इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी के खिलाफ केवल विभागीय जांच शुरू होने के आधार पर उसे स्वचालित (ऑटोमेटिक) रूप से निलंबित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि निलंबन आदेश पारित करने से पहले अनुशासनिक प्राधिकारी (Disciplinary Authority) को आरोपों की गंभीरता पर विचार करना आवश्यक है और यह संतुष्टि दर्ज करनी होगी कि आरोप इतने गंभीर हैं कि साबित होने पर ‘बड़ा दंड’ (Major Penalty) दिया जा सकता है।
न्यायमूर्ति मनीष माथुर की एकल पीठ ने आशीष यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले की सुनवाई करते हुए 6 नवंबर, 2025 के निलंबन आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने पाया कि विवादित आदेश में प्राधिकारी ने आरोपों की गंभीरता या निलंबन की आवश्यकता पर अपना कोई स्वतंत्र विचार (Subjective Satisfaction) व्यक्त नहीं किया था, जो उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 4 का उल्लंघन है।
मामले की पृष्ठभूमि
याची आशीष यादव ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर 6 नवंबर, 2025 के निलंबन आदेश और 4 नवंबर, 2025 के आरोप पत्र को चुनौती दी थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान याची के वकील ने आरोप पत्र और विभागीय कार्रवाई को चुनौती न देते हुए अपनी बहस केवल निलंबन आदेश की वैधता तक सीमित रखी।
याची के खिलाफ पांच आरोप लगाए गए थे, जिनमें सबसे गंभीर आरोप (आरोप संख्या 1) यह था कि उसने आठ जीवित पेंशनभोगियों को ‘मृत’ दिखाकर उनकी पेंशन रोक दी थी। इसी आधार पर उन्हें निलंबित किया गया था।
पक्षों की दलीलें
याची के वकील श्री आलोक मिश्रा ने तर्क दिया कि निलंबन आदेश बिना किसी स्वतंत्र विचार के पारित किया गया है। उन्होंने कहा कि प्राधिकारी ने केवल 3 और 4 नवंबर, 2025 के पत्रों और आरोप पत्रों का संज्ञान लेते हुए यांत्रिक तरीके से निलंबन आदेश जारी कर दिया।
याची की ओर से दलील दी गई कि उत्तर प्रदेश सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 1999 के नियम 4 के तहत, निलंबन आदेश जारी करने से पहले प्राधिकारी को यह संतुष्टि होनी चाहिए कि आरोप अत्यंत गंभीर हैं। अपने तर्क के समर्थन में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के स्टेट ऑफ उड़ीसा बनाम बिमल कुमार मोहंती (AIR 1994 SC 2296) और हाईकोर्ट की खंडपीठ के अरविंद कुमार राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2007 (4) AWC 4163 All) के फैसलों का हवाला दिया।
वहीं, राज्य सरकार के वकील ने निलंबन आदेश का बचाव करते हुए कहा कि याची पर लगाए गए आरोप, विशेष रूप से पेंशन रिकॉर्ड में हेराफेरी का आरोप, अत्यंत गंभीर प्रकृति के हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आदेश में इन आरोपों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है, इसलिए यह वैध है।
कोर्ट का विश्लेषण
न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने निलंबन आदेश का परीक्षण करने के बाद पाया कि हालांकि आदेश में आरोपों को सूचीबद्ध किया गया है, लेकिन अनुशासनिक प्राधिकारी ने इस बात पर कोई ‘व्यक्तिगत संतुष्टि’ (Subjective Satisfaction) दर्ज नहीं की है कि निलंबन क्यों आवश्यक है।
कोर्ट ने बिमल कुमार मोहंती मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया था:
“यह स्थापित कानून है कि सामान्यतः जब कोई नियुक्ति प्राधिकारी या अनुशासनिक प्राधिकारी किसी कर्मचारी को निलंबित करना चाहता है… तो निलंबन का आदेश कदाचार की गंभीरता और नियुक्ति प्राधिकारी के समक्ष रखे गए सबूतों की प्रकृति पर विचार करने और अनुशासनिक प्राधिकारी द्वारा विवेक का प्रयोग करने के बाद ही पारित किया जाना चाहिए।”
इसके अलावा, कोर्ट ने अरविंद कुमार राम मामले का भी हवाला दिया, जिसमें नियम 4 की व्याख्या करते हुए कहा गया था कि निलंबन को एक नियमित प्रक्रिया (Routine) के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए।
कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया:
“ऐसा प्रतीत नहीं होता है कि संबंधित प्राधिकारी द्वारा इस तथ्य के संबंध में कोई व्यक्तिगत संतुष्टि दर्ज की गई है कि क्या याची पर लगाए गए आरोप इतने गंभीर हैं कि साबित होने पर बड़ा दंड दिया जा सकता है या निलंबन वारंटेड है। स्पष्ट रूप से, विवादित आदेश अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू होने पर स्वचालित रूप से (Automatically) पारित किया गया है।”
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए 6 नवंबर, 2025 के निलंबन आदेश को रद्द कर दिया।
हालांकि, कोर्ट ने अनुशासनिक प्राधिकारी को छूट दी है कि यदि आवश्यक हो, तो वे निर्णय में दी गई टिप्पणियों और कानूनी नजीरों को ध्यान में रखते हुए नया आदेश पारित कर सकते हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश से याची के खिलाफ चल रही जांच कार्यवाही (Inquiry Proceedings) पर कोई रोक नहीं लगेगी।
केस विवरण:
- केस टाइटल: आशीष यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य द्वारा प्रमुख सचिव, पंचायती राज विभाग, लखनऊ व अन्य
- केस नंबर: WRIT – A No. 13339 of 2025
- कोरम: न्यायमूर्ति मनीष माथुर
- याची के वकील: आलोक मिश्रा
- प्रतिवादी के वकील: सी.एस.सी. (मुख्य स्थायी अधिवक्ता)

