इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (B.N.S.S.), 2023 के प्रावधानों का पालन न करने पर पुलिस की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने एक ऐसे मामले में दर्ज एफआईआर (FIR) की विवेचना पर रोक लगा दी है, जिसमें पुलिस ने उसी घटना के लिए पहले से दर्ज असंज्ञेय रिपोर्ट (NCR) के बावजूद, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना एफआईआर दर्ज कर ली थी।
न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने पंकज कुमार और अन्य द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला पुलिस द्वारा प्रक्रिया के उल्लंघन का प्रतीत होता है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ताओं ने लखनऊ के जानकीपुरम पुलिस स्टेशन में 17 दिसंबर, 2025 को दर्ज एफआईआर (केस क्राइम संख्या 0296/2025) को चुनौती दी थी। यह एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (B.N.S.), 2023 की धारा 115(2) (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 117(2) (स्वेच्छा से गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दर्ज की गई थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जिस घटना के लिए यह एफआईआर दर्ज की गई है, उसी घटना की शिकायत विपक्षी संख्या 3 (शिकायतकर्ता) ने पहले भी की थी। उस शिकायत पर पुलिस ने 22 अक्टूबर, 2025 को एक एनसीआर (Non-Cognizable Report) दर्ज की थी।
B.N.S.S. की धारा 174(2) का उल्लंघन
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता, देश दीपक सिंह और नंदिनी वर्मा ने कोर्ट के समक्ष तर्क दिया कि पुलिस अधिकारियों ने एनसीआर दर्ज होने के बाद एफआईआर दर्ज करके कानून का उल्लंघन किया है। उन्होंने विशेष रूप से भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 174(2) का हवाला दिया।
अधिवक्ताओं ने दलील दी कि कानून के अनुसार, जब किसी असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence) की सूचना पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को दी जाती है और उसे रिकॉर्ड कर लिया जाता है, तो उसके बाद कोई भी पुलिस अधिकारी उस मामले की विवेचना (investigation) तब तक नहीं कर सकता, जब तक कि उसे मजिस्ट्रेट का आदेश प्राप्त न हो।
चूंकि इस मामले में 22 अक्टूबर, 2025 को एनसीआर दर्ज की जा चुकी थी और मजिस्ट्रेट ने विवेचना का कोई आदेश नहीं दिया था, इसलिए पुलिस द्वारा बाद में उसी मामले में एफआईआर दर्ज करना और जांच शुरू करना अवैध है।
कोर्ट की टिप्पणी और निर्देश
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड का अवलोकन करने पर पाया कि विवादित एफआईआर उसी अपराध के लिए दर्ज की गई है जिसके लिए पहले एनसीआर दर्ज की जा चुकी थी।
खंडपीठ ने B.N.S.S. की धारा 174(2) का उल्लेख करते हुए कहा:
“B.N.S.S., 2023 की धारा 174(2) स्वयं यह प्रावधान करती है कि कोई भी पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी असंज्ञेय मामले की जांच नहीं करेगा।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले में मजिस्ट्रेट का कोई ऐसा आदेश मौजूद नहीं है जिसके तहत अधिकारियों को मामले की जांच करने की आवश्यकता हो। इसलिए, प्रथम दृष्टया विवादित एफआईआर दर्ज करने का कोई औचित्य नहीं बनता है।
प्रमुख सचिव (गृह) से हलफनामा तलब
मामले की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव (गृह), उत्तर प्रदेश सरकार को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने उनसे स्पष्टीकरण मांगा है कि:
- B.N.S.S., 2023 की धारा 174(2) के स्पष्ट प्रावधान के बावजूद, एनसीआर दर्ज होने के बाद एफआईआर कैसे दर्ज की गई?
- यदि यह एफआईआर संहिता के प्रावधानों के विरुद्ध पाई जाती है, तो उन अधिकारियों के खिलाफ “उदाहरणात्मक लागत” (exemplary cost) क्यों न लगाई जाए जिन्होंने यह एफआईआर दर्ज करने की कार्यवाही की?
कोर्ट ने एफआईआर पर रोक लगाते हुए प्रतिवादियों को जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दिया है।
केस विवरण:
केस का नाम: पंकज कुमार और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, द्वारा प्रमुख सचिव गृह, लखनऊ और अन्य
केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस रिट पिटीशन संख्या 28 ऑफ 2026
कोरम: न्यायमूर्ति अब्दुल मोइन और न्यायमूर्ति बबीता रानी
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता: देश दीपक सिंह, नंदिनी वर्मा
प्रतिवादियों के अधिवक्ता: जी.ए. (सरकारी अधिवक्ता)

