बॉम्बे हाईकोर्ट ने निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट, 1881 (NI Act) की धारा 138 के तहत एक पार्टनरशिप फर्म और उसके साझेदारों को बरी किए जाने के फैसले को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया है। जस्टिस नीला गोखले की पीठ ने पुणे के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि शिकायतकर्ता आरोपी के साथ किसी भी कानूनी ऋण या दायित्व (legal debt or liability) के अस्तित्व को साबित करने में विफल रहा। इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि शिकायत में साझेदारों की विशिष्ट भूमिका के बारे में स्पष्ट आरोप नहीं लगाए गए थे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह अपील विजयकांत मोतीलाल कोठारी (अपीलकर्ता) द्वारा महाराष्ट्र राज्य और ओम इंजीनियर्स एंड बिल्डर्स तथा उसके भागीदारों (प्रतिवादी संख्या 2 से 7) के खिलाफ दायर की गई थी।
शिकायत के अनुसार, जुलाई 2004 में हीराचंद रायचंद पगारिया नामक व्यक्ति ने शिकायतकर्ता से 56,50,000 रुपये का हैंड लोन लिया था। आरोप था कि पगारिया के करीबी दोस्त होने के नाते आरोपियों ने ऋण चुकाने की जिम्मेदारी ली थी। इसके तहत, प्रतिवादी संख्या 3 (मूल आरोपी संख्या 2) ने कथित तौर पर 31 जनवरी 2006 को बैंक ऑफ बड़ौदा का 78,00,000 रुपये का चेक शिकायतकर्ता के पक्ष में जारी किया।
चेक बाउंस होने और कानूनी नोटिस का जवाब न मिलने पर शिकायत दर्ज कराई गई। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी (JMFC), पुणे ने 1 मार्च 2008 को आरोपियों को दोषी ठहराया था। हालांकि, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, पुणे ने 31 जनवरी 2011 को अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि को रद्द कर दिया था, जिसके बाद शिकायतकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
जस्टिस डॉ. नीला गोखले ने मामले की सुनवाई करते हुए दो मुख्य कानूनी मुद्दों पर विचार किया:
- क्या यह साबित किए बिना कि चेक किसी तीसरे पक्ष (Third Party) के दायित्व को पूरा करने के लिए जारी किया गया था, धारा 138 का अपराध बनता है?
- क्या शिकायत में विशिष्ट भूमिका बताए बिना किसी पार्टनर पर मुकदमा चलाया जा सकता है?
साझेदारों की ‘विकेरियस लायबिलिटी’ (Vicarious Liability) पर
साझेदारों की जिम्मेदारी पर कोर्ट ने कहा कि शिकायत में केवल यह एक सामान्य कथन था कि आरोपी फर्म के दैनिक कार्यों के लिए जिम्मेदार थे। सुप्रीम कोर्ट के कमलकिशोर श्रीगोपाल तापड़िया बनाम इंडिया एनर्जी-जेन प्राइवेट लिमिटेड (2025) और एन.के. वाही बनाम शेखर सिंह (2007) के फैसलों का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि केवल ‘पार्टनर’ या ‘डायरेक्टर’ का पद होना पर्याप्त नहीं है।
कोर्ट ने एन.के. वाही मामले का उल्लेख करते हुए कहा:
“कथित निदेशकों के खिलाफ अभियोजन शुरू करने के लिए, शिकायत में लेन-देन में उनके द्वारा निभाई गई भूमिका के बारे में विशिष्ट आरोप होना चाहिए… किसी भी दावे या विशिष्ट सबूत के अभाव में शिकायत विचारणीय नहीं होगी।”
ऋण और दायित्व का अभाव
हाईकोर्ट ने पाया कि मुख्य परीक्षा (chief-examination) में दिए गए सामान्य बयान के अलावा, ऐसा कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड नहीं था जो यह साबित कर सके कि आरोपियों ने पगारिया की देनदारी अपने ऊपर ली थी। कोर्ट ने विसंगति को रेखांकित करते हुए कहा:
“शिकायतकर्ता यह समझाने में असमर्थ है कि श्री पगारिया द्वारा लिया गया 56,50,000 रुपये का हैंड लोन बढ़कर 78,00,000 रुपये कैसे हो गया, जो कि अनादरित चेक की राशि है। राशि में वृद्धि को सही ठहराने के लिए ब्याज दर के संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं है…”
कोर्ट ने सत्र न्यायालय के इस निष्कर्ष को सही माना कि चेक जारी करने से पहले शिकायतकर्ता और आरोपियों के बीच कोई वित्तीय संबंध नहीं थे और उनके बीच कोई ‘प्रिवीटी ऑफ कॉन्ट्रैक्ट’ (privity of contract) नहीं था।
बरी करने के खिलाफ अपील का दायरा
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (राजेश प्रसाद बनाम बिहार राज्य और एच.डी. सुंदरा बनाम कर्नाटक राज्य) का हवाला देते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि अपीलीय अदालत को बरी करने के फैसले में तब तक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि फैसला पूरी तरह से विकृत (patent perversity) न हो या सबूतों को गलत तरीके से पढ़ा न गया हो। कोर्ट ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा बरी किए जाने के बाद आरोपी के पक्ष में “निर्दोष होने की दोहरी धारणा” (double presumption of innocence) होती है।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि आरोपियों का शिकायतकर्ता के प्रति कोई कानूनी ऋण या दायित्व नहीं था। इसके अलावा, ऐसा कोई सबूत नहीं था जो यह दर्शाता हो कि पगारिया की देनदारी लेने से जुड़े व्यवसाय के संचालन के लिए कौन सा भागीदार जिम्मेदार था। जस्टिस गोखले ने माना कि सत्र न्यायालय के फैसले में कोई कमी नहीं है और अपील को खारिज कर दिया।
केस डीटेल्स (Case Details):
- केस टाइटल: विजयकांत मोतीलाल कोठारी बनाम महाराष्ट्र राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1120 ऑफ 2011
- कोरम: जस्टिस नीला गोखले

