इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (CJM) और जिला मजिस्ट्रेट (DM) को ‘सिक्योरिटाइजेशन एंड रिकंस्ट्रक्शन ऑफ फाइनेंशियल एसेट्स एंड एनफोर्समेंट ऑफ सिक्योरिटी इंटरेस्ट एक्ट, 2002’ (सरफेसी एक्ट) की धारा 14 के तहत दायर आवेदनों का निस्तारण तेजी से करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन आवेदनों के लंबित रहने से अधिनियम का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने मेसर्स हिंदुजा हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड द्वारा दायर कई याचिकाओं को स्वीकार करते हुए यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि धारा 14 के तहत मजिस्ट्रेट की भूमिका पूरी तरह से प्रशासनिक और सहायक होती है, जिसका एकमात्र उद्देश्य सुरक्षित लेनदार (Secured Creditor) को संपत्ति पर कब्जा दिलाने में मदद करना है।
मामले की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट के समक्ष मेसर्स हिंदुजा हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड द्वारा दायर छह रिट याचिकाओं का एक समूह था। इनमें से पांच याचिकाओं (रिट सी संख्या 42608, 42610, 42622, 42645 और 42660 ऑफ 2025) में याचिकाकर्ता ने संबंधित मजिस्ट्रेटों द्वारा सरफेसी एक्ट की धारा 14 के तहत दायर आवेदनों को तय करने में हो रही प्रशासनिक देरी को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता कंपनी ने विभिन्न कर्जदारों को होम लोन दिया था, जिन्होंने अपनी संपत्तियों को गिरवी रखा था। भुगतान में चूक होने पर लोन खातों को एनपीए (NPA) घोषित कर दिया गया। इसके बाद धारा 13(2) के तहत डिमांड नोटिस जारी किए गए और धारा 13(4) के तहत सांकेतिक कब्जा ले लिया गया। हालांकि, जब याचिकाकर्ता ने वास्तविक भौतिक कब्जा प्राप्त करने के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गाजियाबाद के समक्ष आवेदन दायर किए, तो वे वैधानिक अवधि (30 से 60 दिन) बीत जाने के बाद भी लंबित रहे।
एक अन्य मामले (रिट सी संख्या 42639 ऑफ 2025) में, हालांकि 28 फरवरी 2025 को धारा 14 का आदेश पारित हो गया था और 6 अक्टूबर 2025 को कब्जा सौंप दिया गया था, लेकिन कर्जदारों ने कथित तौर पर उसी दिन सील तोड़कर संपत्ति में अनधिकृत प्रवेश (trespass) कर लिया। एफआईआर दर्ज कराने और मजिस्ट्रेट को सूचित करने के बावजूद, कब्जा वापस दिलाने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता श्री आशुतोष शर्मा, श्री नितेश कुमार जौहरी और श्री अजीत सिंह ने तर्क दिया कि कानून के तहत जिला मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह “अनिवार्य दायित्व” है कि वे धारा 14 के आवेदनों का निस्तारण निर्धारित समय सीमा के भीतर करें। उन्होंने कहा कि मजिस्ट्रेट की भूमिका प्रशासनिक है और “बार-बार स्थगन (adjournments), विशेष रूप से कर्जदारों के कहने पर, अस्वीकार्य है।”
इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता श्री प्रदीप्त कुमार शाही और स्थायी अधिवक्ता श्री मुकुल त्रिपाठी ने तर्क दिया कि देरी केवल अधिकारियों के कारण नहीं थी, बल्कि “प्रशासनिक आवश्यकताओं और अन्य मामलों के लंबित होने” के कारण हुई। उन्होंने कहा कि अचल संपत्ति के कब्जे को प्रभावित करने वाले आदेश पारित करने से पहले पर्याप्त अवसर दिया जाना आवश्यक है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सरफेसी एक्ट की धारा 14 एक पूर्ण तंत्र प्रदान करती है, जहां मजिस्ट्रेट का कार्य “वैधानिक आवश्यकताओं के तथ्यात्मक अनुपालन के सत्यापन तक सीमित” है। कोर्ट ने नोट किया कि विधायिका ने यह सुनिश्चित करने के लिए समय सीमा निर्धारित की है कि आवेदनों का निर्णय शीघ्रता से हो।
