बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि ‘लीव एंड लाइसेंस’ एग्रीमेंट में संपत्ति का उपयोग ‘आवासीय’ (Residential) बताया गया है, तो किरायेदार (Licensee) द्वारा उसका व्यावसायिक (Commercial) उपयोग करने से एग्रीमेंट की प्रकृति नहीं बदल जाती। इसके साथ ही, अदालत ने प्रतिवादी पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया है, क्योंकि उन्होंने कोर्ट में बिना जांच-पड़ताल किए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा तैयार की गई दलीलें पेश कीं, जिनमें ऐसे केस कानूनों का हवाला दिया गया था जो अस्तित्व में ही नहीं थे।
न्यायमूर्ति एम.एम. साठये की पीठ ने मकान मालिक (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर याचिका को स्वीकार करते हुए बेदखली (Eviction) के आदेश को बहाल कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) के आदेश को रद्द करने वाला रिविजनल अथॉरिटी का फैसला अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता दीपक शिवकुमार बहरी, जो ओशिवारा, मुंबई स्थित ‘मातृछाया बिल्डिंग’ के फ्लैट नंबर 105 के मालिक हैं, ने हर्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट लिमिटेड (प्रतिवादी) को 5 जनवरी 2007 को एक पंजीकृत लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट के तहत अपना फ्लैट दिया था। यह एग्रीमेंट 22 महीने के लिए था।
एग्रीमेंट की शर्तों का उल्लंघन होने पर याचिकाकर्ता ने 4 मई 2008 को नोटिस देकर एग्रीमेंट समाप्त कर दिया। हालांकि, प्रतिवादी ने फ्लैट खाली करने से इनकार कर दिया। प्रतिवादी का दावा था कि एक अलग फिल्म प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट में उन्हें नुकसान हुआ है, जिसकी भरपाई के लिए उनका इस फ्लैट पर ‘लियन’ (Lien) या अधिकार बनता है।
सक्षम प्राधिकारी (रेंट एक्ट) ने 15 अप्रैल 2009 को प्रतिवादी को फ्लैट खाली करने का आदेश दिया था। लेकिन, अतिरिक्त आयुक्त (कोकण डिवीजन) ने रिविजनल अथॉरिटी के रूप में कार्य करते हुए इस आदेश को पलट दिया। रिविजनल अथॉरिटी ने प्रतिवादी की इस दलील को स्वीकार कर लिया था कि फ्लैट का व्यावसायिक उपयोग हो रहा था, इसलिए धारा 24 के तहत आवेदन स्वीकार्य नहीं है। इसके खिलाफ मकान मालिक ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
कोर्ट में दी गई दलीलें
याचिकाकर्ता का पक्ष: याचिकाकर्ता के वकील जनय जैन ने तर्क दिया कि रिविजनल अथॉरिटी का आदेश कानूनन गलत है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट के क्लॉज 2, 11, 13 और 14 स्पष्ट रूप से कहते हैं कि फ्लैट का उपयोग केवल ‘आवासीय’ उद्देश्य के लिए किया जाएगा। विशेष रूप से क्लॉज 13 में लिखा था कि “फ्लैट का उपयोग केवल आवासीय उद्देश्य के लिए किया जाएगा”। उन्होंने यह भी कहा कि फिल्म प्रोडक्शन को लेकर चल रहा विवाद एक अलग मामला है और उसका रेंट एक्ट के तहत बेदखली की कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए।
