हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.P.C.) की धारा 482 के तहत दायर एक याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें चार्जशीट और आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई थी। हाईकोर्ट ने इस याचिका को “बार-बार किया गया प्रयास” और “फोरम हंटिंग” (अनुकूल आदेश के लिए अलग-अलग याचिकाओं का सहारा लेना) का स्पष्ट उदाहरण बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई आधार पिछली याचिकाओं के समय उपलब्ध था, तो आवेदक बाद में नई याचिकाओं के माध्यम से टुकड़ों में उन आधारों को नहीं उठा सकता।
यह फैसला न्यायमूर्ति समित गोपाल ने रामदुलार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (Application U/S 482 No. 8190 of 2023) के मामले में सुनाया।
मामले की पृष्ठभूमि
आवेदक रामदुलार सिंह ने 16 फरवरी 2019 की चार्जशीट, 13 मार्च 2019 के समन आदेश और वाराणसी के थाना लोहटा में दर्ज केस अपराध संख्या 119/2018 (धारा 149, 420, 467, 468, 471, 504, 506 IPC) से संबंधित केस संख्या 330/2019 की पूरी कार्यवाही को रद्द करने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि आवेदक ने इसी मामले में तीसरी बार हाईकोर्ट का रुख किया था:
- आवेदन संख्या 32968/2019: इसे 11 सितंबर 2019 को खारिज कर दिया गया था, क्योंकि कोर्ट को अंतरवर्ती आदेश (interlocutory order) में हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार नहीं मिला था।
- आवेदन संख्या 31531/2022: यह याचिका पूरी कार्यवाही और गैर-जमानती वारंट (NBW) को रद्द करने के लिए दायर की गई थी। इसे 18 अक्टूबर 2022 को इस निर्देश के साथ निस्तारित किया गया था कि आवेदक सरेंडर कर अपनी जमानत कराए।
मौजूदा याचिका कार्यवाही शुरू होने के लगभग तीन साल बाद 2019 के समन आदेश और चार्जशीट को चुनौती देते हुए दायर की गई थी।
पक्षों की दलीलें
विपक्षी संख्या 2 के वकील ने याचिका की पोषणीयता (maintainability) पर प्रारंभिक आपत्ति जताई। उन्होंने तर्क दिया कि आवेदक “फोरम हंटिंग” कर रहा है, क्योंकि 2022 की याचिका में कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना पर विचार नहीं किया गया था और उसे जमानत लेने का निर्देश दिया गया था।
दूसरी ओर, आवेदक के वकील ने तर्क दिया कि पिछली याचिकाएं “अलग कारणों” से थीं। उन्होंने दावा किया कि 2022 की याचिका केवल NBW जारी होने तक सीमित थी और उसमें मामले के गुण-दोष पर विचार नहीं हुआ था। आवेदक ने यह भी कहा कि यह विवाद “पूरी तरह से दीवानी (civil) प्रकृति” का है और हाईकोर्ट को अन्याय रोकने के लिए अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
हाईकोर्ट ने इस कानूनी प्रश्न का विश्लेषण किया कि क्या पहली याचिका के समय उपलब्ध आधारों पर बाद में दूसरी या तीसरी याचिका दायर की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट के M.C. Ravikumar v. D.S. Velmurugan (2025) के हालिया फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा:
“अदालत ने कई फैसलों में यह माना है कि एक आरोपी के लिए धारा 482 CrPC के तहत हाईकोर्ट के अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का बार-बार उपयोग करके एक के बाद एक दलीलें उठाना उचित नहीं है, जबकि ऐसी सभी दलीलें पहली बार में ही उसके पास उपलब्ध थीं।”
न्यायमूर्ति समित गोपाल ने नोट किया कि हालांकि दूसरी याचिका पर कोई पूर्ण प्रतिबंध नहीं है, लेकिन परिस्थितियों में आए बदलाव को साबित करने का भार याचिकाकर्ता पर होता है। कोर्ट ने पाया कि आवेदक ने 2022 की याचिका में कार्यवाही को चुनौती देने का आधार छोड़ दिया था और अब वह उन्हीं पुराने आधारों को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहा है।
“फोरम शॉपिंग” के मुद्दे पर कोर्ट ने Vijay Kumar Ghai v. State of W.B. (2022) और K. Jayaram v. BDA (2022) का उल्लेख करते हुए जोर दिया कि पक्षकारों को अपने मामले से संबंधित सभी पिछली या लंबित कार्यवाहियों का खुलासा करना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा:
“आवेदक द्वारा पिछली दो याचिकाओं के समय छोड़ा गया कोई आधार, जो उस समय उपलब्ध था, बाद में दोबारा नहीं उठाया जा सकता। इस मामले में आवेदक द्वारा टुकड़ों में चुनौतियां पेश की गई हैं।”
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट धारा 362 Cr.P.C. के वैधानिक प्रतिबंध (जो अंतिम आदेश या निर्णय की समीक्षा को रोकता है) को दरकिनार करने के लिए धारा 482 Cr.P.C. की शक्तियों का उपयोग नहीं कर सकता।
निर्णय
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह आवेदन ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही को समाप्त करने का एक दोहराया गया प्रयास है, जो पहले ही कई बार कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बन चुका है।
“अतः यह कोर्ट यह मानती है कि धारा 482 Cr.P.C. के तहत वर्तमान याचिका उसी आवेदक द्वारा ट्रायल कोर्ट में लंबित कार्यवाही को रद्द कराने का एक बार-बार किया गया प्रयास है जो पोषणीय नहीं है। यह उसकी ओर से फोरम हंटिंग ही है।”
इन्हीं टिप्पणियों के साथ याचिका खारिज कर दी गई।
केस विवरण
- केस शीर्षक: रामदुलार सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: APPLICATION U/S 482 No. 8190 of 2023
- पीठ: न्यायमूर्ति समित गोपाल
- दिनांक: 8 अप्रैल, 2026

