आंध्रा प्रदेश हाईकोर्ट ने खारिज की सिविल रिवीजन याचिका; कहा- विवादित तथ्यों पर आधारित परिसीमा का प्रश्न ट्रायल का विषय है

आंध्रा प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में उस सिविल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा परिसीमा (Limitation) के आधार पर वाद (Plaint) को अस्वीकार करने से मना कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब वाद के अधिकार (Cause of Action) के पहले उद्भव की तिथि विवादित हो, तो यह कानून और तथ्य का एक मिश्रित प्रश्न बन जाता है, जिसे सीपीसी के आदेश VII नियम 11 के तहत प्रारंभिक स्तर पर संक्षिप्त रूप से तय नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने यह आदेश याचिकाकर्ताओं (प्रतिवादियों) द्वारा दायर उस आवेदन के संदर्भ में दिया, जिसमें उन्होंने घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के वाद को परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 के तहत वर्जित बताते हुए खारिज करने की मांग की थी।

मामले की पृष्ठभूमि

उत्तरदाता (वादी) ने शुरुआत में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा के लिए एक वाद (O.S.No.1492/2005) दायर किया था, जिसे 2016 में खारिज कर दिया गया था। इसके बाद, उत्तरदाता ने शीर्षक की घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा के लिए एक नया वाद (O.S.No.230/2021) दायर किया। इस दूसरे मुकदमे में, याचिकाकर्ताओं ने आदेश VII नियम 11(d) सीपीसी के तहत एक आवेदन दायर कर तर्क दिया कि यह मुकदमा समय-सीमा से बाहर है क्योंकि 2005 के मुकदमे के लिखित बयान में ही शीर्षक (Title) को चुनौती दे दी गई थी, और इस तरह अनुच्छेद 58 के तहत तीन साल की अवधि समाप्त हो चुकी है।

वहीं, वादी-उत्तरदाता ने तर्क दिया कि घोषणा के मुकदमे के लिए वाद का अधिकार केवल 15 अगस्त, 2021 को उत्पन्न हुआ, जब प्रतिवादियों ने कथित तौर पर संपत्ति में अनधिकृत प्रवेश का प्रयास किया और स्वामित्व का झूठा दावा पेश किया।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ताओं के वकील: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री बी. नलिन कुमार ने तर्क दिया कि इस संदर्भ में परिसीमा का प्रश्न कानून का एक शुद्ध प्रश्न है। उन्होंने दलील दी कि चूंकि प्रतिवादियों ने 2005 के लिखित बयान में ही वादी के शीर्षक से इनकार कर दिया था, इसलिए “मुकदमा करने का अधिकार पहली बार” तभी उत्पन्न हुआ था। उन्होंने निखिला दिव्यांग मेहता बनाम हितेश पी. सांघवी मामले का हवाला देते हुए कहा कि अदालत को वाद के साथ दायर दस्तावेजों को देखना चाहिए, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मुकदमा प्रथम दृष्टया वर्जित है।

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वादी-उत्तरदाता का पक्ष: उत्तरदाता ने आवेदन को समयपूर्व और गलत बताया। उनका तर्क था कि 15 अगस्त, 2021 का शत्रुतापूर्ण कृत्य शीर्षक की घोषणा के लिए वास्तविक कारण बना और 2021 में दायर मुकदमा तीन साल की सीमा के भीतर था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण

हाईकोर्ट ने सीपीसी के आदेश VII नियम 11 और परिसीमा अधिनियम के अनुच्छेद 58 के दायरे की समीक्षा की। न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहारी ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

  1. वाद के कथनों का पालन: दाहिबेन बनाम अरविंदभाई कल्याणजी भानुशाली मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि आदेश VII नियम 11 के तहत केवल वाद के कथनों और उसके साथ संलग्न सामग्री पर ही विचार किया जाना चाहिए। इस स्तर पर प्रतिवादी का बचाव अप्रासंगिक है।
  2. तथ्य और कानून का मिश्रित प्रश्न: कोर्ट ने पाया कि जब वाद के अधिकार के पहले उद्भव की तिथि विवादित हो, तो यह तथ्य और कानून का मिश्रित प्रश्न बन जाता है। हाईकोर्ट ने कहा:
    “यदि प्रतिवादी वाद में उल्लिखित तिथि पर विवाद करता है… तो सबसे पहला प्रश्न यह होगा कि वाद का अधिकार वास्तव में कब उत्पन्न हुआ… इसके लिए साक्ष्य (Evidence) की आवश्यकता होगी।”
  3. इनकार की प्रकृति: कोर्ट ने 2005 के पिछले फैसले का सूक्ष्म परीक्षण किया और पाया कि प्रतिवादियों ने केवल यह दावा किया था कि वादी का विक्रेता “विशेष मालिक (Exclusive Owner)” नहीं था। कोर्ट ने टिप्पणी की:
    “प्रतिवादियों का मामला ‘अनन्य शीर्षक न होने’ का था, न कि पूर्ण शीर्षक से इनकार का। ‘अनन्य नहीं’ का अर्थ है एकमात्र स्वामी न होना… लेकिन दूसरों के साथ होना।” अदालत ने माना कि 2005 में शीर्षक से ऐसा कोई “स्पष्ट और असंदिग्ध” इनकार नहीं था जो अनुच्छेद 58 के तहत परिसीमा अवधि को शुरू कर सके।
  4. अनुच्छेद 58 बनाम अनुच्छेद 65: एन. थजुद्दीन बनाम तमिलनाडु खादी और ग्रामोद्योग बोर्ड मामले का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कब्जे की वसूली जैसे परिणामी राहत वाले मुकदमों में परिसीमा अनुच्छेद 65 (12 वर्ष) द्वारा शासित हो सकती है, न कि अनुच्छेद 58 (3 वर्ष) द्वारा।
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हाईकोर्ट का निर्णय

न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के आवेदन को खारिज करके कोई अवैध कार्य नहीं किया है। चूंकि वाद में 2021 को वाद के अधिकार की तिथि बताया गया है, इसलिए प्रथम दृष्टया मुकदमा समय के भीतर प्रतीत होता है। यह विवाद कि क्या वाद का अधिकार पहले उत्पन्न हुआ था, ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर तय किया जाने वाला विषय है।

हाईकोर्ट ने इसी के साथ सिविल रिवीजन याचिका को खारिज कर दिया।

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