इंदौर जल संकट: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भगीरथपुरा जल प्रदूषण की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में आयोग गठित किया

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने इंदौर के भगीरथपुरा क्षेत्र में संदूषित पेयजल से हुई मौतों और बीमारी की गंभीर स्थिति को देखते हुए पूर्व न्यायाधीश जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में एक सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित किया है। कोर्ट ने कहा कि यह मामला स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच तथा “तत्काल न्यायिक निरीक्षण” की मांग करता है।

यह आदेश मंगलवार देर रात जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ ने कई जनहित याचिकाओं पर सुनवाई के बाद पारित किया। याचिकाओं में आरोप लगाया गया था कि क्षेत्र में गंदा पानी पीने से दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है।

राज्य सरकार ने स्वीकार किया कि भगीरथपुरा में हालिया गैस्ट्रोएन्टेराइटिस (उल्टी-दस्त) के प्रकोप के दौरान हुई 23 मौतों में से 16 की वजह संदूषित पेयजल हो सकती है। यह दावा महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज की पांच सदस्यीय समिति की रिपोर्ट पर आधारित था।

हालांकि, कोर्ट ने रिपोर्ट में इस्तेमाल “वर्बल ऑटोप्सी” शब्द पर आपत्ति जताई और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “हमने यह शब्द पहली बार सुना है।” कोर्ट ने रिपोर्ट की वैज्ञानिकता पर सवाल उठाया।

कोर्ट ने कहा कि मीडिया और याचिकाकर्ताओं के अनुसार अब तक लगभग 30 लोगों की मौत हुई है, जबकि सरकारी रिपोर्ट में केवल 16 मौतों का जिक्र है, वो भी बिना किसी ठोस रिकॉर्ड के। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तस्वीरें, मेडिकल दस्तावेज और शिकायतें गंभीर स्वास्थ्य संकट की ओर इशारा करती हैं, जिससे त्वरित न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है।

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कोर्ट ने यह भी बताया कि मHOW समेत इंदौर के अन्य क्षेत्रों से भी पानी के कारण लोगों के बीमार होने की खबरें आई हैं।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में आयोग की विस्तृत जिम्मेदारियां तय की हैं, जिनमें शामिल हैं:

  • यह जांचना कि क्या भगीरथपुरा में आपूर्ति किया गया पेयजल वास्तव में प्रदूषित था।
  • जल प्रदूषण के स्रोत की पहचान करना (जैसे सीवेज मिलना, पाइपलाइन में रिसाव, औद्योगिक अपशिष्ट आदि)।
  • संदूषित जल से हुई वास्तविक मौतों की संख्या निर्धारित करना।
  • बीमारियों की प्रकृति, मेडिकल प्रतिक्रिया और रोकथाम की adequacy की जांच करना।
  • तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान सुझाना।
  • जिम्मेदार अधिकारियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश करना।
  • पीड़ितों, विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों, को मुआवज़ा देने के लिए दिशा-निर्देश देना।
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जांच आयोग को सिविल न्यायालय जैसी शक्तियां दी गई हैं। यह आयोग किसी भी सरकारी अधिकारी को समन भेज सकता है, दस्तावेज मांग सकता है, मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं से जल परीक्षण करवा सकता है और घटनास्थल का निरीक्षण भी कर सकता है।

कोर्ट ने इंदौर नगर निगम, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग, जिला प्रशासन और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आयोग को पूरा सहयोग देने का आदेश दिया है। राज्य सरकार को आयोग के लिए कार्यालय, स्टाफ और अन्य सुविधाएं उपलब्ध कराने का निर्देश भी दिया गया है।

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राज्य सरकार द्वारा अदालत में दाखिल स्थिति रिपोर्ट के अनुसार, अब तक उल्टी-दस्त के प्रकोप के चलते 454 मरीज अस्पताल में भर्ती हुए, जिनमें से 441 को छुट्टी मिल चुकी है और 11 अभी भी भर्ती हैं। अधिकारियों ने बताया कि एक सार्वजनिक शौचालय के पास पाइपलाइन में रिसाव होने के कारण पीने के पानी में सीवेज मिल गया था।

कोर्ट ने आदेश दिया है कि आयोग कार्यवाही शुरू करने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत करे।

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