इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महिला को घर से निकालने पर जज के खिलाफ जांच के आदेश दिए; कोर्ट कर्मचारी पर 1 लाख रुपये का जुर्माना

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस और राजस्व अधिकारियों द्वारा एक महिला को उसके पैतृक घर से जबरन बेदखल करने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस अरुण कुमार की खंडपीठ ने अधिकारियों की इस कार्रवाई को “कानून की प्रक्रिया और राज्य की प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग” करार दिया है।

कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन), बांसी, सिद्धार्थ नगर के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच शुरू करने के लिए मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास भेजा है। पीठ ने कहा कि जज ने “अनुचित जल्दबाजी” और “भौतिक अनियमितता” (Material Irregularity) के साथ कार्य किया। इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने अवैध बेदखली और याचिकाकर्ता व उसके नाबालिग बच्चों को हुई मानसिक प्रताड़ना के लिए प्रतिवादी संख्या 8 (एक कोर्ट कर्मचारी) पर 1,00,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता श्रीमती सोनी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए बताया कि वह जिला सिद्धार्थ नगर में अपने पैतृक घर में अपने तीन नाबालिग बच्चों के साथ रहती थीं और वहां एक दुकान में ब्यूटी पार्लर चलाती थीं। यह संपत्ति मूल रूप से उनके ससुर गेल्हई की थी और उनकी मृत्यु के बाद यह उनके वारिसों, जिनमें याचिकाकर्ता के पति भी शामिल थे, के पास आ गई। संपत्ति का अभी तक कोई बंटवारा नहीं हुआ था।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी संख्या 8, संदीप गुप्ता, जो जिला न्यायालय स्थापना में एक क्लर्क है, ने याचिकाकर्ता के पति और उनके भाई (जो कथित तौर पर शराब के नशे में थे) से अविभाजित घर के एक विशिष्ट हिस्से का बैनामा (Sale Deed) अपने पक्ष में करवा लिया।

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27 जनवरी, 2025 को प्रतिवादी संख्या 8 ने स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) की मांग करते हुए मूल वाद संख्या 49/2025 दायर किया और उसी दिन एकपक्षीय अंतरिम निषेधाज्ञा (Ex-parte Interim Injunction) प्राप्त कर ली। इसके बाद, बेदखली का आरोप लगाते हुए, उसने 5 फरवरी, 2025 को सीपीसी की धारा 151 के तहत एक आवेदन दायर किया। ट्रायल कोर्ट ने उसी दिन इस आवेदन को स्वीकार कर लिया और पुलिस को पहले की निषेधाज्ञा का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।

इन आदेशों का सहारा लेते हुए, राजस्व और पुलिस अधिकारियों की एक संयुक्त टीम ने 18 जुलाई, 2025 को याचिकाकर्ता और उनके बच्चों को घर से जबरन बाहर निकाल दिया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि प्रशासनिक अधिकारियों के पास अस्थायी निषेधाज्ञा के आधार पर कब्जा दिलाने के लिए टीम गठित करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं था। यह भी कहा गया कि प्रतिवादी संख्या 8 कभी भी अविभाजित संपत्ति के वास्तविक भौतिक कब्जे में नहीं था। याचिकाकर्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने बिना किसी नोटिस या जांच के धारा 151 के आवेदन को स्वीकार करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है।

इसके विपरीत, प्रतिवादी संख्या 8 ने दावा किया कि उसे बैनामे के समय ही कब्जा मिल गया था। उसने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने दो बार ताले तोड़े और कोर्ट के आदेश का उल्लंघन किया। उसने अपने कब्जे की बहाली को सही ठहराने के लिए ट्रायल कोर्ट के 5 फरवरी, 2025 के आदेश और बाद के प्रशासनिक आदेशों का हवाला दिया।

कोर्ट की टिप्पणियां और विश्लेषण

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के आचरण पर गहरी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने नोट किया कि ट्रायल कोर्ट ने सीपीसी के आदेश 39 नियम 3 के अनिवार्य प्रावधानों का अनुपालन सुनिश्चित किए बिना ही एकपक्षीय निषेधाज्ञा प्रदान की थी।

