इलाहाबाद हाईकोर्ट: गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए कोर्ट से प्रमाणित चार्जशीट की आवश्यकता नहीं, केवल एक केस के आधार पर भी कार्रवाई वैध

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश गिरोहबंद और समाज विरोधी क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1986 (गैंगस्टर एक्ट) के तहत कार्रवाई शुरू करने के लिए, गैंग चार्ट के साथ संलग्न आरोप पत्र (चार्जशीट) का न्यायालय से प्रमाणित (Certified Copy) होना अनिवार्य नहीं है। कोर्ट ने कहा कि विवेचना अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित चार्जशीट की प्रति ही इस चरण के लिए पर्याप्त है।

इसके अतिरिक्त, कोर्ट ने यह भी दोहराया कि किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल एक आपराधिक मामले (Solitary Case) के आधार पर भी गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई की जा सकती है।

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह की पीठ ने श्रीमती ज्योति सूरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य के मामले में यह फैसला सुनाया। कोर्ट ने विशेष न्यायाधीश (गैंगस्टर एक्ट), गाजियाबाद द्वारा जारी चार्जशीट और संज्ञान आदेश को रद्द करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक श्रीमती ज्योति सूरी ने धारा 528 बीएनएसएस (BNSS) के तहत आवेदन दायर कर गाजियाबाद की विशेष अदालत में चल रहे गैंगस्टर एक्ट के मुकदमे को चुनौती दी थी। यह मामला थाना सिहानी गेट, गाजियाबाद में दर्ज अपराध संख्या 502/2024 से संबंधित था।

गैंगस्टर एक्ट की एफआईआर दर्ज होने से पहले, 21 सितंबर 2024 को एक गैंग चार्ट तैयार किया गया था। इस चार्ट में केवल एक मूल मामले (Base Case) का उल्लेख था, जो बीएनएस (BNS) की धाराओं 126(2), 352, 351(2), और 308(6) के तहत दर्ज था। मूल मामले में 20 सितंबर 2024 को चार्जशीट दाखिल की गई थी, जिस पर मजिस्ट्रेट ने 23 सितंबर 2024 को संज्ञान लिया था।

READ ALSO  एससी-एसटी एक्ट: पीड़ित की जाति का नाम लेने मात्र से यह अपराध नहीं होगा जब तक कि अपमान करने का इरादा न हो: हाईकोर्ट

इसके बाद, गैंगस्टर एक्ट के मामले में विवेचना पूरी हुई और 9 अगस्त 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई, जिस पर विशेष न्यायाधीश ने 28 अगस्त 2025 को संज्ञान लिया। आवेदक ने इसी कार्यवाही को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

आवेदक की दलीलें

आवेदक के अधिवक्ता श्री संतोष त्रिपाठी ने गैंगस्टर एक्ट की प्रक्रिया में कई त्रुटियों का हवाला देते हुए निम्नलिखित तर्क दिए:

  1. एकल मुकदमा: आवेदक के खिलाफ केवल एक ही मामला दर्ज है जिसमें उसे जमानत मिल चुकी है, इसलिए गैंगस्टर एक्ट नहीं लगाया जा सकता।
  2. नियमों का उल्लंघन: अधिवक्ता ने तर्क दिया कि ‘यूपी गैंगस्टर रूल्स, 2021’ का पालन नहीं किया गया:
    • नियम 5(3)(a): अधिकारियों द्वारा कोई संयुक्त बैठक (Joint Meeting) नहीं की गई।
    • नियम 5(3)(c): मूल मामले की विवेचना पूरी हुए बिना गैंग चार्ट को मंजूरी दी गई।
    • नियम 10(1): गैंग चार्ट के साथ आरोप पत्र की ‘प्रमाणित प्रति’ (Certified Copy) संलग्न नहीं की गई थी।
    • नियम 16 और 17: सक्षम अधिकारियों ने बिना अपना स्वतंत्र दिमाग लगाए यांत्रिक रूप से गैंग चार्ट को मंजूरी दी।

राज्य सरकार का पक्ष

इसके विपरीत, सरकारी वकील (AGA) श्री प्रशांत कुमार सिंह और पीड़ित पक्ष के वकील श्री सुरेंद्र तिवारी ने आवेदन का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि:

