इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने प्रांतीय सशस्त्र पुलिस (पीएसी) के एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने (Removal from Service) के आदेश को रद्द कर दिया है। उक्त कांस्टेबल को वर्ष 2000 में 160 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति के आरोप में सेवा से हटा दिया गया था। न्यायालय ने इस दंड को असंगत और अत्यधिक कठोर माना, क्योंकि याचिकाकर्ता ने विभाग में 36 वर्षों तक सेवा दी थी और वह सेवानिवृत्ति की आयु भी प्राप्त कर चुका था।
न्यायालय के समक्ष मुख्य कानूनी प्रश्न यह था कि क्या अनधिकृत अनुपस्थिति के लिए सेवा से हटाने का दंड उचित था और क्या अनुशासनात्मक जांच में प्रक्रियात्मक खामियां थीं। न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की पीठ ने रमेश चंद्र सिंह द्वारा दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए 14 अप्रैल, 2000 के निष्कासन आदेश और उसके बाद के अपीलीय व पुनरीक्षण आदेशों को रद्द कर दिया। न्यायालय ने मामले को अनुशासनात्मक प्राधिकारी के पास वापस भेज दिया ताकि कम दंड पर विचार किया जा सके।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता, 25वीं बटालियन, पीएसी, रायबरेली में कांस्टेबल के पद पर तैनात था। वह 12 मई, 1999 को दो दिनों के आकस्मिक अवकाश पर गया था। उसे 15 मई, 1999 को ड्यूटी पर वापस रिपोर्ट करना था, लेकिन वह 20 अक्टूबर, 1999 तक अनुपस्थित रहा, जिसके परिणामस्वरूप कुल 160 दिनों की अनधिकृत अनुपस्थिति हुई।
इसके बाद 5 जनवरी, 2000 को आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच शुरू की गई। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि बीमारी और आंधी-तूफान में मकान गिर जाने के कारण वह समय पर वापस नहीं आ सका। जांच अधिकारी ने गवाहों का परीक्षण किया और याचिकाकर्ता के बचाव को खारिज कर दिया। जांच अधिकारी ने बीमारी और मकान गिरने के दावों में विरोधाभास पाया।
नतीजतन, अनुशासनात्मक प्राधिकारी ने 14 अप्रैल, 2000 को याचिकाकर्ता को सेवा से हटाने का आदेश पारित किया। अनुपस्थिति की अवधि के वेतन को जब्त करने का एक अलग आदेश भी पारित किया गया। याचिकाकर्ता ने इन आदेशों को यूपी लोक सेवा अधिकरण और बाद में हाईकोर्ट में चुनौती दी। गौरतलब है कि हाईकोर्ट ने 15 अक्टूबर, 2004 को निष्कासन आदेश पर रोक लगा दी थी, जिसके बाद नवंबर 2005 में याचिकाकर्ता को बहाल कर दिया गया और उसने 31 जुलाई, 2024 को अपनी सेवानिवृत्ति तक सेवा जारी रखी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एच.जी.एस. परिहार और अजय कृष्ण यादव ने तर्क दिया कि दिया गया दंड मनमाना और अत्यधिक था। उन्होंने कहा कि जांच अधिकारी ने याचिकाकर्ता की बीमारी को साबित करने वाले चिकित्सा प्रमाण पत्रों पर विचार नहीं किया। यह भी दलील दी गई कि जांच अधिकारी ने अपनी जांच रिपोर्ट में ही सेवा से हटाने की सिफारिश कर दी थी, जो उनके अधिकार क्षेत्र से बाहर था। अधिवक्ताओं ने “दोहरे खतरे” (Double Jeopardy) का भी मुद्दा उठाया, यह कहते हुए कि याचिकाकर्ता को एक ही कदाचार के लिए दो बार दंडित किया गया—एक बार वेतन जब्त करके और दूसरी बार सेवा से हटाकर।
राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता “आदतन अनुपस्थित” रहने वाला कर्मचारी था और पहले भी 10 बार अनधिकृत रूप से अनुपस्थित रह चुका था। राज्य ने तर्क दिया कि बीमारी का बहाना बाद में गढ़ा गया था, क्योंकि छुट्टी बढ़ाने के शुरुआती आवेदन में केवल मकान गिरने का उल्लेख था।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल ने सबसे पहले वैकल्पिक उपचार की उपलब्धता के संबंध में आपत्ति को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मेसर्स उत्कल हाईवे मामले का हवाला देते हुए, कोर्ट ने कहा कि 21 साल तक लंबित रहने के बाद वैकल्पिक उपचार के आधार पर याचिका खारिज करना न्यायोचित नहीं होगा।
