बॉम्बे हाईकोर्ट ने विदेश में नौकरी दिलाने का झांसा देकर भारतीय युवाओं को साइबर ठगी के काम में लगाने के आरोप में गिरफ्तार एक व्यक्ति को जमानत देने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और यदि आरोपी को जमानत दी गई तो उसके फरार होने या साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की आशंका है।
न्यायमूर्ति ए. एस. गडकरी और न्यायमूर्ति एस. सी. चांदक की खंडपीठ ने जेरी फिलिप्स जैकब की जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि आरोपी ने भारत के शिक्षित लेकिन बेरोजगार युवाओं को विदेश में वैध नौकरी दिलाने का लालच देकर उन्हें तस्करी के जरिए बाहर भेजा।
10 मार्च को पारित आदेश में अदालत ने कहा कि जिन युवाओं को विदेश भेजा गया था, उन्हें शुरुआत में यह बताया गया कि वे विदेशी कंपनियों में वैध काम करेंगे। लेकिन विदेश पहुंचने के बाद उनसे लोगों को धोखा देकर अवैध रूप से धन प्राप्त करने वाले साइबर फ्रॉड में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।
अदालत ने कहा,
“अपराध गंभीर प्रकृति का है। ऐसा प्रतीत होता है कि यदि अपीलकर्ता को जमानत पर रिहा किया गया तो उसके फरार होने और साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने की संभावना है। इसलिए हम उसे जमानत देने के लिए इच्छुक नहीं हैं।”
मार्च 2024 में गिरफ्तार किए गए जैकब ने अपनी जमानत याचिका में दावा किया कि विदेश भेजे गए युवाओं को काम की प्रकृति के बारे में पहले से बताया गया था और उन्हें औपचारिक रोजगार अनुबंध भी दिए गए थे।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि उसने किसी को झांसा देकर मानव तस्करी नहीं की और न ही उन्हें गुलामी जैसी स्थिति में रखा गया। इसलिए उस पर गुलामी से जुड़े आरोप लगाना अवैध है।
हालांकि अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि जब युवाओं ने विदेश में किए जाने वाले काम के बारे में पूछा तो उन्हें यह विश्वास दिलाया गया कि उन्हें वैध रोजगार मिलेगा।
अदालत के अनुसार विदेश पहुंचने के बाद पीड़ितों को फर्जी सोशल मीडिया प्रोफाइल बनाने और ऑनलाइन पहचान तैयार करने के लिए कहा गया। इसके बाद उन्हें अन्य देशों के लोगों से संपर्क कर क्रिप्टोकरेंसी निवेश के नाम पर पैसे जमा कराने के लिए प्रेरित करने को कहा गया।
इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) कर रही है। एजेंसी के अनुसार दिसंबर 2022 से मार्च 2023 के बीच आरोपी और उसके चार सहयोगियों, जिनमें दो विदेशी नागरिक भी शामिल हैं, ने कंप्यूटर और अंग्रेजी भाषा में दक्ष भारतीय युवाओं को निशाना बनाया।
उन्हें थाईलैंड में आकर्षक नौकरी का वादा कर विदेश बुलाया गया, लेकिन बाद में उन्हें लाओस के गोल्डन ट्राएंगल विशेष आर्थिक क्षेत्र में ले जाकर फर्जी कॉल सेंटरों में साइबर ठगी के काम में लगा दिया गया। यह सब उन्हें टूरिस्ट वीजा पर भेजकर किया गया था।
अभियोजन के अनुसार वहां पीड़ितों को प्रताड़ित किया गया और गुलामी जैसी परिस्थितियों में काम कराया गया। जब कुछ पीड़ितों ने भारतीय दूतावास से मदद मांगने की कोशिश की, तो आरोपियों ने उनके साथ दुर्व्यवहार किया, मारपीट की और उनके पासपोर्ट भी छीन लिए।
बाद में स्थानीय पुलिस की मदद से पीड़ितों को वहां से बचाया गया और भारत वापस भेजा गया, जिसके बाद उन्होंने यहां शिकायत दर्ज कराई।
अभियोजन के अनुसार आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता के मानव तस्करी और गुलामी से जुड़े प्रावधानों के साथ-साथ इमिग्रेशन एक्ट और फॉरेनर्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।
एनआईए द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि आरोपी कथित धोखाधड़ी गतिविधियों से अवगत था। इन परिस्थितियों में अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी।