5 फरवरी, 2025 के आदेश के संबंध में, हाईकोर्ट ने कहा:

“ट्रायल कोर्ट ने उसी दिन आवेदन पर विचार किया और उसे एकपक्षीय रूप से स्वीकार कर लिया। जिस अनुचित जल्दबाजी (Undue Haste) के साथ आवेदन पर विचार किया गया और आदेश दिया गया, वह ट्रायल कोर्ट द्वारा की गई कवायद के औचित्य पर गंभीर संदेह पैदा करता है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि ट्रायल कोर्ट ने यह निष्कर्ष दर्ज नहीं किया कि प्रतिवादी संख्या 8 निषेधाज्ञा की तारीख पर या कथित बेदखली के समय कब्जे में था या नहीं।

“यह कोर्ट यह मानने के लिए विवश है कि जिस तरीके से कार्यवाही संचालित की गई, उससे यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा तरीका कानून की अज्ञानता के कारण अपनाया गया या इसके पीछे कोई अन्य बाहरी कारण थे।”

पीठ ने प्रशासनिक अधिकारियों की भी कड़ी आलोचना की। कोर्ट ने नोट किया कि प्रारंभिक निषेधाज्ञा निषेधात्मक (Prohibitory) थी, अनिवार्य (Mandatory) नहीं, और इसने प्रशासन को याचिकाकर्ता को बेदखल करने का अधिकार नहीं दिया था।

“प्रशासनिक अधिकारियों ने भी प्रतिवादी संख्या 8 को कब्जा दिलाने के लिए राजस्व टीम गठित करने और उसके बाद याचिकाकर्ता सहित प्रतिवादियों को बेदखल करने में गलती की है… यह प्रशासनिक शक्तियों का घोर दुरुपयोग है और पूरी तरह से अधिकार क्षेत्र से बाहर है।”

कोर्ट ने बोर्ड ऑफ ट्रस्टीज ऑफ द पोर्ट ऑफ मुंबई बनाम निखिल एन. गुप्ता और श्री राम बनाम स्टेट ऑफ यूपी सहित पिछले फैसलों पर ट्रायल कोर्ट की निर्भरता को खारिज कर दिया, यह नोट करते हुए कि उन मामलों में सुनवाई का अवसर आवश्यक था, जिसे इस मामले में याचिकाकर्ता को नहीं दिया गया था।

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फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने निम्नलिखित निर्देशों के साथ याचिका स्वीकार कर ली:

  1. कब्जे की बहाली: प्रतिवादी संख्या 2 और 3 को निर्देश दिया गया है कि वे इस आदेश की प्रति प्राप्त होने के 48 घंटों के भीतर याचिकाकर्ता और अन्य सह-हिस्सेदारों को विवादित संपत्ति का कब्जा वापस दिलाना सुनिश्चित करें।
  2. अनुशासनात्मक कार्रवाई: 5 फरवरी, 2025 का आदेश पारित करने वाले सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के खिलाफ अनुशासनात्मक जांच पर विचार करने के लिए मामला माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखा जाएगा।
  3. कोर्ट कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई: प्रतिवादी संख्या 8 (जो जिला जजशिप का कर्मचारी है) के संबंध में मामला सक्षम प्राधिकारी के समक्ष उचित कार्रवाई के लिए रखा जाएगा।
  4. हर्जाना: प्रतिवादी संख्या 8 को अवैध बेदखली और मानसिक पीड़ा के मुआवजे के रूप में याचिकाकर्ता को एक सप्ताह के भीतर 1,00,000 रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है। यदि भुगतान नहीं किया जाता है, तो इसे भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूला जाएगा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: श्रीमती सोनी बनाम यूपी राज्य और 7 अन्य
  • केस नंबर: रिट-सी नंबर 28263 ऑफ 2025
  • साइटेशन: 2026:AHC:23-DB
  • कोरम: जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस अरुण कुमार

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