इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में यह स्थापित किया है कि यदि किसी राज्य के कानून या नियम के हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों के बीच कोई विरोधाभास या भिन्नता होती है, तो अंग्रेजी संस्करण को ही आधिकारिक और प्रामाणिक माना जाएगा। यह निर्णय एक रिट याचिका पर आया, जिसमें एक उम्मीदवार ने सेवा नियमों के हिंदी संस्करण के आधार पर सरकारी पद के लिए विचार करने की मांग की थी, जो उसके अंग्रेजी समकक्ष से भिन्न था। न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 348(3) के तहत अंग्रेजी पाठ की संवैधानिक सर्वोच्चता की पुष्टि करते हुए याचिका खारिज कर दी।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, माया शुक्ला उर्फ माया मिश्रा ने ‘कटिंग स्विंग’ पद के लिए चयन प्रक्रिया में भाग लेने की अनुमति देने के लिए अधीनस्थ सेवा चयन आयोग को निर्देश देने की मांग करते हुए एक रिट याचिका दायर की थी। उनका दावा यू.पी. औद्योगिक शिक्षण संस्थान (अनुदेशक) सेवा नियमावली, 2014 पर आधारित था।

पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता जितेंद्र कुमार पांडेय और अंकित पांडेय ने तर्क दिया कि उनकी पात्रता और योग्यता की गणना 2014 के सेवा नियमों के हिंदी संस्करण के नियम 16(3)(क)(द) के अनुसार की जानी चाहिए। इस खंड में यह निर्दिष्ट है कि चयन प्रक्रिया के लिए, प्रत्येक उम्मीदवार को “राष्ट्रीय व्यवसाय प्रमाण पत्र/राष्ट्रीय शिक्षुता प्रमाण पत्र परीक्षा में प्राप्त अंकों का बीस प्रतिशत” दिया जाएगा।
इसका विरोध करते हुए, प्रतिवादियों का प्रतिनिधित्व कर रहे अधिवक्ता गौरव मेहरोत्रा, उत्सव मिश्रा और मुख्य स्थायी वकील (C.S.C.) ने दलील दी कि याचिकाकर्ता की उम्मीदवारी पर इसलिए विचार नहीं किया गया क्योंकि नवंबर 2015 में जारी भर्ती विज्ञापन, नियमों के अंग्रेजी संस्करण के अनुसार तैयार किया गया था। यू.पी. इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट्स (इंस्ट्रक्टर्स) सर्विस रूल्स, 2014 के रूप में जाने जाने वाले अंग्रेजी पाठ का नियम 16(3)(a)(ii) यह निर्धारित करता है कि “राष्ट्रीय व्यवसाय प्रमाण पत्र परीक्षा/राष्ट्रीय शिक्षुता प्रमाण पत्र परीक्षा में प्राप्त अंकों के प्रतिशत का बीस प्रतिशत प्रत्येक उम्मीदवार को दिया जाएगा”। प्रतिवादियों का तर्क था कि विरोधाभास की स्थिति में, संविधान के अनुच्छेद 348(3) के अनुसार अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
न्यायालय का विश्लेषण और निष्कर्ष
न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने दलीलों और अभिलेखों की जांच करने पर नियम के हिंदी और अंग्रेजी संस्करणों के बीच “स्पष्ट विरोधाभास” पाया। न्यायालय के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह था कि कौन सा संस्करण प्रबल होगा।
न्यायालय का विश्लेषण भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(3) पर केंद्रित था, जिसमें कहा गया है:
“खंड (1) के उप-खंड (ख) में किसी बात के होते हुए भी, जहाँ किसी राज्य के विधान-मंडल ने उस विधान-मंडल में पुरःस्थापित विधेयकों या उसके द्वारा पारित अधिनियमों में अथवा उस राज्य के राज्यपाल द्वारा प्रख्यापित अध्यादेशों में अथवा उस उप-खंड के पैरा (iii) में निर्दिष्ट किसी आदेश, नियम, विनियम या उप-विधि में प्रयोग के लिए अंग्रेजी भाषा से भिन्न कोई भाषा विहित की है, वहाँ उस राज्य के राजपत्र में उस राज्य के राज्यपाल के प्राधिकार से प्रकाशित अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद इस अनुच्छेद के अधीन उसका अंग्रेजी भाषा में प्रामाणिक पाठ समझा जाएगा।”
न्यायालय ने पाया कि अनुच्छेद 348 का खंड 3 “स्पष्ट रूप से यह निर्धारित करता है कि स्थानीय भाषा और अंग्रेजी भाषा के बीच किसी भी विरोधाभास की स्थिति में, अंग्रेजी भाषा को ही प्रामाणिक माना जाएगा।”
फैसले में सुप्रीम कोर्ट के प्रभात कुमार शर्मा बनाम संघ लोक सेवा आयोग व अन्य, (2006) 10 SCC 587 मामले में दिए गए निर्णय पर भरोसा किया गया, जिसमें अनुच्छेद 348 और राजभाषा अधिनियम, 1963 की समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया था कि “संसद के अधिनियमों के संबंध में अंग्रेजी प्रामाणिक पाठ बनी रहेगी।”
न्यायालय ने श्रीमती राम रति व अन्य बनाम ग्राम समाज जेहवा, AIR 1974 इलाहाबाद 106 (FB) में इलाहाबाद हाईकोर्ट की पांच-न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ के फैसले का भी विस्तार से उल्लेख किया। पूर्ण पीठ ने माना था कि भले ही कोई राज्य अधिनियम हिंदी में पारित किया गया हो, “अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद उसका प्रामाणिक पाठ माना जाएगा और यह उसके हिंदी संस्करण पर प्रबल होगा।”
न्यायालय का निर्णय
अपने विश्लेषण का समापन करते हुए, न्यायालय ने माना कि संविधान और न्यायिक दृष्टांतों दोनों से प्राप्त स्थापित कानूनी स्थिति यह अनिवार्य करती है कि किसी भी अनुवाद पर कानून का अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।
फैसले में कहा गया, “उपरोक्त तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए, यह बिल्कुल स्पष्ट है कि न केवल भारत के संविधान के अनुच्छेद 348(3) के संदर्भ में, बल्कि माननीय सुप्रीम कोर्ट और इस न्यायालय की पूर्ण पीठ के निर्णयों के संदर्भ में भी, किसी भी विधेयक, आदेश या सेवा विनियमों के किसी भी हिंदी अनुवाद का अंग्रेजी संस्करण ही मान्य होगा।”
चूंकि याचिकाकर्ता हिंदी संस्करण का लाभ मांग रही थी, जिसे न्यायालय ने इस संदर्भ में गैर-प्रामाणिक पाया, इसलिए याचिका को प्रवेश स्तर पर ही खारिज कर दिया गया।