“साहस नहीं है… सरकार के दबाव में हैं”: जज पर टिप्पणी करने वाले वकील के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शुरू की अवमानना कार्यवाही

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भरी अदालत में जज के अधिकार और साहस पर सवाल उठाने वाले एक अधिवक्ता के खिलाफ आपराधिक अवमानना (Criminal Contempt) की कार्यवाही शुरू करने के लिए मामले को मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) के पास भेज दिया है।

न्यायमूर्ति संतोष राय की पीठ ने पाया कि वकील का आचरण निंदनीय (Scandalous) था और इससे अदालत की गरिमा कम हुई है। कोर्ट ने कहा कि वकील का व्यवहार न्यायिक प्रशासन में बाधा उत्पन्न करने वाला था। इसके परिणामस्वरूप, पीठ ने खुद को इस मामले की सुनवाई से अलग कर लिया और अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए पत्रावली को मुख्य न्यायाधीश के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना आवेदक कुणाल द्वारा दायर क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लिकेशन संख्या 5069 ऑफ 2026 की सुनवाई के दौरान हुई।

सुनवाई के दौरान, आवेदक के वकील श्री आशुतोष कुमार मिश्र ने तर्क दिया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि जांच अधिकारी (I.O.) ने अभी तक घायल पीड़ित का बयान दर्ज नहीं किया है।

राज्य की ओर से पेश हुए विद्वान एजीए श्री पुरुषोत्तम मौर्य ने स्वीकार किया कि हालांकि एफआईआर 19 जनवरी 2026 को दर्ज की गई थी, लेकिन जांच के दौरान घायल यश जैन, जिसके सीने पर गोली लगी थी, का बयान अभी तक दर्ज नहीं किया गया है।

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तथ्यों और आग्नेयास्त्र (firearm) से लगी चोट के आरोपों को देखते हुए, कोर्ट ने एजीए को तीन सप्ताह के भीतर जवाबी हलफनामा (Counter Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि हलफनामे के साथ पूरी मेडिकल रिपोर्ट, चोट की रिपोर्ट (injury report), और घायल व डॉक्टर के बयान शामिल होने चाहिए। मामले को 10 मार्च 2026 को नए सिरे से सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

खुली अदालत में घटना

निर्णय के अनुसार, जैसे ही कोर्ट ने यह आदेश लिखवाया, आवेदक के वकील श्री आशुतोष कुमार मिश्र ने खुली अदालत में अपनी आवाज ऊंची कर दी। कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया कि श्री मिश्र ने तेज और आक्रामक तरीके से निम्नलिखित बातें कहीं:

“आप इस मामले में जवाबी हलफनामा क्यों मांग रहे हैं? आपमें संबंधित जांच अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगने का साहस नहीं है, जिसने आज तक घायल का बयान दर्ज नहीं किया है। आपको जांच अधिकारी के खिलाफ कोई आदेश पारित करने का कोई अधिकार नहीं है। ऐसा लगता है कि आप सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं।”

कोर्ट की टिप्पणी और विश्लेषण

न्यायमूर्ति संतोष राय ने अधिवक्ता की भाषा, लहजे और शारीरिक भाषा (body language) को “अत्यधिक आपत्तिजनक, निंदनीय और अपमानजनक” करार दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह का आचरण वहां मौजूद लोगों की नजर में कोर्ट के अधिकार और गरिमा को कम करने वाला था।

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कोर्ट ने नोट किया कि इस दुर्व्यवहार के कारण न्यायिक कार्यवाही लगभग दस मिनट तक रुकी रही। अपने आदेश में पीठ ने कहा:

“श्री मिश्र का आचरण स्पष्ट रूप से न्यायिक कार्यवाही के उचित क्रम में हस्तक्षेप करने और बाधा डालने के इरादे को दर्शाता है। ऐसा व्यवहार, प्रथम दृष्टया, न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 2(c) के तहत परिभाषित ‘आपराधिक अवमानना’ के दायरे में आता है, क्योंकि यह न्यायालय को कलंकित करता है और न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप करता है।”

कोर्ट ने आगे टिप्पणी की कि अभद्र भाषा का प्रयोग करके और खुली अदालत में चिल्लाकर, अधिवक्ता ने प्रथम दृष्टया ऐसे कृत्य किए हैं जो कोर्ट की गरिमा को कम करते हैं।

फैसला

इन परिस्थितियों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने माना कि यह मामला श्री आशुतोष कुमार मिश्र के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने पर विचार करने योग्य है।

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कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

  1. न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 और कोर्ट के प्रासंगिक नियमों के तहत श्री आशुतोष कुमार मिश्र के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने के लिए एक अलग संदर्भ (Reference) तैयार किया जाए।
  2. रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया कि वह उचित आदेशों के लिए मामले को माननीय मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखे।
  3. जमानत के इस मामले को वर्तमान पीठ से रिलीज (मुक्त) किया जाता है।
  4. मुख्य न्यायाधीश से उचित आदेश प्राप्त करने के बाद कार्यालय इस जमानत अर्जी को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध करे।

केस डीटेल्स:

  • केस टाइटल: कुणाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लिकेशन संख्या 5069 ऑफ 2026
  • जज: माननीय न्यायमूर्ति संतोष राय
  • आवेदक के वकील: श्री आशुतोष कुमार मिश्र, श्री शिरीष कुमार मिश्र
  • राज्य के वकील: श्री पुरुषोत्तम मौर्य (एजीए)

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