आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट: बिना ठोस कारण के ‘यथास्थिति बहाल’ करने का आदेश देना गलत, निचली अदालत का फैसला निरस्त

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि ‘स्टेटस क्वो एंटे’ (Status Quo Ante) यानी पूर्ववत स्थिति बहाल करने का आदेश हल्के में नहीं दिया जाना चाहिए। न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम की खंडपीठ ने विशाखापत्तनम के विशेष न्यायाधीश (वाणिज्यिक विवाद) द्वारा पारित उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी को लीज विवाद में ‘स्टेटस क्वो एंटे’ बनाए रखने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने कहा कि बिना उचित कारण बताए इस तरह का अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) आदेश पारित नहीं किया जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

यह विवाद विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी (अपीलकर्ता) और मेसर्स विश्वनाथ एवेन्यूज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड (प्रतिवादी) के बीच एक लीज एग्रीमेंट से जुड़ा है। पोर्ट अथॉरिटी ने 2 फरवरी, 2024 को प्रतिवादी को सलाग्रामपुरम स्थित “वीपीए कलवानी ए/सी ऑडिटोरियम” और नेहरू स्पोर्ट्स एंड कल्चरल कॉम्प्लेक्स में निर्मित क्षेत्र के लिए 10 साल की लीज दी थी।

लीज की शर्तों के कथित उल्लंघन के बाद, पोर्ट अथॉरिटी ने कारण बताओ नोटिस जारी किया और बैंक गारंटी को भुनाने की प्रक्रिया शुरू की। इसके बाद, 10/11 सितंबर, 2025 को टर्मिनेशन नोटिस जारी कर 11 दिसंबर, 2025 तक संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया गया।

प्रतिवादी कंपनी ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत विशेष न्यायाधीश के समक्ष अंतरिम राहत के लिए याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए, विशेष न्यायाधीश ने 19 दिसंबर, 2025 को एक आदेश पारित किया जिसमें कहा गया: “पक्षकार 22.12.2025 तक इस याचिका के दायर होने की तिथि वाली पूर्ववत स्थिति (status quo ante) बनाए रखें।”

इस आदेश से असंतुष्ट होकर विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

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कोर्ट में क्या दी गईं दलीलें?

पोर्ट अथॉरिटी की ओर से अधिवक्ता श्री रवि तेजा पादिरी ने तर्क दिया कि ‘स्टेटस क्वो एंटे’ का आदेश बिना कोई कारण बताए पारित किया गया है, जो कानूनी रूप से सही नहीं है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 19 दिसंबर के आदेश से पहले ही, 15 दिसंबर 2025 को पोर्ट अथॉरिटी ने संपत्ति का कब्जा ले लिया था। ऐसे में, पूर्ववत स्थिति बहाल करने का आदेश अनुचित था।

दूसरी ओर, प्रतिवादी की ओर से महाधिवक्ता (Advocate General) श्री दम्मलपति श्रीनिवास ने विशेष न्यायाधीश के आदेश का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि 10 दिसंबर 2025 को कोर्ट ने पार्टियों को लीज शर्तों के अनुसार कार्य करने का निर्देश दिया था, लेकिन पोर्ट अथॉरिटी ने लीज शर्तों और पब्लिक प्रेमिसेस एक्ट की प्रक्रिया का पालन किए बिना कब्जा लिया। उन्होंने दावा किया कि ‘स्टेटस क्वो एंटे’ आदेश के बाद प्रतिवादी ने कब्जा वापस प्राप्त कर लिया है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में मुख्य रूप से 19 दिसंबर, 2025 के उस अंतरिम आदेश की वैधता की जांच की। खंडपीठ ने पाया कि विशेष न्यायाधीश ने इतना महत्वपूर्ण राहत आदेश देते समय कोई कारण (reasons) दर्ज नहीं किए थे।

‘स्टेटस क्वो एंटे’ की अवधारणा पर चर्चा करते हुए, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले किशोर कुमार खेतान बनाम प्रवीण कुमार सिंह (2006) का हवाला दिया। कोर्ट ने कहा:

“अंतरिम अनिवार्य निषेधाज्ञा (Interim Mandatory Injunction) आसानी से दिया जाने वाला उपाय नहीं है। यह आदेश केवल तभी पारित किया जाना चाहिए जब परिस्थितियाँ स्पष्ट हों और प्रथम दृष्टया सामग्री यह साबित करती हो कि एक पक्ष ने यथास्थिति को बदल दिया है और न्याय के हित में पूर्ववत स्थिति बहाल करना आवश्यक है।”

खंडपीठ ने असिस्टेंट कमिश्नर बनाम शुक्ला एंड ब्रदर्स (2010) के फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि “कारण कानून की आत्मा है” (Reason is the very life of law)। बिना कारण बताए पारित किया गया आदेश टिकने योग्य नहीं है।

कोर्ट ने प्रतिवादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पोर्ट अथॉरिटी ने लीज शर्तों का उल्लंघन किया था, क्योंकि निचले कोर्ट के आदेश में इस बात का कोई जिक्र नहीं था कि आदेश इसी आधार पर दिया जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आदेश की वैधता उसमें लिखे कारणों से जांची जानी चाहिए, न कि बाद में दिए गए तर्कों या शपथ पत्रों से।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विशेष न्यायाधीश का आदेश उचित नहीं था क्योंकि उसमें न तो परिस्थितियों का औचित्य बताया गया और न ही ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज किया गया जो ‘स्टेटस क्वो एंटे’ को सही ठहरा सके।

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फैसला

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित 19 दिसंबर, 2025 के आदेश को निरस्त (Set Aside) कर दिया। कोर्ट ने विशाखापत्तनम के विशेष न्यायाधीश को निर्देश दिया कि वे धारा 9 के तहत लंबित मुख्य याचिकाओं का निपटारा कानून के अनुसार और तय तारीख (27 जनवरी, 2026) पर करें।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: द विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी व अन्य बनाम मेसर्स विश्वनाथ एवेन्यूज (इंडिया) प्राइवेट लिमिटेड / मेसर्स विश्वनाथ स्पोर्ट्स एंड कन्वेंशन प्राइवेट लिमिटेड
  • केस नंबर: COMCA Nos. 29 & 30 of 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी और न्यायमूर्ति महेश्वर राव कुंचेम
  • अपीलकर्ताओं के वकील: श्री रवि तेजा पादिरी
  • प्रतिवादियों के वकील: श्री दम्मलपति श्रीनिवास (एडवोकेट जनरल), सहायता: श्री एस.वी.एस.एस. शिव राम

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