प्रतिवादी का पक्ष: प्रतिवादी कंपनी के निदेशक मोहम्मद यासीन (जो व्यक्तिगत रूप से पेश हुए) ने तर्क दिया कि फ्लैट का उपयोग कमर्शियल ऑफिस के रूप में किया जा रहा था, जिसका सबूत वहां लगा 3-फेज बिजली कनेक्शन और ऑफिस फर्नीचर है। उन्होंने दावा किया कि फिल्म प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट के तहत उनका याचिकाकर्ता पर बकाया है, इसलिए वे फ्लैट पर कब्जा बनाए रखने के हकदार हैं। उन्होंने याचिकाकर्ता के खिलाफ झूठी गवाही (Perjury) का आरोप लगाते हुए एक आवेदन भी दायर किया।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद रिविजनल अथॉरिटी के आदेश को खारिज कर दिया और निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:
1. ‘एग्रीमेंट’ तय करता है उद्देश्य, ‘उपयोग’ नहीं: कोर्ट ने कहा कि रिविजनल अथॉरिटी ने एग्रीमेंट को समग्र रूप से नहीं पढ़ा। भले ही प्रतिवादी फ्लैट का उपयोग ऑफिस के रूप में कर रहा हो, लेकिन एग्रीमेंट के क्लॉज स्पष्ट रूप से ‘आवासीय उद्देश्य’ की बात करते हैं। कोर्ट ने कहा:
“महज इसलिए कि प्रतिवादी फ्लैट का उपयोग व्यावसायिक उद्देश्य के लिए कर रहा है (जैसा कि बिजली बिल या फोटो से दिखता है), इससे लाइसेंस का उद्देश्य नहीं बदल जाता। एग्रीमेंट की शर्तें ही सर्वोपरि होंगी।”
2. रिविजनल अथॉरिटी का अधिकार क्षेत्र: जस्टिस साठये ने कहा कि महाराष्ट्र रेंट कंट्रोल एक्ट की धारा 24 के तहत कार्यवाही संक्षिप्त (summary) होती है। रिविजनल अथॉरिटी को धारा 44 के तहत यह अधिकार नहीं है कि वह फिल्म प्रोडक्शन कॉन्ट्रैक्ट जैसे बाहरी विवादों या कर्ज की वसूली के मामलों पर विचार करे।
3. AI के दुरुपयोग पर कोर्ट की सख्त फटकार: फैसले का सबसे अहम पहलू प्रतिवादी द्वारा पेश की गई लिखित दलीलों से जुड़ा था। कोर्ट ने पाया कि प्रतिवादी ने अपनी दलीलों में जिन केस कानूनों का हवाला दिया था, उनमें से एक “ज्योति बनाम दिनेश तुलसiani” नाम का केस था, जिसे न तो कोर्ट और न ही कोर्ट का स्टाफ ढूंढ सका। कोर्ट ने नोट किया कि दलीलों में ‘हरे रंग के टिक मार्क्स’ और अन्य संकेत थे, जो यह दर्शाते हैं कि इसे ChatGPT जैसे AI टूल से कॉपी-पेस्ट किया गया था।
कोर्ट ने इस पर कड़ी नाराजगी जताते हुए कहा:
“अगर रिसर्च के लिए AI टूल का इस्तेमाल किया जाता है, तो यह स्वागत योग्य है; लेकिन यह पक्षकार और वकील की जिम्मेदारी है कि वे मशीन द्वारा दी गई जानकारी की पुष्टि करें। बिना जांचे-परखे कोर्ट के सामने दस्तावेज ‘डंप’ (ढेर) कर देना कोर्ट की सहायता नहीं, बल्कि न्याय में बाधा है।”
निष्कर्ष:
बॉम्बे हाईकोर्ट ने रिविजनल अथॉरिटी का आदेश रद्द करते हुए 15 अप्रैल 2009 के बेदखली आदेश को बहाल कर दिया। कोर्ट ने प्रतिवादी को तुरंत फ्लैट खाली करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही, कोर्ट का समय बर्बाद करने और भ्रामक AI जनरेटेड दलीलें पेश करने के लिए प्रतिवादी पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया, जिसे ‘हाईकोर्ट एम्प्लॉइज मेडिकल फंड’ में जमा करना होगा।
केस डीटेल्स:
- केस का नाम: दीपक एस/ओ शिवकुमार बहरी बनाम हर्ट एंड सोल एंटरटेनमेंट लिमिटेड
- केस नंबर: रिट याचिका संख्या 8390 ऑफ 2009
- कोरम: न्यायमूर्ति एम.एम. साठये
- याचिकाकर्ता के वकील: मैसर्स परिणाम लॉ एसोसिएट्स के लिए वकील जनय जैन और ऋषभ जाधव
- प्रतिवादी के वकील: श्री मोहम्मद यासीन (व्यक्तिगत रूप से/Party in person)

