत्नी को दहेज की मांग और शारीरिक प्रताड़ना का सामना करना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ताओं का गुप्त उद्देश्य बड़े बेटे को पति की बहन को गोद देने का था।
वकील ने यह भी कहा कि पति ने बड़े बेटे को जबरदस्ती अपने पास रख लिया है और पत्नी को पिछले तीन साल से बच्चे से मिलने नहीं दिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि बलिया में पति के परिवार का राजनीतिक प्रभाव है, इसलिए पत्नी को न्याय के लिए सूरजपुर में शरण लेनी पड़ी।
कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण
डिवीजन बेंच ने मामले के तथ्यों और दस्तावेजों की बारीकी से जांच की और कार्यवाही को रद्द करने से संबंधित कानूनी सिद्धांतों पर विचार किया।
याचिका की पोषणीयता (Maintainability) पर: कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले सौरभ कुमार त्रिपाठी बनाम विधि रावल (2025) का हवाला दिया, जिसमें यह स्पष्ट किया गया है कि घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12(1) से उत्पन्न कार्यवाही को चुनौती देने के लिए CrPC की धारा 482 (या संविधान के अनुच्छेद 226) के तहत याचिका सुनवाई योग्य है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी शक्ति का प्रयोग सावधानी से किया जाना चाहिए।
घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) की वैधता पर: हाईकोर्ट ने 19 अक्टूबर 2022 की DIR रिपोर्ट को खारिज करते हुए पाया कि इसमें अधिनियम की धारा 9(1)(b) के तहत अनिवार्य विवरणों का घोर अभाव है। बेंच ने टिप्पणी की:
“आक्षेपित घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि यह पूरी तरह से अस्पष्ट है और इसमें महत्वपूर्ण विवरणों की कमी है। DIR में घरेलू हिंसा की कथित घटनाओं की कोई तारीख, समय, स्थान या तरीके का खुलासा नहीं किया गया है, और न ही किसी विशेष याचिकाकर्ता के किसी कृत्य का उल्लेख है।”
कोर्ट ने कहा कि महत्वपूर्ण विवरणों का न होना मामले की जड़ पर प्रहार करता है और धारा 12 के तहत कार्यवाही शुरू करने के आधार को ही कमजोर करता है।
कानून का दुरुपयोग (Abuse of Process): कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को स्वीकार किया कि यह कार्यवाही वास्तव में कस्टडी विवाद में दबाव बनाने की एक रणनीति थी।
“तथ्यों से यह स्पष्ट है कि पक्षों के बीच मुख्य विवाद वैवाहिक कलह और विशेष रूप से नाबालिग बच्चों की कस्टडी को लेकर है… आपराधिक प्रक्रिया का उपयोग उत्पीड़न के उपकरण के रूप में या किसी अन्य विवाद में लाभ प्राप्त करने के लिए करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
बेंच ने यह भी नोट किया कि पत्नी ने धारा 12 के आवेदन में अन्य कानूनी कार्यवाहियों की जानकारी छिपाई थी, जो उसकी दुर्भावना (Mala Fide) को दर्शाता है।
निचली अदालत के आदेश पर: हाईकोर्ट ने JMFC, सूरजपुर के 26 नवंबर 2024 के उस आदेश को “मनमाना और कानूनन अस्थिर” माना, जिसके द्वारा याचिकाकर्ताओं का आवेदन खारिज कर दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट ने कार्यवाही की पोषणीयता को चुनौती देने वाले कई आधारों पर विचार ही नहीं किया।
निर्णय
सुप्रीम कोर्ट के हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992) के सिद्धांतों को लागू करते हुए, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने माना कि इस कार्यवाही को जारी रखना कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा:
“जहां घरेलू घटना रिपोर्ट अस्पष्ट है, घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 9 के तहत आवश्यक विवरणों की कमी है, और कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण इरादे से या वैवाहिक विवादों में दबाव की रणनीति के रूप में शुरू की गई है, वहां ऐसी कार्यवाही को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।”
परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने रिट याचिका को स्वीकार कर लिया। 19 अक्टूबर 2022 की घरेलू घटना रिपोर्ट और आवेदन, तथा JMFC सूरजपुर का आदेश रद्द कर दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश किसी भी पक्ष को सक्षम सिविल या फैमिली कोर्ट में उचित कानूनी उपाय करने से नहीं रोकता है।
केस डिटेल्स:
- केस टाइटल: श्री प्रकाश सिंह व अन्य बनाम छत्तीसगढ़ राज्य व अन्य
- केस नंबर: WPCR No. 433 of 2025
- कोरम: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल
- फैसला दिनांक: 20.01.2026
- याचिकाकर्ताओं के वकील: श्री हिमांशु पांडेय
- राज्य (प्रतिवादी नं. 1) के वकील: श्री एस.एस. बघेल (सरकारी अधिवक्ता)
- प्रतिवादी नं. 2 के वकील: श्री अनुराग सिंह