कोर्ट ने एनकेजीएसबी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम सुबीर चक्रवर्ती और अन्य (2022) के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि अधिनियम का उद्देश्य वित्तीय संस्थानों को प्रतिभूतियों का कब्जा लेने और उन्हें बेचने के लिए सशक्त बनाना है।
समय सीमा के मुद्दे पर, कोर्ट ने सी. ब्राइट बनाम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर और अन्य (2021) मामले का उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि हालांकि समय सीमा निर्देशात्मक (directory) है, लेकिन इसका उद्देश्य लेनदारों में विश्वास पैदा करना है कि मजिस्ट्रेट कब्जा दिलाने का प्रयास करेंगे।
खंडपीठ ने टिप्पणी की:
“जहां कोई कानून न केवल कर्तव्य बनाता है बल्कि उसके निर्वहन के लिए समय सीमा भी निर्धारित करता है, वहां यह दायित्व उच्च जिम्मेदारी का रूप ले लेता है। ऐसी परिस्थितियों में देरी कानून द्वारा निहित अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने में विफलता के समान है। धारा 14 के तहत आवेदनों का लंबे समय तक लंबित रहना सरफेसी एक्ट के उद्देश्य को कमजोर करता है।”
कोर्ट ने आगे कहा:
“धारा 14 के तहत मजिस्ट्रेट का कार्य न्यायनिर्णायक (adjudicatory) नहीं बल्कि कार्यकारी और सुविधाप्रदाता का है। विधायिका ने जानबूझकर यह सुनिश्चित किया है कि प्रवर्तन प्रक्रिया में बाधा न आए, और ऐसे मुद्दों को धारा 17 के तहत ऋण वसूली अधिकरण (DRT) के समक्ष चुनौती के लिए सुरक्षित रखा है।”
कोर्ट ने सलेम एडवोकेट बार एसोसिएशन (2) बनाम भारत संघ (2005) का हवाला देते हुए कहा कि स्थगन नियमित रूप से नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने यह भी चिंता जताई कि पूर्व के फैसले (इंडियन बैंक बनाम यूपी राज्य) में धारा 14 के आवेदनों का रजिस्टर बनाए रखने के निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है।
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया।
पांच याचिकाओं के संबंध में, कोर्ट ने संबंधित जिला मजिस्ट्रेट/मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को निर्देश दिया कि वे याचिकाकर्ता के लंबित आवेदनों (केस संख्या 3239, 3238, 3236, 3240, और 3237 ऑफ 2025) का निस्तारण कानून के अनुसार सख्ती से करें। कोर्ट ने कहा कि यह निर्णय “यथाशीघ्र और अधिमानतः इस आदेश की प्रति प्राप्त होने की तिथि से 30 दिनों के भीतर” किया जाना चाहिए।
रिट सी संख्या 42639 ऑफ 2025 के मामले में, जहां कब्जा लेने के बाद अतिक्रमण किया गया था, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्वतंत्रता दी कि वह सरफेसी एक्ट, 2002 की धारा 14 के तहत पहले से पारित आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए नए सिरे से आवेदन दायर करे।
मामले का विवरण:
- केस शीर्षक: मेसर्स हिंदुजा हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 3 अन्य (एवं संबद्ध मामले)
- केस संख्या: रिट-सी नंबर 42608 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी
- याचिकाकर्ता के वकील: आशुतोष शर्मा, नितेश कुमार जौहरी, अजीत सिंह
- प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी., प्रदीप्त कुमार शाही (अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता), मुकुल त्रिपाठी (स्थायी अधिवक्ता)

