बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि महाराष्ट्र मान्यता प्राप्त ट्रेड यूनियन और अनुचित श्रम प्रथाओं का निवारण (MRTU & PULP) अधिनियम, 1971 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए इंडस्ट्रियल कोर्ट किसी ऐसे नए मौलिक अधिकार को जन्म नहीं दे सकता, जिसके लिए स्वतंत्र कानूनी जांच या सुनवाई की आवश्यकता हो। जस्टिस अमित बोरकर ने टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका को खारिज करते हुए कहा कि शेयर और डिबेंचर जैसे लाभ, जो पहले से किसी आदेश या समझौते में तय नहीं हैं, उनके लिए उपयुक्त फोरम में अलग से दावा करना होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
इस कानूनी लड़ाई की शुरुआत दशकों पहले हुई थी जब याचिकाकर्ता आदिल पटेल ने 16 जुलाई 1979 को टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी में अकाउंटेंट असिस्टेंट के रूप में कार्यभार संभाला था। 10 मार्च 1986 को उन्हें सेवा से मुक्त कर दिया गया, जिसके बाद कानूनी विवादों का लंबा दौर चला। साल 1994 में हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाते हुए उन्हें सेवा में निरंतरता (Continuity of Service) के साथ बहाल करने का आदेश दिया।
बहाली के बाद उन्हें 50% पिछला वेतन और कुछ अन्य नकद लाभ तो मिले, लेकिन विवाद तब गहराया जब उन्होंने दावा किया कि कंपनी ने उन्हें सही वरिष्ठता (Seniority) सूची में नहीं रखा। साथ ही, उन्होंने आरोप लगाया कि उनके “जबरन बेरोजगारी” के दौरान कर्मचारियों के कोटे से जारी किए गए शेयर और डिबेंचर उन्हें नहीं दिए गए। इसी मांग को लेकर उन्होंने इंडस्ट्रियल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इंडस्ट्रियल कोर्ट ने वरिष्ठता तय करने का निर्देश तो दिया, लेकिन शेयर और डिबेंचर के दावे के लिए उन्हें उचित मंच (Appropriate Forum) पर जाने की छूट दे दी। इसी फैसले के खिलाफ पटेल ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता की दलील: याचिकाकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि अधिनियम की धारा 9 के तहत इंडस्ट्रियल कोर्ट एक ‘निष्पादन अदालत’ (Executing Court) की तरह काम करता है। उनके वकील ने कहा कि “परिणामी लाभ” (Consequential Benefits) एक व्यापक शब्द है जिसमें वे सभी लाभ शामिल होने चाहिए जो एक कर्मचारी को सेवा में रहने पर मिलते। उनके अनुसार, यह कोई नया अधिकार नहीं बल्कि बहाली के आदेश का ही एक हिस्सा है।
प्रतिवादी (टाटा स्टील) की दलील: कंपनी की ओर से दलील दी गई कि शेयरों का आवंटन किसी अदालती आदेश या समझौते का हिस्सा नहीं था। कंपनी ने स्पष्ट किया कि शेयर पाने की पहली शर्त यह थी कि कर्मचारी उस समय सक्रिय सेवा में होना चाहिए। जिरह के दौरान याचिकाकर्ता ने खुद स्वीकार किया था कि आवंटन के समय वह कंपनी में कार्यरत नहीं थे। कंपनी का कहना था कि इंडस्ट्रियल कोर्ट हाईकोर्ट के आदेशों की व्याख्या अपनी मर्जी से नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस अमित बोरकर ने मामले का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए कहा कि इंडस्ट्रियल कोर्ट के पास समझौतों या आदेशों को लागू कराने की शक्ति तो है, लेकिन यह शक्ति केवल ‘मौजूदा अधिकारों’ (Existing Rights) के प्रवर्तन तक ही सीमित है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में दर्ज किया:
“इंडस्ट्रियल कोर्ट नए अधिकारों को सृजित करने का मंच नहीं है, जिसके लिए पूरे साक्ष्य, विस्तृत संविदात्मक व्याख्या और रिकॉर्ड से परे स्वतंत्र निर्णय की आवश्यकता हो। जहां किसी लाभ की पात्रता अनुबंध की शर्तों या तथ्यों पर निर्भर करती है जो पहले से किसी अवार्ड या आदेश में स्पष्ट नहीं हैं, वहां इंडस्ट्रियल कोर्ट को ऐसा राहत नहीं देनी चाहिए जो प्रभावी रूप से एक नया मौलिक अधिकार बनाती हो।”
शेयरों और डिबेंचर के मुद्दे पर कोर्ट ने पाया कि पटेल का दावा यह साबित करने पर निर्भर है कि क्या वह उस समय पात्र थे। कोर्ट ने कहा कि आवेदन फॉर्म मांगने के लिए किया गया पत्राचार केवल उनकी भागीदारी की इच्छा को दर्शाता है, लेकिन यह आवंटन के कानूनी अधिकार को स्थापित नहीं करता। इसके अलावा, कंपाउंड इंटरेस्ट (चक्रवृद्धि ब्याज) की मांग को भी कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि इसके लिए कोई स्पष्ट कानूनी आधार पेश नहीं किया गया।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि इंडस्ट्रियल कोर्ट ने सही फैसला लिया था कि शेयर, डिबेंचर और चक्रवृद्धि ब्याज जैसे दावों के लिए एक ऐसे फोरम में सुनवाई होनी चाहिए जहां अनुबंध और वैधानिक शर्तों की गहराई से जांच की जा सके। हाईकोर्ट ने कहा:
“मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर शेयर देने का आदेश देना एक नया अधिकार सृजित करने जैसा होगा, जो कानून की धारा 9 के दायरे से बाहर है।”
इन टिप्पणियों के साथ जस्टिस अमित बोरकर ने रिट याचिका को खारिज कर दिया।
केस विवरण:
- केस का शीर्षक: आदिल पटेल बनाम टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी और अन्य
- रिट याचिका संख्या: 5787/2008
- कोरम: जस्टिस अमित बोरकर

