रिश्वत की मांग का प्रमाण न होना दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने लेबर इंस्पेक्टर को किया बरी

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने रिश्वतखोरी के एक मामले में लेबर इंस्पेक्टर की दोषसिद्धि और तीन साल के कठोर कारावास की सजा को रद्द कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष रिश्वत की मांग और उसे स्वेच्छा से स्वीकार करने के “बुनियादी तथ्यों” को साबित करने में विफल रहा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि स्वतंत्र गवाह रिश्वत की मांग का समर्थन नहीं करते हैं और शिकायतकर्ता की गवाही पूर्व रंजिश से प्रभावित है, तो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती।

यह अपील स्पेशल जज (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), जशपुर के 2025 के उस फैसले के खिलाफ दायर की गई थी, जिसमें सुरेश कुर्रे को धारा 7 के तहत दोषी ठहराया गया था। हाईकोर्ट ने अवलोकन किया कि रिश्वत की मांग के विश्वसनीय साक्ष्य के बिना केवल रंगी हुई मुद्रा की बरामदगी दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष के अनुसार, रमेश कुमार यादव (PW-2) नामक व्यक्ति ने 26 सितंबर 2019 को शिकायत दर्ज कराई थी। यादव ने आरोप लगाया था कि लेबर इंस्पेक्टर सुरेश कुर्रे ने उनकी संस्था के स्किल डेवलपमेंट ट्रेनिंग के भुगतान (6,37,000 रुपये) को प्रोसेस करने के बदले 10% कमीशन मांगा था। शिकायतकर्ता के मुताबिक, आरोपी ने पहले 1 लाख रुपये की मांग की थी, जिसे बाद में मोटरसाइकिल खरीदने के लिए बढ़ाकर 1.90 लाख रुपये कर दिया गया था।

एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) ने 14 अक्टूबर 2019 को जाल बिछाकर आरोपी को 40,000 रुपये की पहली किस्त लेते हुए रंगे हाथों पकड़ने का दावा किया था। निचली अदालत ने इसी आधार पर कुर्रे को 3 साल की सजा और 50,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

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पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता के वकील सीनियर एडवोकेट अभिषेक सिन्हा ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष धारा 7 के आवश्यक तत्वों को साबित नहीं कर पाया है। उन्होंने बताया कि शिकायतकर्ता यादव की आरोपी के प्रति व्यक्तिगत रंजिश थी, क्योंकि विभाग ने यादव के खिलाफ वित्तीय अनियमितताओं के लिए लगभग 7.01 लाख रुपये की वसूली की कार्यवाही शुरू की थी। इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि लेबर इंस्पेक्टर के पास भुगतान जारी करने का कोई अधिकार नहीं था, यह अधिकार केवल लेबर ऑफिसर (PW-4) के पास था।

वहीं, राज्य सरकार के वकील सौरभ साहू ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी को रंगे हाथों पकड़ा गया था और उसके पास से रंगी हुई मुद्रा की बरामदगी उसके दोष को साबित करने के लिए पर्याप्त है।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने साक्ष्यों का बारीकी से परीक्षण करते हुए अभियोजन पक्ष की थ्योरी में कई गंभीर खामियां पाईं:

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1. स्वतंत्र गवाहों का मुकरना: कोर्ट ने पाया कि स्वतंत्र गवाह डॉ. विनय कुमार तिवारी (PW-3) और चेतन साहू (PW-6) ने रिश्वत की मांग की बात का समर्थन नहीं किया। हाईकोर्ट ने कहा, “इन दोनों गवाहों ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे कुछ दूरी पर खड़े थे और इसलिए वे उस बातचीत को नहीं सुन सके जो कथित तौर पर हुई थी।”

2. पुरानी रंजिश और झूठा फंसाने की आशंका: कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता पर खुद विभाग की वसूली की कार्यवाही चल रही थी और उसे लगता था कि इसके पीछे अपीलकर्ता का हाथ है। कोर्ट ने कहा: “ये परिस्थितियां आरोपी को झूठा फंसाने के पीछे एक संभावित मकसद की ओर इशारा करती हैं।”

3. आधिकारिक भूमिका का अभाव: जांच में यह भी सामने आया कि ACB ने यह पुष्टि नहीं की थी कि शिकायतकर्ता का कोई भुगतान वाकई लंबित था या नहीं। कोर्ट ने दर्ज किया कि लेबर इंस्पेक्टर की भूमिका केवल भौतिक सत्यापन तक सीमित है, भुगतान मंजूर करने या जारी करने में उनकी कोई भूमिका नहीं होती।

4. इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य की अविश्वसनीयता: कोर्ट ने वॉयस रिकॉर्डिंग के फॉरेंसिक परीक्षण न होने पर सवाल उठाए। फैसले में कहा गया कि वॉयस सैंपल के अभाव में केवल ट्रांसक्रिप्ट (लिखावट) के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि आवाज आरोपी की ही थी।

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कानूनी सिद्धांत

सुप्रीम कोर्ट के के. शांतम्मा बनाम तेलंगाना राज्य और राजेश गुप्ता बनाम सीबीआई के फैसलों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया:

“अवैध परितोषण (रिश्वत) की मांग का प्रमाण धारा 7 और 13(1)(d) के तहत अपराध का मुख्य आधार है। इसकी अनुपस्थिति में आरोप विफल हो जाएगा। मांग के प्रमाण के बिना केवल किसी राशि की बरामदगी अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है।”

निर्णय

हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि चूंकि “मांग” का बुनियादी तत्व साबित नहीं हुआ, इसलिए कानून की धारा 20 के तहत अनुमान (presumption) नहीं लगाया जा सकता।

“मांग के संबंध में पूरा मामला केवल शिकायतकर्ता रमेश कुमार यादव की गवाही पर आधारित है, जिसे स्वतंत्र गवाहों से कोई समर्थन नहीं मिला है।” इसी आधार पर हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए सुरेश कुर्रे को दोषमुक्त कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: सुरेश कुर्रे बनाम छत्तीसगढ़ राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 2674 ऑफ 2025
  • बेंच: चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा
  • फैसले की तारीख: 11 मार्च, 2026

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