कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर ग्रेच्युटी (सेवानिवृत्ति लाभ) न देना कि उसने कहीं और नौकरी तलाशने की कोशिश की है, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने स्पष्ट किया कि बेहतर सुविधाओं और वेतन के लिए दूसरी नौकरी खोजना, चाहे वह प्रतिद्वंद्वी कंपनी में ही क्यों न हो, कर्मचारी का बुनियादी अधिकार है और इसे अनैतिक आचरण (moral turpitude) नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति शम्पा दत्त (पॉल) ने आदेश पारित करते हुए कंपनी की अनुशासनात्मक प्राधिकरण (Disciplinary Authority) का आदेश रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि तकनीशियन सुदीप सामंता को ₹1.37 लाख ग्रेच्युटी बकाया और उस पर 8 प्रतिशत साधारण ब्याज दिया जाए।
न्यायमूर्ति दत्त ने कहा, “दूसरी नौकरी तलाशना, चाहे वह प्रतिद्वंद्वी कंपनी में ही क्यों न हो (हालांकि इस मामले में इसका प्रमाण नहीं मिला), बेहतर वेतन और सुविधाओं के लिए एक बुनियादी अधिकार है। यह न तो ईमानदारी, शालीनता या अच्छे आचरण के खिलाफ है और न ही इसे अनैतिक आचरण कहा जा सकता है।”

अदालत ने यह भी पाया कि कंपनी यह साबित नहीं कर सकी कि सामंता के किसी कथित आचरण से कंपनी की संपत्ति को कोई नुकसान या क्षति हुई हो। साथ ही, अनुशासनात्मक कार्यवाही में स्वतंत्र और ठोस निष्कर्षों का अभाव था, जो शक्ति के दुरुपयोग और प्राकृतिक न्याय के विरुद्ध है।
सामंता, जिन्होंने 2012 में कंपनी जॉइन की थी, पर आरोप था कि वे प्रतिद्वंद्वी कंपनी के अधिकारियों से संपर्क में थे और गोपनीय जानकारी साझा कर रहे थे। कंपनी के जांच अधिकारी ने उन्हें दोषी मानते हुए नौकरी से निकालने की सिफारिश की। इसके आधार पर 11 अक्टूबर 2022 को उनकी सेवा समाप्त कर दी गई और कंपनी ने उनकी ग्रेच्युटी रोक दी।
लेकिन कंट्रोलिंग अथॉरिटी और अपील अथॉरिटी ने भुगतान का आदेश दिया। कंपनी ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने कंपनी की याचिका खारिज कर दी और कहा कि अपील प्राधिकरण का आदेश कानून के अनुरूप, तार्किक और क्षेत्राधिकार के भीतर है। अदालत ने यह भी माना कि कंपनी कोई ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सकी और गवाहों ने केवल इतना कहा कि उन्होंने सामंता को प्रतिद्वंद्वी कंपनी के कुछ लोगों से बात करते देखा।
अदालत के इस फैसले ने यह दोहराया कि कर्मचारी को सिर्फ नई नौकरी तलाशने के कारण दंडित नहीं किया जा सकता और इस आधार पर वैधानिक बकाया रोकना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है।