जमाकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि बैंक एफडीआर (FDR) जारी होने के बाद अपने आंतरिक सर्कुलर या दिशानिर्देशों का पूर्वव्यापी प्रभाव (retrospectively) से हवाला देकर ब्याज दरों में एकतरफा कटौती नहीं कर सकता है।
न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक निश्चित ब्याज दर के साथ एफडीआर जारी करना एक बाध्यकारी संविदात्मक दायित्व (binding contractual obligation) है। कोर्ट ने कहा कि ‘वचन विबंध के सिद्धांत’ (Doctrine of Promissory Estoppel) के तहत बैंक जमाकर्ता के नुकसान के लिए शर्तों को बाद में बदल नहीं सकता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह फैसला नेम कुमार जैन और अन्य बनाम भारत संघ और 2 अन्य (रिट-सी संख्या 21627 वर्ष 2023) और इससे जुड़े एक अन्य मामले में आया है। याचिकाकर्ता ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स (अब पंजाब नेशनल बैंक में विलय) के एक सेवानिवृत्त कर्मचारी स्वर्गीय पी.के. जैन के परिवार के सदस्य हैं। उन्होंने वर्ष 2011 और 2012 में कई फिक्स्ड डिपॉजिट (FDR) बनवाए थे। ये एफडीआर 10 साल की परिपक्वता अवधि (maturity period) के साथ 10.75% और 10.25% प्रति वर्ष की ब्याज दरों पर जारी किए गए थे।
वर्ष 2020 में ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स का पंजाब नेशनल बैंक में विलय होने के बाद, प्रतिवादी बैंक ने इन एफडीआर पर ब्याज दरों को एकतरफा घटाकर क्रमशः 9.25% और 8.25% कर दिया। बैंक ने 3 जुलाई 2014 के एक सर्कुलर और आरबीआई के दिशानिर्देशों का हवाला देते हुए दावा किया कि कर्मचारियों/सेवानिवृत्त कर्मचारियों के लिए अतिरिक्त ब्याज का लाभ केवल तभी उपलब्ध है जब कर्मचारी संयुक्त खाते में “प्रमुख खाता धारक” (Principal Account Holder) हो। चूँकि याचिकाकर्ताओं की एफडीआर (जो 2014 से पहले बनी थीं) इस मानदंड को पूरा नहीं करती थीं, इसलिए बैंक ने ब्याज दरें कम कर दीं।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से: याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि ब्याज दर में कमी अनुबंध कानून के स्थापित सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि एफडीआर एक बाध्यकारी अनुबंध है और उन्हें रसीदों में स्पष्ट रूप से निर्धारित दर पर परिपक्वता राशि प्राप्त करने की ‘वैध अपेक्षा’ (Legitimate Expectation) थी। याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि बैंक द्वारा उद्धृत सर्कुलर को पूर्वव्यापी रूप से लागू नहीं किया जा सकता। उन्होंने हाईकोर्ट की एक समन्वय पीठ के फैसले श्रीमती सरोजिनी जैन और अन्य बनाम भारत संघ (2023) का भी हवाला दिया, जिसमें याचिकाकर्ता की बहन के समान दावों को स्वीकार किया गया था।
प्रतिवादी बैंक की ओर से: बैंक ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने आरबीआई सर्कुलर के तहत अनिवार्य उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना एफडीआर प्राप्त की थी। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता संख्या 1 के पिता 2002 में सेवानिवृत्त हुए थे और 2016 में उनकी मृत्यु हो गई थी, और याचिकाकर्ता उन पर निर्भर नहीं थे। बैंक ने 1 जुलाई 2009 के मास्टर सर्कुलर और 2 कोर्ट ने माना कि यह बैंक के अधिकारियों की गलती हो सकती है कि उन्होंने उच्च ब्याज दर की पेशकश की, लेकिन इसके लिए जमाकर्ताओं को वर्षों बाद दंडित नहीं किया जा सकता।014 के आंतरिक सर्कुलर का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें दिशानिर्देशों के अनुसार ब्याज दर को “सुधारने” का अधिकार है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
कोर्ट ने बैंक की दलीलों को खारिज कर दिया और जोर देकर कहा कि जिन सर्कुलर का हवाला दिया गया है, वे अतिरिक्त ब्याज देने के संबंध में “सक्षम करने वाले” (enabling nature) हैं, लेकिन वे बैंक को मौजूदा अनुबंधों पर दरों को पूर्वव्यापी रूप से कम करने का अधिकार नहीं देते हैं।
