इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि यदि पत्नी के परिवार के सदस्यों द्वारा किए गए आपराधिक कृत्य के कारण पति अपनी आजीविका कमाने में असमर्थ हो जाता है, तो पत्नी उससे भरण-पोषण का दावा नहीं कर सकती है।
न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ल की एकल पीठ ने एक पत्नी द्वारा दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (Criminal Revision Petition) को खारिज कर दिया और परिवार न्यायालय के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण के आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
याची (पत्नी) ने हाईकोर्ट में कुशीनगर स्थित प्रधान न्यायाधीश, परिवार न्यायालय के 7 मई, 2025 के आदेश को चुनौती दी थी। निचली अदालत ने यह कहते हुए अंतरिम भरण-पोषण की मांग को खारिज कर दिया था कि विपक्षी (पति), जो एक होम्योपैथी डॉक्टर है, पत्नी के परिवार द्वारा की गई गोलीबारी की घटना के कारण आजीविका कमाने में अक्षम हो गया है।
रिकॉर्ड के अनुसार, 13 अप्रैल, 2019 को जब पति अपने क्लिनिक पर कार्य कर रहा था, तब पत्नी के सगे भाई और पिता चार अन्य लोगों के साथ वहां पहुंचे और गाली-गलौज की। जब पति ने विरोध किया, तो पत्नी के भाई ने उन पर गोली चला दी।
निर्णय में नोट किया गया कि “छर्रा अभी भी उनकी रीढ़ की हड्डी में फंसा हुआ है और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार, इसे निकालने के किसी भी प्रयास से लकवा (paralysis) हो सकता है।” इस चोट के कारण, पति थोड़ी देर के लिए भी आराम से बैठने में असमर्थ है, बेरोजगार हो गया है और कोई भी आय अर्जित करने में अक्षम है।
पक्षकारों की दलीलें
पत्नी के वकीलों ने तर्क दिया कि निचली अदालत का आदेश “अवैध और मनमाना” था। उनका कहना था कि विपक्षी एक डॉक्टर है और उसके पास अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन हैं। वकीलों ने जोर देकर कहा कि पर्याप्त साधन होने के बावजूद पति ने भरण-पोषण नहीं दिया, और निचली अदालत ने आवेदन खारिज करके गलती की है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों पर गौर करते हुए पाया कि यह मामला सामान्य मामलों से अलग है। अदालत ने शमीमा फारूकी बनाम शाहिद खान (2015) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि पति का भरण-पोषण का दायित्व उसकी वास्तविक कमाने की क्षमता पर निर्भर करता है।
न्यायमूर्ति शुक्ल ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह सुस्थापित है कि हालांकि अपनी पत्नी का भरण-पोषण करना पति का पवित्र दायित्व है, लेकिन किसी भी न्यायालय द्वारा पत्नी पर ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी कर्तव्य नहीं डाला गया है। वर्तमान मामले के तथ्यों में, प्रथम दृष्टया यह प्रतीत होता है कि पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के आचरण ने विपक्षी (पति) को आजीविका कमाने में अक्षम कर दिया है।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:
“यदि कोई पत्नी अपने स्वयं के कार्यों या चूक से पति की कमाने की क्षमता को समाप्त करने में योगदान देती है या उसका कारण बनती है, तो उसे ऐसी स्थिति का लाभ उठाने और भरण-पोषण का दावा करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। ऐसी परिस्थितियों में भरण-पोषण देने से पति के साथ घोर अन्याय होगा, और न्यायालय रिकॉर्ड से सामने आने वाली वास्तविकता से आंखें नहीं मूंद सकता।”
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि परिवार न्यायालय ने आदेश पारित करते समय कोई अनियमितता या अवैधता नहीं की है। यह स्पष्ट हो गया कि पति की शारीरिक अक्षमता, जो उसे कमाने से रोक रही है, पत्नी के पक्ष द्वारा पहुंचाई गई चोट का परिणाम है।
परिणामस्वरूप, न्यायालय ने पत्नी की पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: विनीता बनाम डॉ. वेद प्रकाश सिंह
- केस नंबर: क्रिमिनल रिविजन नंबर 8658 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति लक्ष्मी कांत शुक्ल

