एनडीपीएस एक्ट की धारा 50 का पालन न होने से बरामदगी अवैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 साल पुराने ड्रग मामले में सजा रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मादक पदार्थ निरोधक कानून (NDPS Act) के तहत एक आरोपी की सजा और दस साल के कारावास को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि बरामदगी के दौरान अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का “घोर उल्लंघन” किया गया। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि नारकोटिक्स विभाग द्वारा एनडीपीएस अधिनियम की धारा 50 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन न करना पूरी तलाशी और जब्ती की कार्यवाही को दूषित करता है।

अदालत ने विनय कुमार शर्मा द्वारा दायर अपील को स्वीकार करते हुए उन्हें तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया। विनय कुमार शर्मा अप्रैल 2025 से जेल में थे, क्योंकि लंबे समय तक फरार रहने के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला 14 नवंबर 1994 का है, जब नारकोटिक्स विभाग की एक टीम ने मुखबिर की सूचना पर विनय कुमार शर्मा को लखनऊ के कैसरबाग बस स्टेशन पर रोका था। तलाशी के दौरान उनके पास से 250 ग्राम हेरोइन बरामद होने का दावा किया गया था। मई 1998 में, लखनऊ की विशेष अदालत (नौंवे अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश) ने उन्हें एनडीपीएस एक्ट की धारा 8/21 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 साल के कठोर कारावास और 1 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता के वकील श्री रिशाद मुर्तजा ने तर्क दिया कि धारा 50 के तहत दी गई नोटिस दोषपूर्ण थी। उनका कहना था कि आरोपी को यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया कि उसके पास किसी राजपत्रित अधिकारी (Gazetted Officer) या मजिस्ट्रेट के समक्ष तलाशी लेने का कानूनी अधिकार है। इसके अलावा, व्यस्त सार्वजनिक स्थान होने के बावजूद किसी स्वतंत्र गवाह को बरामदगी की प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार (नारकोटिक्स विभाग) की ओर से श्री राकेश कुमार अवस्थी ने दलील दी कि बरामदगी वास्तविक थी और प्रक्रियाओं का पर्याप्त रूप से पालन किया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि आरोपी ने विभागीय टीम द्वारा तलाशी के लिए अपनी सहमति दी थी और भारी मात्रा में हेरोइन की बरामदगी सजा के लिए पर्याप्त आधार है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने धारा 50 के तहत “सूचित अधिकार” (Communicated Right) पर विशेष ध्यान दिया। न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने पाया कि आरोपी को दी गई नोटिस (प्रदर्श का-1) में केवल यह पूछा गया था कि क्या वह विभागीय टीम से तलाशी कराना चाहता है या किसी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट को “बुलाना” चाहता है।

हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा:

“तलाशी बहुत ही लापरवाही के साथ की गई… यह अच्छी तरह से स्थापित है कि यदि किसी व्यक्ति को उसके इस अधिकार के बारे में सूचित नहीं किया जाता है कि उसकी तलाशी किसी राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष की जा सकती है, तो ऐसी तलाशी अमान्य हो जाएगी।”

सुप्रीम कोर्ट के ‘स्टेट ऑफ पंजाब बनाम बलदेव सिंह’ मामले का संदर्भ देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 50 का पालन अनिवार्य है। अदालत ने यह भी पाया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी को उसके इस “निर्विवाद अधिकार” के बारे में पूरी जानकारी दी गई थी।

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स्वतंत्र गवाहों की कमी पर हाईकोर्ट ने कहा:

“अभियोजन पक्ष ने स्वयं स्वीकार किया है कि घटना स्थल कैसरबाग बस स्टेशन है जो एक बहुत भीड़भाड़ वाला स्थान है, लेकिन किसी भी स्वतंत्र गवाह को शामिल नहीं किया गया… यह अभियोजन की कहानी पर संदेह पैदा करता है।”

इसके अलावा, अदालत ने ‘फॉर्म-एफ’ (सैंपल भेजने के लिए इस्तेमाल होने वाला दस्तावेज) और नमूनों पर लगी सील के संबंध में भी विसंगतियां पाईं, जिससे साक्ष्यों की कड़ी टूट गई।

अदालत का निर्णय

न्यायमूर्ति बृज राज सिंह ने अपने फैसले में कहा कि निचली अदालत साक्ष्यों और कानूनी पहलुओं को समझने में चूक गई है। हाईकोर्ट ने माना कि तलाशी और सैंपलिंग की प्रक्रिया अविश्वसनीय थी और धारा 50 के उल्लंघन के कारण दोषसिद्धि बरकरार नहीं रखी जा सकती। हाईकोर्ट ने निचली अदालत को तत्काल रिहाई आदेश जारी करने का निर्देश दिया।

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केस विवरण (Case Details)

  • केस का शीर्षक: विनय कुमार शर्मा बनाम भारत संघ (Vinai Kumar Sharma vs. Union of India)
  • केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 435 सन 1998
  • न्यायाधीश: न्यायमूर्ति बृज राज सिंह
  • अपीलकर्ता के वकील: रिशाद मुर्तज़ा, ए. ज़ैदी, कुँवर सुशांत प्रकाश, मो. आरिफ खान, प्रिंस लेनिन
  • प्रत्यर्थी के वकील: राकेश कुमार अवस्थी, एस.एम. सिंह रोयेकवार
  • अदालती सहायता: रिसर्च एसोसिएट श्री अंकुर गर्ग

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