कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में दहेज हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष (prosecution) की गवाही पूरी होने के बाद यदि अदालत आरोपों (charges) में बदलाव करती है और आरोपियों को गवाहों से दोबारा जिरह (cross-examination) करने का अवसर नहीं देती, तो यह पूरी न्यायिक प्रक्रिया को दूषित कर देता है।
जस्टिस प्रसेनजीत बिस्वास की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 217 के तहत आरोपियों को संशोधित आरोपों का सामना करने का मौका न देना “बचाव पक्ष के साथ घोर अन्याय और गंभीर पूर्वाग्रह” है। हाईकोर्ट ने मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया है ताकि आरोप तय करने के चरण से नए सिरे से सुनवाई हो सके।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला मृतका के मामा, राधेश्याम गुप्ता द्वारा दर्ज कराई गई एक लिखित शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पीड़िता, जिसका विवाह अपीलकर्ता नंबर 1 (मणिक शॉ) से हुआ था, की 30 नवंबर 1990 को 22 वर्ष की आयु में जलने से अस्वाभाविक मृत्यु हो गई थी।
शिकायतकर्ता का कहना था कि शादी के तुरंत बाद से ही मृतका को उसके पति और ससुराल वालों द्वारा दहेज के लिए प्रताड़ित किया जा रहा था। इस आधार पर टीटागढ़ पुलिस स्टेशन में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A और 306 के तहत मामला दर्ज किया गया।
जांच पूरी होने पर, ट्रायल कोर्ट ने शुरू में 1 अगस्त 1995 को आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 498A और 304 के तहत आरोप तय किए। अभियोजन पक्ष ने अपने समर्थन में 14 गवाहों का परीक्षण कराया। हालांकि, गवाही पूरी होने के बाद, ट्रायल कोर्ट ने 3 मार्च 2001 के आदेश द्वारा आरोपों में बदलाव करते हुए 12 आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 498A/34 और 304B/34 के तहत नए आरोप तय किए।
महत्वपूर्ण बात यह थी कि आरोपों में इस बदलाव के बाद, गवाहों की कोई और परीक्षा नहीं की गई और न ही आरोपियों को संशोधित आरोपों के संबंध में अभियोजन पक्ष के गवाहों को वापस बुलाने या उनसे जिरह करने का मौका दिया गया। इसके बावजूद, 26 फरवरी 2003 को ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता मणिक शॉ को IPC की धारा 498A/304B के तहत दोषी ठहराते हुए सात साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मिलन मुखर्जी ने तर्क दिया कि यह सजा कानूनन अस्थिर है। उन्होंने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सबूत बंद होने के बाद आरोपों को बदलकर उसमें धारा 304B (दहेज हत्या) और धारा 34 (समान आशय) को शामिल किया, लेकिन बचाव पक्ष को इन नए आरोपों पर गवाहों से पूछताछ करने का अवसर नहीं दिया।
श्री मुखर्जी ने दलील दी:
“पहले ट्रायल कोर्ट द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा 498A/304 के तहत आरोप तय किए गए थे… लेकिन आश्चर्यजनक रूप से आरोपों में संशोधन के बाद उन्हें संशोधित आरोपों पर अभियोजन पक्ष के गवाहों से जिरह करने का कोई अवसर नहीं मिला।”
राज्य की ओर से विद्वान अधिवक्ता सुश्री फरिया हुसैन ने अपील का विरोध किया। उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों से यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ताओं ने दहेज के लिए मृतका को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया, जिससे शादी के सात साल के भीतर उसकी अस्वाभाविक मौत हुई।
कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन
जस्टिस प्रसेनजीत बिस्वास ने गौर किया कि शुरुआती मुकदमा क्रूरता और गैर-इरादतन हत्या (धारा 304 IPC) के आरोपों पर चला था। बाद में इसे धारा 304B IPC में बदलने से मामले में नए तत्व जुड़ गए, जैसे कि शादी के सात साल के भीतर मौत और मौत से “ठीक पहले” दहेज की मांग के लिए क्रूरता।
कोर्ट ने Cr.P.C. की धारा 217 के प्रावधानों पर जोर दिया, जो यह अनिवार्य करता है कि जब भी आरोप बदला जाता है या जोड़ा जाता है, तो अभियोजक और आरोपी को पहले से परीक्षित किसी भी गवाह को वापस बुलाने या फिर से समन करने की अनुमति दी जानी चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“यह कानून की स्थापित स्थिति है कि जब भी आरोप में परिवर्तन/संशोधन होता है, तो पक्षों को ऐसे परिवर्तित/संशोधित आरोप से उत्पन्न मामले का सामना करने के लिए निष्पक्ष और प्रभावी अवसर दिया जाना चाहिए।”
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 498A/304 IPC के संदर्भ में पेश किए गए मूल सबूत “संशोधित आरोप के आवश्यक तत्वों के खिलाफ पूरी तरह से बिना परखे रह गए,” विशेष रूप से “दहेज की मांग” के सबूत के मामले में।
जस्टिस बिस्वास ने कहा:
“यह न्यायालय मानता है कि प्रक्रियात्मक चूक के कारण मुकदमा दूषित हो गया है। संशोधित आरोपों के खिलाफ न परखे गए सबूतों पर आधारित किसी भी दोषसिद्धि को कानून में बरकरार नहीं रखा जा सकता है।”
निर्णय
कलकत्ता हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट द्वारा 26 फरवरी 2003 को पारित दोषसिद्धि और सजा के आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया:
“मामले को आरोप परिवर्तन (alteration of charge) के चरण से वापस ट्रायल कोर्ट में भेजा जाता है, इस स्पष्ट निर्देश के साथ कि अभियुक्तों को अभियोजन पक्ष के गवाहों को वापस बुलाने और उनसे जिरह करने का पूर्ण और प्रभावी अवसर दिया जाए और उसके बाद कानून के अनुसार मुकदमा आगे बढ़ाया जाए।”
ट्रायल कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि मामले का निपटारा तेजी से, अधिमानतः आदेश की सूचना प्राप्त होने की तारीख से छह महीने के भीतर किया जाए।