अनधिकृत अनुपस्थिति के मुद्दे पर, कोर्ट ने चेन्नई मेट्रोपोलिटन वाटर सप्लाई बनाम टी.टी. मुरली बाबू मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का संदर्भ दिया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि बीमारी जैसी मजबूरियों के कारण अनुपस्थिति हमेशा जानबूझकर नहीं होती, लेकिन लंबी अनुपस्थिति के मामलों में अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा “जानबूझकर अनुपस्थिति” का अलग से निष्कर्ष निकालना हमेशा अनिवार्य नहीं होता। कोर्ट ने चिकित्सा प्रमाण पत्रों को अविश्वसनीय मानने के जांच अधिकारी के निष्कर्ष को सही ठहराया।
हालाँकि, कोर्ट ने जांच अधिकारी की रिपोर्ट में एक प्रक्रियात्मक त्रुटि पाई। कोर्ट ने नोट किया कि यूपी पुलिस सबऑर्डिनेट रैंक्स (दंड और अपील) नियमावली, 1991 के परिशिष्ट-I के तहत, जांच अधिकारी दंड के संबंध में अपनी सिफारिश कार्यवाही से “अलग” (Separately) कर सकता है। कोर्ट ने कहा:
“उक्त प्रावधान स्वयं इंगित करता है कि शब्द ‘अलग’ का अर्थ है कि सिफारिश विशिष्ट रूप से/अलग से की जानी चाहिए, लेकिन वर्तमान मामले में, सिफारिश अलग से नहीं की गई है, बल्कि जांच रिपोर्ट के साथ ही की गई है… यदि सिफारिश संयुक्त है, तो वह दोषपूर्ण है।”
याचिकाकर्ता के पिछले आचरण के संदर्भ में, कोर्ट ने पंजाब राज्य बनाम पूर्व सी. सतपाल सिंह मामले का हवाला देते हुए कहा कि पिछले आचरण का केवल उल्लेख आदेश को दूषित नहीं करता, यदि वह दंड का एकमात्र आधार न हो।
अंततः, कोर्ट ने दंड की असंगतता (Proportionality) पर ध्यान केंद्रित किया। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता ने 36 वर्षों तक सेवा की है (निष्कासन से पहले 16 वर्ष और बहाली के बाद 20 वर्ष), 2016 में उसे हेड कांस्टेबल के रूप में पदोन्नत किया गया था, और अब वह सेवानिवृत्त हो चुका है। कोर्ट ने अलेक्जेंडर पाल सिंह मामले का हवाला देते हुए इस दंड को “अत्यधिक असंगत” माना।
निर्णय
हाईकोर्ट ने सेवा से हटाने के आदेश, अपीलीय आदेश और पुनरीक्षण आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अनुशासनात्मक प्राधिकारी को निर्देश दिया कि:
- बर्खास्तगी या सेवा से हटाने (Dismissal or Removal) के अलावा किसी अन्य दंड पर विचार करें।
- अनधिकृत अनुपस्थिति की अवधि के वेतन के संबंध में एक नया आदेश पारित करें।
- नए आदेश के एक महीने के भीतर सभी सेवानिवृत्ति देयकों की पुनर्गणना करें और उनका भुगतान करें।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“यह न्यायालय इस बात को ध्यान में रखता है कि याचिकाकर्ता सेवानिवृत्ति की आयु तक पहुंच चुका है और उसने विभाग की 36 वर्षों तक सेवा की है… इस मामले के तथ्यों में सेवा से हटाने का आदेश अस्वीकृत किया जाता है।”
केस विवरण:
- केस टाइटल: रमेश चंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: रिट-ए नंबर 6218 ऑफ 2004
- कोरम: न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल
- याचिकाकर्ता के वकील: एच.जी.एस. परिहार, अजय कृष्ण यादव, अनिल कुमार मौर्य, मंशा शुक्ला, मीनाक्षी सिंह, मीनाक्षी सिंह परिहार, विवेक मिश्रा
- प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी.

