एक महत्वपूर्ण फैसले में, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक सहायक अध्यापिका को बड़ी राहत दी है, जिनकी नियुक्ति को 7 साल की सेवा के बाद इस आधार पर रद्द कर दिया गया था कि नियुक्ति के समय उनकी आयु निर्धारित सीमा से अधिक थी। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि यद्यपि आयु सीमा के लिहाज से नियुक्ति त्रुटिपूर्ण थी, लेकिन अपीलकर्ता ने कोई धोखाधड़ी नहीं की थी और विभाग ने स्वयं उनका आवेदन स्वीकार किया था, इसलिए लंबी सेवा अवधि के बाद उन्हें हटाया जाना उचित नहीं है।
कोर्ट ने एकल न्यायाधीश (Single Judge) के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें अध्यापिका की बर्खास्तगी को सही ठहराया गया था।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता अनीता रानी ने जून 2012 में स्पेशल बीटीसी (BTC) कोर्स पूरा किया और मई 2014 में यूपी टीईटी (TET) पास किया। उत्तर प्रदेश सरकार ने 9 दिसंबर 2014 को 15,000 सहायक अध्यापकों की भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की, जिसके बाद अपीलकर्ता ने 5 जनवरी 2015 को आवेदन किया।
आवेदन के समय अपीलकर्ता की आयु 48 वर्ष, 8 महीने और 4 दिन थी, जो कि आरक्षित श्रेणी के लिए निर्धारित आयु सीमा (छूट के बाद भी) से अधिक थी। इसके बावजूद, उनका आवेदन स्वीकार कर लिया गया और 2 जुलाई 2016 को उन्हें सहायक अध्यापक के पद पर नियुक्ति मिल गई। उस समय उनकी आयु 50 वर्ष से अधिक हो चुकी थी।
नियुक्ति के लगभग डेढ़ साल बाद, 2017 में उन्हें एक नोटिस जारी कर पूछा गया कि अधिक आयु होने के कारण उनकी नियुक्ति क्यों न रद्द कर दी जाए। अंततः 28 अक्टूबर 2023 को जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी, मुरादाबाद ने उनकी नियुक्ति को ‘void-ab-initio’ (प्रारंभ से ही शून्य) घोषित कर सेवा समाप्त कर दी। इसके खिलाफ एकल पीठ में दायर याचिका 8 मई 2025 को खारिज हो गई थी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अशोक खरे ने तर्क दिया कि यद्यपि अपीलकर्ता की आयु अधिक थी, लेकिन उन्होंने आवेदन पत्र में अपनी जन्मतिथि सही-सही भरी थी। उन्होंने कोई तथ्य नहीं छिपाया और न ही कोई धोखाधड़ी की। उनका कहना था कि आवेदन स्वीकार करना और नियुक्ति पत्र जारी करना अधिकारियों का काम था।
वकील ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (राधेश्याम यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और विकास प्रताप सिंह बनाम छत्तीसगढ़ राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि अपीलकर्ता ने 7 साल तक सेवा की है, और बिना किसी धोखाधड़ी के हुई नियुक्ति को इतनी देरी से रद्द नहीं किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा अधिकारी के वकीलों ने तर्क दिया कि यूपी बेसिक शिक्षा (अध्यापक) सेवा नियमावली, 1981 के तहत अपीलकर्ता स्पष्ट रूप से अपात्र थीं। उन्होंने कहा कि प्रशिक्षण पूरा करते समय ही वे 46 वर्ष से अधिक की थीं और नियुक्ति के समय 50 वर्ष की, जो नियमों का उल्लंघन है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
खंडपीठ ने स्वीकार किया कि नियमों के अनुसार अपीलकर्ता ‘ओवर-एज’ (अधिक उम्र) थीं। हालांकि, कोर्ट ने न्याय और साम्यता (Equity) के सिद्धांत पर जोर दिया।
कोर्ट ने अधिकारियों की लापरवाही पर टिप्पणी करते हुए कहा:
“यह दिन के उजाले की तरह स्पष्ट है कि प्रतिवादी अधिकारियों ने खुली आंखों से आवेदन पत्र स्वीकार किया और नियुक्ति प्रदान की।”
कोर्ट ने आगे कहा कि नौकरी पाने के लिए आवेदन करना कोई धोखाधड़ी नहीं है, खासकर जब उम्मीदवार ने अपनी सही जन्मतिथि बताई हो। यह अधिकारियों की जिम्मेदारी थी कि वे सतर्क रहें, जिसमें वे पूरी तरह विफल रहे।
सुप्रीम कोर्ट के विकास प्रताप सिंह (2013) मामले का उल्लेख करते हुए, हाईकोर्ट ने कहा कि जहां नियुक्ति गलत या अनियमित हो लेकिन उम्मीदवार की ओर से कोई गलती न हो, वहां उम्मीदवार की लंबी सेवा अवधि और ईमानदारी (bonafide) को देखते हुए सहानुभूतिपूर्वक विचार किया जाता है।
कोर्ट ने कहा:
“अपीलकर्ता-याची की 7 वर्षों की निरंतर सेवा और इस तथ्य को देखते हुए कि प्रतिवादी अधिकारी नियुक्ति पाने के लिए याची द्वारा किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी या हेराफेरी का आधार नहीं रख सके… एकल न्यायाधीश का ध्यान इस पहलू पर नहीं गया।”
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकल न्यायाधीश के 8 मई 2025 के आदेश और बेसिक शिक्षा अधिकारी, मुरादाबाद के 28 अक्टूबर 2023 के बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने संतुलन बनाते हुए निर्देश दिया:
“हम निर्देश देते हैं कि अपीलकर्ता को प्रश्नगत पद पर बने रहने की अनुमति दी जाएगी, लेकिन वह उस अवधि के वेतन की हकदार नहीं होंगी जब उन्होंने अपने कर्तव्यों का पालन नहीं किया/सेवा से बाहर रहीं।”
अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया गया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: अनीता रानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
- केस नंबर: स्पेशल अपील संख्या 646 ऑफ 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल
- अपीलकर्ता के वकील: सिद्धार्थ खरे (वरिष्ठ अधिवक्ता), उमंग श्रीवास्तव
- प्रतिवादियों के वकील: आकांक्षा शर्मा (सी.एस.सी.), अंकित गौर (स्थायी अधिवक्ता)

