इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि सेवानिवृत्ति लाभ (retiral benefits) सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों को दी जाने वाली कोई ‘बक्षीस’ या इनाम नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी की मूल्यवान संपत्ति और उसका कानूनी अधिकार है। हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम लिमिटेड के एक पूर्व कर्मचारी की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए, सेवानिवृत्ति देयों के भुगतान में हुई देरी के लिए 7% वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया है।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, मिश्री लाल, 9 जनवरी 1979 को उत्तर प्रदेश राज्य सेतु निगम लिमिटेड (‘निगम’) में सब-इंजीनियर के पद पर नियुक्त हुए थे। एक बेदाग करियर के बाद, वे 31 जुलाई 2007 को प्रोजेक्ट मैनेजर के पद से सेवानिवृत्त हुए। सेवानिवृत्ति के बाद, उनके देयों का भुगतान लगभग सात वर्षों तक नहीं किया गया और अंततः 2014 में भुगतान किया गया। याचिकाकर्ता ने भुगतान में हुई इस अत्यधिक देरी के लिए ब्याज और 1 जनवरी 2006 से छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के वास्तविक लाभ की मांग की थी। निगम के प्रबंध निदेशक द्वारा 2 मार्च 2016 को इन दावों को खारिज कर दिया गया था, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
पक्षों के तर्क
याचिकाकर्ता के वकील: याचिकाकर्ता के विद्वान अधिवक्ता ने तर्क दिया कि सेवानिवृत्ति देय 2014 में दिए गए, जबकि वे 2007 में ही इसके हकदार थे। सात साल की इस देरी के लिए वे ब्याज के हकदार हैं। साथ ही, उन्होंने दलील दी कि छठे वेतन आयोग का लाभ उन्हें इसके लागू होने की तिथि (1 जनवरी 2006) से मिलना चाहिए, न कि शासनादेश की तिथि (26 मार्च 2010) से। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम बलबीर सिंह टर्न’ (2018) के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि प्रशासनिक निर्देश वेतन संरचना के संबंध में कैबिनेट के फैसले को नहीं बदल सकते।
प्रतिवादी (निगम) के वकील: निगम की ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता ने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 के तहत निर्धारित ‘फॉर्म I’ जमा नहीं किया था। जैसे ही 2014 में सभी औपचारिकताएं पूरी हुईं, भुगतान कर दिया गया। छठे वेतन आयोग के संबंध में निगम ने कहा कि शासनादेश के अनुसार, कर्मचारियों को 2006 से केवल काल्पनिक (notional) लाभ मिलना था और वास्तविक आर्थिक लाभ शासनादेश की तिथि से ही देय था।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने मामले के दो प्रमुख बिंदुओं पर विचार किया। ग्रेच्युटी के मुद्दे पर, उन्होंने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की धारा 7 का विश्लेषण किया। जस्टिस श्री प्रकाश सिंह ने स्पष्ट किया कि धारा 7(2) के तहत यह नियोक्ता (employer) का अनिवार्य दायित्व है कि वह ग्रेच्युटी की राशि निर्धारित करे और कर्मचारी को लिखित नोटिस दे, भले ही कर्मचारी ने इसके लिए आवेदन किया हो या नहीं। कोर्ट ने पाया कि निगम ने इस वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
सेवानिवृत्ति लाभों की प्रकृति पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“यह कानून का स्थापित सिद्धांत है कि सेवानिवृत्ति लाभ सरकार द्वारा अपने कर्मचारियों को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद वितरित किया जाने वाला कोई इनाम (bounty) नहीं है, बल्कि ये सेवानिवृत्त कर्मचारियों के हाथों में मूल्यवान अधिकार और संपत्ति हैं। वास्तव में, सेवानिवृत्ति देयों का भुगतान न करना सेवानिवृत्त कर्मचारी का उत्पीड़न है… यदि इन देयों का भुगतान अत्यधिक देरी से किया जाता है, तो क्षतिपूर्ति के रूप में उचित ब्याज उस पीड़ित कर्मचारी को सांत्वना देने के उद्देश्य को पूरा करेगा।”
सुप्रीम कोर्ट के ‘केरल राज्य बनाम एम. पद्मनाभन नायर’ (1985) और ‘डी.डी. तिवारी बनाम उत्तर हरियाणा बिजली वितरण निगम लिमिटेड’ (2014) के फैसलों का संदर्भ देते हुए माननीय न्यायमूर्ति श्री प्रकाश सिंह ने दोहराया कि भुगतान में किसी भी दोषपूर्ण देरी पर ब्याज का दंड लगाया जाना चाहिए।
छठे वेतन आयोग के लाभ पर कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने 2010 के शासनादेश को चुनौती नहीं दी थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि चूंकि वह शासनादेश अब भी प्रभावी है और उसे किसी अदालत ने रद्द नहीं किया है, इसलिए याचिकाकर्ता 2006 से वास्तविक बकाया (arrears) पाने के हकदार नहीं हैं।
न्यायालय का निर्णय
हाईकोर्ट ने रिट याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया। अदालत ने 2 मार्च 2016 के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके तहत ब्याज देने से मना किया गया था।
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया जाता है कि वे याचिकाकर्ता को ग्रेच्युटी और अवकाश नकदीकरण के विलंबित भुगतान पर 7% वार्षिक ब्याज का भुगतान करें।
- यह भुगतान आदेश की तिथि से आठ सप्ताह की अवधि के भीतर किया जाना चाहिए।
- छठे वेतन आयोग के वास्तविक लाभ को 1 जनवरी 2006 से देने की मांग को खारिज कर दिया गया।
केस शीर्षक: मिश्री लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रमुख सचिव पीडब्ल्यूडी एवं अन्य
केस संख्या: रिट ए संख्या – 9735 वर्ष 2016

