आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 9 के तहत दिए गए एड-अंतरिम ‘यथास्थिति’ आदेश के खिलाफ अपील सुनवाई योग्य: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 37(1)(b) के तहत धारा 9 के अंतर्गत पारित एड-अंतरिम (ad-interim) आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है, भले ही अंतरिम उपायों के लिए मुख्य याचिका निचली अदालत में लंबित हो। खंडपीठ ने रजिस्ट्री की आपत्ति को खारिज करते हुए निर्धारित किया कि पार्टियों को “यथास्थिति” (status quo ante) बनाए रखने का निर्देश देने वाला आदेश अपील योग्य आदेश की श्रेणी में आता है।

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ, जिसमें जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम शामिल थे, ने यह निर्धारित किया कि कमर्शियल कोर्ट द्वारा आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 9 के तहत पारित एड-अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील पोषणीय (maintainable) है। कोर्ट ने रजिस्ट्री द्वारा उठाई गई आपत्तियों को दरकिनार करते हुए कहा कि “यथास्थिति” बनाए रखने का आदेश धारा 37(1)(b) के तहत “उपाय प्रदान करने” (granting a measure) के समान है, और इसलिए इसके खिलाफ अपील की जा सकती है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला विशाखापत्तनम में कमर्शियल विवादों के निपटारे के लिए विशेष न्यायाधीश द्वारा CAOP संख्या 37 और 38 (2025) में पारित आदेशों से उत्पन्न हुआ। मैसर्स विश्वनाथ एवेन्यूज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड और मैसर्स विश्वनाथ स्पोर्ट्स एंड कन्वेंशन्स प्राइवेट लिमिटेड (अपील में प्रतिवादी) ने आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत अंतरिम उपायों की मांग करते हुए कमर्शियल कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

19 दिसंबर 2025 को, विशेष न्यायाधीश ने एक आदेश पारित किया जिसमें निर्देश दिया गया कि “पार्टियां इस याचिका के दाखिल होने की तारीख की स्थिति को 22.12.2025 तक यथावत (status quo ante) बनाए रखेंगी।” इस एड-अंतरिम निर्देश से असंतुष्ट होकर, विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी ने आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37(1)(b) और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 13(1) के तहत हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने अपील की पोषणीयता पर आपत्ति जताते हुए प्रश्न किया कि यह अपील कैसे स्वीकार्य है, संभवतः इसलिए क्योंकि धारा 9 की याचिका अभी भी विशेष अदालत के समक्ष विचाराधीन थी और चुनौती दिया गया आदेश केवल एड-अंतरिम प्रकृति का था।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता, विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 37 के तहत आर्बिट्रेशन एक्ट, 1996 की धारा 9 के तहत दिए गए “किसी भी उपाय” (any measure) के खिलाफ अपील की जा सकती है, जैसा कि उप-धारा 1(b) में विशेष रूप से प्रावधान किया गया है।

इसके विपरीत, प्रतिवादियों के विद्वान अधिवक्ता ने मेघालय हाईकोर्ट के नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन बनाम मेघालय पावर डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड (2021) के फैसले का हवाला देते हुए तर्क दिया कि धारा 37(1)(b) केवल अंतिम आदेशों के खिलाफ अपील पर विचार करती है, न कि एड-अंतरिम आदेशों के खिलाफ।

कोर्ट का विश्लेषण और अवलोकन

खंडपीठ ने आर्बिट्रेशन एक्ट, 1996 की धारा 37 और कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट, 2015 की धारा 13 का विस्तृत विश्लेषण किया।

कोर्ट ने कहा कि धारा 37(1)(b) स्पष्ट रूप से यह प्रावधान करती है कि “धारा 9 के तहत किसी भी उपाय को देने या देने से इनकार करने” वाले आदेशों के खिलाफ अपील होगी। पीठ ने टिप्पणी की:

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“हमारा विचार है कि 19.12.2025 का आदेश धारा 9 के तहत उपायों में से एक यानी ‘अंतरिम निषेधाज्ञा’ (interim injunction) प्रदान करने वाला आदेश है। इसलिए, प्रथम दृष्टया, 19.12.2025 का आदेश धारा 37(1)(b) के अंतर्गत आता है।”

कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के साथ समानता भी देखी। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व निर्णय इनोवेटिव फार्मा सर्जिकल्स बनाम पिजन मेडिकल डिवाइसेज प्रा. लि. (2004) का हवाला देते हुए, पीठ ने नोट किया कि आदेश 39 नियम 1 CPC के तहत एड-अंतरिम निषेधाज्ञा आदेश के खिलाफ अपील आदेश 43 नियम 1(r) CPC के तहत पोषणीय है। कोर्ट ने इस सिद्धांत को आर्बिट्रेशन एक्ट पर लागू करते हुए तर्क दिया कि चूंकि आदेश CPC के प्रावधानों के तहत अपील योग्य था, इसलिए यह आर्बिट्रेशन एक्ट के तहत भी अपील योग्य आदेशों के दायरे में आता है।

पीठ ने मेघालय हाईकोर्ट के नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन मामले में दिए गए उस दृष्टिकोण से स्पष्ट रूप से असहमति जताई, जिसमें कहा गया था कि धारा 37(1)(b) केवल अंतिम आदेशों पर लागू होती है। पीठ ने कहा:

“सम्मान के साथ हम मेघालय हाईकोर्ट के इस विचार से सहमत नहीं हैं… कि धारा 37(1)(b) केवल अंतिम आदेशों के खिलाफ अपील पर विचार करती है और एड-अंतरिम आदेशों के खिलाफ नहीं।”

सुप्रीम कोर्ट के फैसले कांडला एक्सपोर्ट कॉर्पोरेशन बनाम ओसीआई कॉर्पोरेशन (2018) का उल्लेख करते हुए, कोर्ट ने दोहराया कि आदेश 43 CPC और आर्बिट्रेशन एक्ट की धारा 37 के तहत विशेष रूप से enumerated (सूचीबद्ध) अपीलें कमर्शियल कोर्ट्स एक्ट की धारा 13(1A) के प्रावधान के तहत पोषणीय हैं।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यथास्थिति (status quo ante) का निर्देश देने वाला आदेश धारा 9 के तहत एक उपाय प्रदान करने वाला आदेश था और इसलिए यह अपील योग्य है। कोर्ट ने कहा:

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“हमारा विचार है कि विवादित आदेश एक्ट, 1996 की धारा 37(1)(b) और आदेश 43 नियम 1(r) CPC के अंतर्गत आता है… उपर्युक्त के मद्देनजर, अपील पोषणीय है।”

कोर्ट ने कार्यालय की आपत्ति को खारिज कर दिया और अपील को नंबर देने का निर्देश दिया। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसका आदेश विशेष न्यायाधीश को धारा 9 के तहत लंबित याचिका पर निर्णय लेने से नहीं रोकेगा।

केस डिटेल्स:

  • केस टाइटल: द विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी बनाम मैसर्स विश्वनाथ एवेन्यूज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (और संबंधित मामला)
  • केस नंबर: कमर्शियल कोर्ट अपील (SR) संख्या 53095 और 53096 ऑफ 2025
  • कोरम: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस महेश्वर राव कुंचेम

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