उड़ीसा हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पहली पत्नी के जीवित रहते हुए किया गया दूसरा विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत शुरू से ही शून्य (void ab initio) होता है। कोर्ट ने यह भी निर्धारित किया कि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद भी ऐसा शून्य विवाह स्वतः वैध नहीं हो जाता। इस आधार पर, अदालत ने दूसरी पत्नी को ओडिशा सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1992 के तहत पारिवारिक पेंशन का हकदार मानने से इनकार कर दिया है।
जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद और जस्टिस चित्तरंजन दाश की खंडपीठ ने 13 जनवरी, 2026 को दिए अपने फैसले में कनकलाता द्विवेदी द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता, कनकलाता द्विवेदी ने लेखा नियंत्रक (Controller of Accounts), ओडिशा के 12 नवंबर, 2021 के आदेश को चुनौती दी थी। अधिकारियों ने उनकी फैमिली पेंशन की मांग को इस आधार पर खारिज कर दिया था कि मृतक कर्मचारी, स्वर्गीय निरंजन द्विवेदी ने अपनी पहली पत्नी, स्वर्गीय इंदुमती द्विवेदी के जीवित रहते हुए कनकलाता से दूसरी शादी की थी।
पेंशन अस्वीकृति आदेश में ओसीएस (पेंशन) नियम, 1992 के नियम 56 के उप-नियम (6) के क्लॉज-(d) के नीचे दिए गए नोट का हवाला दिया गया था। इसमें कहा गया था कि “श्रीमती कनकलाता द्विवेदी, स्वर्गीय निरंजन द्विवेदी की दूसरी पत्नी होने के कारण और कानूनी रूप से विवाहित पत्नी न होने के कारण फैमिली पेंशन की हकदार नहीं हैं।”
इससे पहले, अपीलकर्ता ने इस अस्वीकृति को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका (W.P.(C) No. 3822 of 2022) दायर की थी, जिसे 16 जुलाई, 2025 को एकल न्यायाधीश (Single Judge) ने खारिज कर दिया था। इसके बाद उन्होंने वर्तमान इंट्रा-कोर्ट अपील दायर की थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील सुश्री मधुमिता पांडा ने तर्क दिया कि ओडिशा सिविल सेवा (पेंशन) नियम, 1992 में विशेष रूप से “पत्नी/पत्नियों” (wife/wives) शब्द का प्रयोग किया गया है, जो यह संकेत देता है कि दूसरी पत्नी भी फैमिली पेंशन की हकदार हो सकती है, विशेषकर तब जब पहली पत्नी का निधन हो चुका हो।
यह भी दलील दी गई कि मृतक कर्मचारी ने दूसरा विवाह इसलिए किया था क्योंकि उनकी पहली पत्नी से कोई संतान नहीं थी। अपने दावे के समर्थन में, वकील ने सुप्रीम कोर्ट के श्रीमती श्रीरामबाई पत्नी पुंडलिक भावे बनाम कैप्टन, रिकॉर्ड ऑफिसर (2023 INSC 744) के फैसले का हवाला दिया।
प्रतिवादियों की ओर से पेश अतिरिक्त स्थायी वकील (ASC) श्री जे.के. खंडायतरे ने अपील का विरोध किया और पेंशन दावे को खारिज करने वाले आदेश को सही ठहराया।
कोर्ट का विश्लेषण और निर्णय
खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए माना कि हिंदू कानून के तहत पहली शादी के कायम रहते हुए दूसरी शादी की अनुमति नहीं है।
एकविवाह और हिंदू विवाह अधिनियम: फैसले को लिखते हुए जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के लागू होने के बाद, “एकविवाह (monogamy) एक अंगूठे का नियम है जिसका कोई अपवाद नहीं है।” कोर्ट ने कहा कि पहली शादी के रहते हुए दूसरी शादी का विचार इस अधिनियम के मूल उद्देश्य के खिलाफ है।
संतान न होने के तर्क पर कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा:
“अधिनियम संतानहीनता को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ विवाह करने के लिए उचित परिस्थिति के रूप में मान्यता नहीं देता है जो पहले से ही किसी अन्य के साथ वैवाहिक संबंध में है। दूसरे शब्दों में, अधिनियम के लागू होने के बाद, एकविवाह ही सर्वमान्य नियम है जिसका कोई अपवाद नहीं है।”
पेंशन नियमों की व्याख्या कोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया कि पेंशन नियमों में “पत्नियों” शब्द का उपयोग बहुविवाह को अधिकृत करता है। पीठ ने कहा:
“नियमों में आने वाला शब्द ‘पत्नियों’ किसी कर्मचारी को बहुविवाह या बहुपति प्रथा के माध्यम से कई व्यक्तियों के साथ विवाह करने का अधिकार नहीं देता है… अपीलकर्ता के वकील द्वारा शब्दकोश और व्याकरण के नियमों पर जोर देकर जो व्याख्या करने का प्रयास किया गया है, वह नीति की जड़ पर प्रहार करती है और इसलिए स्वीकार्य नहीं है। आखिर कानून के जानकारों का कहना है कि कानून न तो शब्दकोश का गुलाम है और न ही व्याकरण की किताब का नौकर।”
पहली पत्नी की मृत्यु के बाद शून्य विवाह की स्थिति: अदालत ने कानूनी सिद्धांत ex nihilo nihil fit (शून्य से कुछ भी नहीं निकलता) का हवाला देते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया कि पहली पत्नी की मृत्यु के बाद दूसरी शादी वैध हो गई। फैसले में कहा गया:
“जो शुरू से ही शून्य (void ab initio) है, वह बाद की घटना के घटित होने से वैध नहीं हो जाता… तथाकथित ‘दूसरी पत्नी’ को फैमिली पेंशन देना अवैधता को बढ़ावा देने के समान होगा।”
नजीरों में अंतर: पीठ ने अपीलकर्ता द्वारा उद्धृत श्रीमती श्रीरामबाई के मामले को वर्तमान मामले से अलग बताया। कोर्ट ने नोट किया कि उस मामले में लंबे समय तक साथ रहने के कारण वैध विवाह की धारणा (presumption) शामिल थी, जबकि वर्तमान मामले में दूसरी शादी पहली पत्नी के जीवनकाल में की गई थी, जो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 17 और आईपीसी की धारा 495 के तहत द्विविवाह (bigamy) का अपराध है।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के राज कुमारी बनाम कृष्णा (2015) के फैसले पर भरोसा जताया, जिसमें दूसरी पत्नी को फैमिली पेंशन देने से इनकार किया गया था, और कर्नाटक हाईकोर्ट के महालक्ष्मीअम्मा बनाम सचिव (2023) के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था कि इस तरह के रिश्तों को मान्यता देना “जनहित के लिए हानिकारक” है।
खंडपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि रिट अपील में कोई योग्यता नहीं है और तदनुसार इसे खारिज कर दिया, जिससे फैमिली पेंशन से इनकार करने का निर्णय बरकरार रहा।
केस डिटेल्स:
केस टाइटल: कनकलाता द्विवेदी बनाम ओडिशा राज्य और अन्य
केस नंबर: W.A. NO.1460 OF 2025
कोरम: जस्टिस दीक्षित कृष्ण श्रीपाद और जस्टिस चित्तरंजन दाश

