वाराणसी एलिवेटेड कॉरिडोर निर्माण पर अवमानना याचिका खारिज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा—अवमानना का मामला नहीं बनता

 इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वाराणसी के शिवपुर क्षेत्र से गुजरने वाले चार लेन के एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण को लेकर दायर अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अदालत के आदेश की अवमानना का कोई मामला स्थापित नहीं होता, जिससे परियोजना के निर्माण कार्य को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है।

 न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल की एकल पीठ नारायण और अन्य द्वारा दाखिल अवमानना आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण हाईकोर्ट द्वारा वर्ष 2013 में पारित अंतरिम आदेश का उल्लंघन करते हुए किया जा रहा है।

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, संबंधित भूमि तालाब की जमीन है और 2013 में इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उस भूमि पर किसी भी प्रकार के निर्माण पर अंतरिम रोक लगा दी थी। उनका कहना था कि इसके बावजूद वहां कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है।

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से मुख्य स्थायी अधिवक्ता बिपिन बिहारी पांडे ने अदालत को बताया कि 2013 के अंतरिम आदेश के बाद स्वयं याचिकाकर्ताओं ने विवादित भूमि पर निर्माण कार्य किया है। उन्होंने कहा कि उस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि विवादित भूमि पर कोई भी निर्माण नहीं किया जाएगा।

उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि जिस एलिवेटेड कॉरिडोर का निर्माण किया जा रहा है, उसके लिए कुल 25 पिलर बनाए जाने हैं, जिनमें से 12 का निर्माण पहले ही किया जा चुका है।

राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि जिस भूमि पर एलिवेटेड कॉरिडोर बनाया जा रहा है वह सरकारी भूमि है और याचिकाकर्ताओं ने उस पर अतिक्रमण कर रखा है।

मामले पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि अवमानना की कार्यवाही चलाने का कोई आधार इस मामले में नहीं बनता। अदालत ने अपने आदेश में कहा:

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“अवमानना का कोई मामला नहीं बनता, क्योंकि यह स्पष्ट है कि वर्ष 2013 के बाद भी निर्माण कार्य किए गए, जबकि रिट कोर्ट ने उस समय ऐसे निर्माण पर रोक लगाई थी।”

मामले की पृष्ठभूमि के अनुसार, याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2013 में हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उन्होंने वर्ष 1996 में उप-जिलाधिकारी द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें राजस्व अभिलेखों से उनके नाम हटा दिए गए थे।

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