  • 21 सितंबर 2024 को पुलिस आयुक्त, गाजियाबाद द्वारा संयुक्त बैठक में चर्चा के बाद गैंग चार्ट को मंजूरी दी गई थी।
  • मूल मामले की विवेचना 20 सितंबर 2024 को पूरी हो चुकी थी, जो गैंग चार्ट की मंजूरी से पहले की तारीख है।
  • चार्जशीट की प्रमाणित प्रति पर: राज्य ने अनिल मिश्रा बनाम यूपी राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि नियम 10 के तहत कोर्ट से प्रमाणित प्रति की आवश्यकता नहीं है; विवेचना अधिकारी द्वारा तैयार और हस्ताक्षरित प्रति पर्याप्त है।
  • एकल केस: सुप्रीम कोर्ट के श्रद्धा गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा गया कि एक अकेले केस के आधार पर भी गैंगस्टर एक्ट लगाया जा सकता है।
READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अब समय आ गया है कि मानहानि को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जाए

हाईकोर्ट का विश्लेषण और निर्णय

न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह ने रिकॉर्ड पर मौजूद गैंग चार्ट और कानूनी प्रावधानों का गहनता से परीक्षण किया। कोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने एक संयुक्त बैठक में उचित चर्चा के बाद अपनी हस्तलिपि (Handwriting) में संतुष्टि दर्ज की थी, जो यह दर्शाता है कि उन्होंने यांत्रिक रूप से हस्ताक्षर नहीं किए थे।

संयुक्त बैठक और संतुष्टि पर: कोर्ट ने कहा:

“मौजूदा मामले के गैंग-चार्ट के अवलोकन से यह स्पष्ट है कि… सभी अधिकारियों ने उचित चर्चा के बाद संयुक्त बैठक में अपनी हस्तलिपि में अपनी संतुष्टि दर्ज की है… अधिकारियों की भाषा/संतुष्टि नियम 2021 के नियम 16 के अनुसार है।”

चार्जशीट की प्रमाणित प्रति (नियम 10) पर स्पष्टीकरण: आवेदक के इस तर्क पर कि गैंग चार्ट के साथ कोर्ट से प्रमाणित चार्जशीट नहीं लगाई गई, हाईकोर्ट ने नरेंद्र कुमार बनाम यूपी राज्य और अनिल मिश्रा बनाम यूपी राज्य के फैसलों का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नियम 10 के तहत उस अधिकारी द्वारा प्रमाणित प्रति की आवश्यकता होती है जिसका दस्तावेज पर नियंत्रण है (यानी विवेचना अधिकारी)।

कोर्ट ने टिप्पणी की:

READ ALSO  कोर्ट ने ट्रैफिक पुलिसकर्मी द्वारा गलत ई-चालान के लिए एक हज़ार रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया

“नियम 2021 का नियम 10 कहीं भी यह नहीं कहता है कि आरोप पत्र की प्रति ‘कोर्ट द्वारा प्रमाणित’ होनी चाहिए। इसलिए, नियम 10(1) का कोई उल्लंघन नहीं है। कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल करना नियम 10(1) की पूर्व शर्त नहीं है।”

कोर्ट ने आगे समझाया कि नियम 60, जो प्रमाणित प्रतियों को साबित करने से संबंधित है, वह ‘ट्रायल’ (विचारण) के चरण पर लागू होता है, न कि गैंग चार्ट तैयार करने के चरण पर।

एकल केस पर गैंगस्टर एक्ट: कोर्ट ने आवेदक की इस दलील को खारिज कर दिया कि एक केस गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के श्रद्धा गुप्ता मामले का हवाला देते हुए, हाईकोर्ट ने कहा:

” ‘गैंग’ द्वारा किया गया एक भी अपराध उसके सदस्यों पर गैंगस्टर एक्ट लगाने के लिए पर्याप्त है। परिभाषा खंड गैंगस्टर एक्ट लागू करने से पहले अपराधों की बहुलता (Plurality of offence) की मांग नहीं करता है।”

निष्कर्ष: हाईकोर्ट ने पाया कि प्रक्रिया में किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं हुआ है और न ही गैंग चार्ट में कोई झूठी जानकारी दी गई है। तदनुसार, कोर्ट ने धारा 528 बीएनएसएस के तहत दायर आवेदन को खारिज कर दिया।

केस विवरण:

  • केस का शीर्षक: श्रीमती ज्योति सूरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 2 अन्य
  • केस संख्या: एप्लीकेशन यू/एस 528 बीएनएसएस संख्या 43062 ऑफ 2025
  • कोरम: न्यायमूर्ति विवेक कुमार सिंह

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles