बॉम्बे हाईकोर्ट: ‘घरेलू संबंध’ होने पर बिना विवाह के सबूत के भी महिला गुजारा भत्ता की हकदार, DV एक्ट के तहत फैसला बरकरार

औरंगाबाद: बॉम्बे हाईकोर्ट ने घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act) के तहत एक महिला और उसके नाबालिग बेटे को भरण-पोषण देने के निचली अदालतों के आदेशों को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया एक प्रगतिशील कानून है, और यदि ‘घरेलू संबंध’ (Domestic Relationship) स्थापित हो जाता है, तो विवाह की सख्त वैधता (Strict proof of valid marriage) अनिवार्य नहीं है।

न्यायमूर्ति अभय एस. वाघवासे की एकल पीठ ने पति (भरण-पोषण आदेश को चुनौती देने वाला) और पत्नी (राशि बढ़ाने की मांग करने वाली) दोनों द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिकाओं (Criminal Revision Applications) को खारिज कर दिया। इसके साथ ही, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, औरंगाबाद के उस आदेश की पुष्टि की गई, जिसमें पति को पत्नी और बेटे को 6,000 रुपये प्रति माह (प्रत्येक) भुगतान करने का निर्देश दिया गया था।

कोर्ट ने कहा कि भले ही विवाह का कोई कानूनी सबूत न हो, लेकिन अगर सहजीवन (cohabitation) और विवाह जैसी प्रकृति के संबंधों का संकेत देने वाले सबूत हैं, तो यह DV एक्ट के तहत राहत पाने के लिए पर्याप्त है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला पत्नी और उसके बेटे द्वारा पति के खिलाफ DV एक्ट की धारा 12 के तहत दायर एक आवेदन से शुरू हुआ था।

पत्नी का दावा था कि उसने 16 जून 2007 को वेरुल में पति के साथ ‘मंदिर में विवाह’ किया था। उनका कहना था कि वे साथ रहते थे और उनका एक बेटा भी है। शिकायत के अनुसार, शुरुआत में उसके साथ अच्छा व्यवहार किया गया, लेकिन बाद में उसे शारीरिक और मानसिक क्रूरता का सामना करना पड़ा और अक्टूबर 2011 में उसे छोड़ दिया गया। पत्नी ने तर्क दिया कि पति, जो पुलिस विभाग में कार्यरत है और 40,000 रुपये से अधिक वेतन पाता है, ने उसे और बच्चे को भरण-पोषण देने से इनकार कर दिया है।

दूसरी ओर, पति ने आवेदन का विरोध करते हुए विवाह और बच्चे के पितृत्व से इनकार किया। उसने आरोप लगाया कि पत्नी द्वारा पेश किए गए दस्तावेज फर्जी हैं और वह पहले से ही किसी जयवंत सीताराम सोनवणे से विवाहित थी।

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निचली अदालतों का फैसला:

  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC), औरंगाबाद ने 10 जनवरी 2020 को आवेदन को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए पत्नी और बेटे को 3,000 रुपये प्रति माह (प्रत्येक) और 25,000 रुपये मुआवजे के रूप में देने का आदेश दिया।
  • तदर्थ जिला न्यायाधीश-1 और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, औरंगाबाद ने अपील में भरण-पोषण की राशि को बढ़ाकर 6,000 रुपये प्रति माह (प्रत्येक) कर दिया, जबकि शेष आदेश को बरकरार रखा। पति की अपील खारिज कर दी गई।

दोनों पक्षों ने अपीलीय अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

दलीलें और सबूत

पत्नी ने अपने रिश्ते को साबित करने के लिए अपनी पहली शादी से हुए बेटे, अपनी बहन और जीजा की गवाही पर भरोसा किया। उसने दोनों पक्षों के नामों वाले फोटो और सरकारी दस्तावेज भी पेश किए।

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पति ने पत्नी की पिछली शादी को साबित करने के लिए नगर निगम और एक कंपनी के एचआर विभाग के अधिकारियों की गवाही करवाई। उसका तर्क था कि चूंकि वर्तमान विवाह वैध नहीं है, इसलिए पत्नी किसी राहत की हकदार नहीं है।

कोर्ट का विश्लेषण

न्यायमूर्ति वाघवासे ने DV एक्ट की धारा 2(f) के तहत “घरेलू संबंध” की परिभाषा का विश्लेषण किया। कोर्ट ने नोट किया कि पत्नी ने पुलिस और महिला शिकायत निवारण प्रकोष्ठ में की गई शिकायतों, तस्वीरों और बच्चे के स्कूल के दस्तावेजों सहित पर्याप्त सामग्री रिकॉर्ड पर रखी है, जिससे यह साबित होता है कि पक्षकार एक साथ रहते थे।

DV एक्ट के दायरे का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने कहा:

“यह पीड़ित महिला को तत्काल राहत प्रदान करने के लिए बनाया गया एक कानून है।”

कोर्ट ने अपने तर्क के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट के निम्नलिखित ऐतिहासिक फैसलों का हवाला दिया:

  1. ललिता टोप्पो बनाम झारखंड राज्य और अन्य (2019): यह स्थापित करना कि DV एक्ट भरण-पोषण के लिए एक प्रभावी उपाय प्रदान करता है, भले ही पीड़िता कानूनी रूप से विवाहित पत्नी न हो, क्योंकि लिव-इन पार्टनर भी राहत की हकदार है।
  2. चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार सिंह कुशवाह (2011): यह मानते हुए कि जो पुरुष लंबे समय तक किसी महिला के साथ रहा है, उसे महिला को छोड़ने पर भरण-पोषण देना होगा। कोर्ट ने कहा: “एक पुरुष को वास्तविक विवाह (de facto marriage) के लाभों का आनंद लेने के बाद कर्तव्यों और दायित्वों का पालन किए बिना कानूनी खामियों का लाभ उठाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”
  3. डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010): इसमें ‘विवाह की प्रकृति’ (relationship in the nature of marriage) वाले संबंधों पर चर्चा की गई है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि भले ही “वेरुल में कथित विवाह का कोई कानूनी सबूत नहीं है,” लेकिन दस्तावेजी और मौखिक सबूत, जिसमें पत्नी के रिश्तेदारों की गवाही शामिल है, इस निष्कर्ष का समर्थन करते हैं कि उनके बीच “विवाह की प्रकृति के संबंध” थे।

फैसला

निचली अदालतों के निष्कर्षों में कोई स्पष्ट अवैधता या गड़बड़ी न पाते हुए, हाईकोर्ट ने दोनों पुनरीक्षण याचिकाओं को खारिज कर दिया।

कोर्ट ने कहा:

“मौजूदा कानूनी प्रावधानों को संबंधित स्थानों और समय पर स्पर्श किया गया प्रतीत होता है, और केवल यह संतुष्ट होने पर कि पत्नी राहत की हकदार है, इसे बढ़ाया गया है।”

कोर्ट ने पत्नी और बेटे के लिए 6,000 रुपये प्रति माह के भरण-पोषण की पुष्टि की।

पति के वकील के अनुरोध पर, जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने की मंशा व्यक्त की थी, हाईकोर्ट ने पहले दी गई अंतरिम राहत को छह सप्ताह की अवधि के लिए जारी रखा।

मामले का शीर्षक: जनार्दन पुत्र भीमराव हरने बनाम रेखा पत्नी जनार्दन हरने और अन्य (तथा संबंधित मामला)

केस संख्या: क्रिमिनल रिविजन एप्लीकेशन नंबर 101 ऑफ 2021 

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