1. अनुबंधित दरों की बाध्यकारी प्रकृति कोर्ट ने “मास्टर डायरेक्शन – रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (इंटरेस्ट रेट ऑन डिपॉजिट्स) डायरेक्शंस, 2016” के अध्याय II का विश्लेषण किया, जो यह अनिवार्य करता है कि देय ब्याज दरें अग्रिम रूप से घोषित अनुसूची के अनुसार सख्ती से होनी चाहिए और “जमाकर्ताओं और बैंक के बीच बातचीत का विषय नहीं होंगी।”
खंडपीठ ने कहा:
“ये प्रावधान सामूहिक रूप से इस सिद्धांत को स्थापित करते हैं कि एक बार एफडीआर जारी करते समय ब्याज दर का उल्लेख कर दिया जाता है, तो जमाकर्ता के अहित के लिए इसे एकतरफा नहीं बदला जा सकता है।”
2. आरबीआई सर्कुलर का दायरा बैंक द्वारा 2009 और 2014 के सर्कुलर पर निर्भरता के संबंध में, कोर्ट ने नोट किया कि हालांकि ये दस्तावेज कर्मचारियों को विवेकाधीन अतिरिक्त ब्याज देने को विनियमित करते हैं, लेकिन इनमें ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो जारी की गई एफडीआर में पहले से उल्लिखित दर को कम करने की अनुमति देता हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया:
“सर्कुलर में कहीं भी यह अधिकार नहीं दिया गया है या विचार नहीं किया गया है कि मौजूदा एफडीआर पर अनुबंधित ब्याज दर को कम किया जा सकता है। इसलिए, हालांकि सर्कुलर जमाकर्ताओं की कुछ श्रेणियों को अतिरिक्त ब्याज के विवेकाधीन अनुदान को विनियमित करता है, यह किसी भी तरह से बैंक को एफडीआर में पहले से सहमत और स्पष्ट रूप से उल्लिखित ब्याज दर को एकतरफा संशोधित या कम करने का अधिकार नहीं देता है।”
3. वचन विबंध (Promissory Estoppel) और वैध अपेक्षा कोर्ट ने ‘वैध अपेक्षा’ और ‘वचन विबंध’ के सिद्धांतों को लागू किया। नवज्योति को-ऑप ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी बनाम भारत संघ और भारत संघ बनाम हिंदुस्तान डेवलपमेंट कॉरपोरेशन में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि बैंक अपने वादे से बंधा हुआ है।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“अनुबंध के दायरे में, वचन विबंध का सिद्धांत पूरी तरह से लागू होता है। एक बार जब यह पाया जाता है कि लाभार्थी ने कोई गलत बयानी नहीं की है… और बैंक ने ब्याज की एक विशेष दर का वादा किया है जिस पर निवेशक ने एफडीआर बनाकर पैसा निवेश करने की सहमति दी है, तो बैंक बाद में परिपक्वता पर सहमत/वादे की गई ब्याज दर देने से इनकार नहीं कर सकता।”
4. जमाकर्ता की कोई गलती नहीं कोर्ट ने पहले के श्रीमती सरोजिनी जैन के फैसले के तर्क की पुष्टि करते हुए नोट किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा धोखाधड़ी या गलत बयानी का कोई आरोप नहीं था। भले ही उच्च दर की पेशकश करने में बैंक अधिकारियों की ओर से कोई चूक हुई हो, जमाकर्ताओं को वर्षों बाद दंडित नहीं किया जा सकता है।
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए माना कि ब्याज दरों में कमी “न तो कानून द्वारा अधिकृत थी और न ही किसी नियामक या सर्कुलर प्रावधानों द्वारा समर्थित थी।”
कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:
- प्रतिवादी बैंक को निर्देश दिया जाता है कि वह याचिकाकर्ताओं की एफडीआर पर मूल रूप से अनुबंधित दरों (10.75% और 10.25% जैसा भी लागू हो) पर ब्याज की गणना करे और भुगतान करे।
- यदि अंतरिम अवधि में कोई कटौती की गई है, तो उसका भुगतान याचिकाकर्ताओं को लागू एफडीआर दर पर ब्याज सहित किया जाना चाहिए।
- यह भुगतान संबंधित परिपक्वता तिथियों से लागू होगा।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: नेम कुमार जैन और अन्य बनाम भारत संघ और 2 अन्य
- केस संख्या: रिट-सी संख्या 21627 वर्ष 2023 (Writ-C No. 21627 of 2023)
- पीठ: न्यायमूर्ति अजीत कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी

