बॉम्बे हाईकोर्ट ने पुणे के तत्कालीन नगर आयुक्त (municipal commissioner) द्वारा जारी उन आदेशों को रद्द कर दिया है, जिनके जरिए एक सेवानिवृत्त नागरिक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच को रोक दिया गया था। कोर्ट के इस फैसले के बाद अब पुणे नगर निगम (PMC) के पूर्व मुख्य शहर अभियंता (Chief City Engineer) प्रशांत वाघमारे की लगभग ₹2,000 करोड़ की कथित बेहिसाब संपत्ति की “ओपन इंक्वायरी” का रास्ता साफ हो गया है।
यह मामला प्रशांत वाघमारे से जुड़ा है, जिन्होंने इस साल की शुरुआत में अपनी सेवानिवृत्ति से पहले 22 से अधिक वर्षों तक पुणे नगर निगम में मुख्य शहर अभियंता के रूप में कार्य किया था। साल 2016 में, पुणे के एक कार्यकर्ता तानाजी गंभीर ने वाघमारे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि वाघमारे ने अपनी आय के ज्ञात स्रोतों से कहीं अधिक लगभग ₹2,000 करोड़ की संपत्ति अर्जित की है।
आरोपों के अनुसार, इस संपत्ति को परिवार के सदस्यों और उनसे जुड़ी कई कंपनियों के माध्यम से रूट किया गया था। शिकायत मिलने के बाद, एसीबी ने एक गोपनीय जांच (discreet inquiry) शुरू की। इस प्रारंभिक जांच के दौरान, जांच अधिकारी ने पाया कि वाघमारे ने सहयोग नहीं किया और अपने निवेश, विदेश यात्राओं, वित्तीय लेनदेन और अपने बेटे की शिक्षा के खर्चों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी देने में विफल रहे। इसके बाद, एसीबी ने मामले की गहराई से जांच के लिए “ओपन इंक्वायरी” की सिफारिश की थी।
एसीबी की सिफारिश के बावजूद, तत्कालीन पीएमसी कमिश्नर सौरभ राव ने 16 अप्रैल और 25 अप्रैल, 2019 को दो आदेश जारी किए। इन आदेशों के माध्यम से उन्होंने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) की धारा 17ए के तहत जरूरी पूर्व अनुमति देने से इनकार कर दिया। कमिश्नर ने जांच एजेंसी की रिपोर्ट के बजाय खुद वाघमारे द्वारा दिए गए दस्तावेजों और स्पष्टीकरणों पर भरोसा किया और यह निष्कर्ष निकाला कि बेहिसाब संपत्ति का कोई मामला नहीं बनता है। इसके बाद एसीबी को अपनी गोपनीय जांच बंद करनी पड़ी थी।
जस्टिस ए. एस. गडकरी और जस्टिस रंजीतसिंह राजा भोंसले की खंडपीठ ने गुरुवार को तत्कालीन कमिश्नर के आदेशों को “कानूनी रूप से अस्थिर” बताते हुए रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि सक्षम प्राधिकारी (competent authority) ने केवल यह जांचने के बजाय कि क्या प्रथम दृष्टया (prima facie) कोई मामला बनता है, आरोपों का समानांतर मूल्यांकन (parallel assessment) शुरू कर दिया, जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था।
हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 17ए, जिसमें लोक सेवकों द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में किए गए कार्यों की जांच के लिए पूर्व मंजूरी की आवश्यकता होती है, बेहिसाब संपत्ति के मामलों पर लागू नहीं होती है। जजों ने कहा:
“एक लोक सेवक की ईमानदारी संदेह से परे होनी चाहिए। जहां अधिकृत जांच अधिकारी के पास ऐसी ईमानदारी पर संदेह करने वाली सामग्री हो, वहां व्यक्ति, संस्था और समाज के हित में जांच होनी ही चाहिए।”
हाईकोर्ट ने तत्कालीन कमिश्नर की आलोचना करते हुए कहा कि वे अपनी सीमित शक्तियों का उल्लंघन करके जांच प्रक्रिया को नहीं रोक सकते। कोर्ट ने टिप्पणी की, “ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन नगर आयुक्त ने अपने अधिकारी को बचाने के लिए अति-उत्साही प्रयास में खुद ही जांच अधिकारी की भूमिका संभाल ली थी।”
भ्रष्टाचार की गंभीरता पर प्रहार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यह “समाज के नैतिक ताने-बाने को नष्ट करता है” और “राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय हित के लिए हानिकारक है।” जजों ने स्पष्ट किया कि भ्रष्ट लोक सेवकों का पता लगाना और उन्हें दंडित करना, चाहे वे कितने भी ऊंचे पद पर क्यों न हों, कानून के तहत एक “आवश्यक जनादेश” है।
हाईकोर्ट ने 2019 के आदेशों को खारिज करते हुए कहा कि कमिश्नर का इनकार “शक्ति का दुरुपयोग और कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन” था। इन आदेशों के रद्द होने के साथ ही, एसीबी अब वाघमारे के कथित ₹2,000 करोड़ के संपत्ति पोर्टफोलियो की खुली जांच शुरू करने के लिए कानूनी रूप से स्वतंत्र है।

